Sunday, Jun 13, 2021
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more evidence revealed of corona being man- made musrnt

वैज्ञानिकों के शोध से कोरोना के मानव निर्मित होने के कुछ और साक्ष्य आए सामने

  • Updated on 6/7/2021

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। चीन की विवादित वुहान लैब से वायरस सार्स-कोव2 के कई स्ट्रेन लीक हुए थे। इन स्ट्रेन को लैब में ही बनाया गया था। दुनिया में कोविड-19 महामारी के जनक इस वायरस को समझने के लिए किए जा रहे अध्ययनों से कई चौंकाने वाले संकेत मिल रहे हैं।

3 जनवरी 2020 को वायरस पर चार वैज्ञानिकों का शोध प्रकाशित हुआ था। इनमें तीन वैज्ञानिक चीन के और एक अमरीका से थे। इन्होंने 27 मरीजों से लिए गए वायरस का जीनोम अध्ययन किया था और पाया कि इनमें 6 अलग-अलग तरह के स्ट्रेन थे। इन सभी 27 लोगों ने वुहान की यात्रा की थी और बीमार पड़े थे। महज दो माह में वायरस के छह नए स्ट्रेन सामने थे। वैज्ञानिकों के लिए यह चौंकाने वाली बात थी।

ऐसे वायरस में जिसमें आरएनए डिपेंडेंट आरएनए पोलिमर्स (RDRP ) जैसी प्रूफरीडिंग व्यवस्था है, उसमें इतनी तेजी से नए म्यूटेंट नहीं बन सकते। इसलिए यह शंका पैदा होती है कि लैब से एक नहीं कई स्ट्रेन लीक हुए। इसका दूसरा सबूत यह है कि जब ये लीक हुए वायरस दुनिया में फैल गए तो इनसे म्यूटेशन इतना तेज नहीं था।  जरनल ऑफ ट्रांसलेशन मेडिसिन में 22 अप्रैल 2021 को 12 शोधकर्ताओं का एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। इटली और अमरीका के वैज्ञानिकों ने इस शोध में 24 देशों के 220 नमूनों का जीनोम अध्ययन किया था।

ये सभी नमूने दिसंबर 2019 से मार्च 2020 के बीच के थे। इन नमूनों में सिर्फ आठ तरह के स्ट्रेन मिले थे। चार महीने में सिर्फ 8 स्ट्रेन यह स्वभाविक था  आरडीपीआर वाले वायरस में म्यूटेशन की गति इतनी धीमी होनी चाहिए मगर शुरू के पहले दो महीनों में सिर्फ 27 नमूनों में 6 स्ट्रेन मिलना असमान्य बातथी।

स्पाइक प्रोटीन में कई जगह छेड़छाड़

31 जनवरी 2020 को आईआईटी दिल्ली के कुसमा स्कूल ऑफ बायोलॉजी साइंस के प्रोफेसर बिश्वजीत कुंडु के नेतृत्व में 9 शोधकर्ताओं का शोधपत्र बायोआरएक्सआईवी में छपा था। इसमें कहा गया था कि 2019- एनकोव (तब सार्स- कोव2 को यही नाम दिया गया था) की स्पाइक ग्लूकोप्रोटीन में 4 जगह छेड़छाड़ है। यानी ऐसी प्रोटीन जोड़ी गई हैं, जो किसी अन्य ह्यूमन कोरोना वायरस में नहीं देखी गई हैं, बल्कि इनमें से तीन एड्स वायरस से ली गई हैं- एचआईवी-1, जीपी120 और गैग। जबकि चौथा बदलाव फ्यूरिन क्लीवेज साइट रिसेप्टर बाइंडिंग डोमन (आरबीडी) में किया गया। अगर आप इन चारों बदलावों को एक साथ देखते हो तो कह सकते हो कि यह प्राकृतिक क्रमविकास में संभव नहीं है।  

सवाल और भी

संडे गार्जियन में छपी डॉ. पीएस वैकटेश राव की रिपोर्ट के मुताबिक सार्स-कोव2 के इन बदलावों के कुदरती होने को लेकर और भी कई सवाल खड़े होते हैं।

1. यह कुदरतीतौर पर कैसे संभव है कि HIV जैसा रेट्रोवायरस अपने जेनेटिक मटीरियल को कोरोना जैसे एक आरएनए वायरस को ट्रांसफर कर दे?
2. सार्स-कोव2 की फ्यूरिन क्लीवेज साइट से मानव पर अप्रभावी प्रोटीन कैसे हट गए और उनकी जगह एक्टिव प्रोटीन कहां से आ गए? जो प्रोटीन आए हैं वे सार्सटाइप कोरोना वायरस में नहीं होते। यहां तक कि RaTG13 में भी 12 न्यूक्लोटाइड क्रम नहीं मिलते। इसी नाटकीय बदलाव से यह वायरस इतना संक्रामक हुआ। 
3. कालटेक के पूर्व अध्यक्ष और नामी वायरोलॉजिस्ट डेविड बाल्टिमोर फ्यूरिन क्लीवेज साइट पर सवाल उठाते हैं कि जब मैंने वायरल के जीनोम क्रम में फ्यूरिन क्लीवेज को देखा तो अपनी पत्नी से कहा कि यहीं बंदूक से धुआं निकल रहा है। 

अपने खानदान से मेल नहीं खाता

सार्स-कोव2 अपने खानदान से भी ठीक से मेल नहीं खाता। वुहान गए हांगकांग के 6 शोधकर्ताओं के 16 जनवरी 2020 को प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक सार्स-कोव2 के स्पाइक का बाहरी सबडोमेन की अमीनो एसिड पहचान अपने परिवार के अन्य सार्स कोरोनावायरस से सिर्फ 40 प्रतिशत ही मेल खाती है। इसमें दो प्रोटीन F3B और F8 पूरी तरह से अलग हैं। 

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