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पुण्यतिथि विशेष: मदर टेेरेसा की आंखों में बेसहारों को दिखती थी ममता

  • Updated on 9/5/2019

नई दिल्ली/सौरभ बघेल। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार बचा है, जिससे मदर टेरेसा (Mother Teresa) को सम्मानित नहीं किया गया हो। नोबेल पुरस्कार से लेकर भारत रत्न तक पाने वाली टेरेसा को अमेरिका और रूस ने भी अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से नवाजा था। सच कहा जाए तो असल मायने में उनके व्यक्तित्व के सामने यह पुरस्कार बौने थे क्योंकि उन्होने जो काम किए, वह किसी इंसान के वश की बात ही नहीं थी।

कैसे एग्नेस गोंझा बोयाजिजू (मदर टेरेसा) नाम की सामान्य सी यूरोपीयन लड़की पूरी दुनिया के गरीबों, भूखों और अपाहिजों और बेसहाराओं का सहारा बनी वह अपने आप में काबिले ए तारीफ है। कुछ लोग तो टेरेसा को भगवान भी मानने लगे थे, टेरेसा ने पूरी दुनिया में लोगों की सेवा के लिए 100 से अधिक देशों में अपने 517 चैरिटी मिशन संस्थान खोले थे। जिनके जरिए वह 5 लाख से ज्यादा लोगों का पेट भरती थी। जैसे ही हर उजाले की एक की एक परछाई होती है वैसे ही उनके जीवन में एक समय ऐसा आया जब उनके ऊपर सवाल उठने लगे थे।

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बचपन  
मदर का जन्म 26 अगस्त1910 यूगोस्लाविया (यूरोप) में हुआ। पिता की मौत 9 साल की उम्र में हो जाने के कारण उनकी मां पर परिवार को चलाने का दबाव आ गया था। जिसमें टेरेसा ने उनका साथ दिया। टेरेसा बहुत छोटी सी उम्र में सिलाई करती थी ताकि घर चल सके। टेरेसा की मां अपने जीवन के उस बुरे दौर में भी रोजाना भूखों की मदद करती थी, और यहीं से मदर टेरेसा ने भी अपनी मां के जीवन से प्रेरणा ली और अपने पूरे जीवन को बेसहाराओं को दान करने का का मन बना लिया।

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21 साल की उम्र में देश छोड़ दिया
मदर टेरेसा ने अपनी ग्रेजुएशन समाप्त होते ही ऐसा निर्णय लिया जिससे उनकी मां भी चौक गई। मदर ने लोगों की सेवा के लिए सामान्य जीवन त्यागकर नन बनने का फैसला लिया। जिसका उनकी मां ने भी विरोध किया था क्योंकि इसमें अपने आपको धर्म के लिए सौंपना पड़ता है। आपके निजी जीवन की यहां कोई संभावना नहीं होती, लेकिन मदर ने किसी की नहीं सुनी और कड़ी ट्रैनिंग के बाद मिशनरीज के तौर पर बंगाल आ गयी। शुरुआत में उन्होंने यहां स्कूल में काम किया और बाद में वह लोगों की सेवा में लग गई।

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निर्मल ह्रदय की स्थापना
टेरेसा भारत में 1931में आयीं थी। जिस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, जिस कारण भारत में आम लोगों की स्थिति बहुत खराब थी। लोगों के भूखे मरने की स्थिति थी। एक तरह भारतीय अंग्रेजों की तरफ से जंग लड़ रहे थे तो वहीं दूसरी ओर देश के अंदर चारों तरफ भुखमरी फैली थी। बच्चे, महिला भूख और बीमारी के शिकार हो रहे थे। जिसे देख कर मदर को बहुत दुख होता था।

1947 में जब देश आजाद हुआ था तब भी विभाजन में हुए दंगों और पलायन के कारण लोगों के पास खाने तक के लिए कुछ नहीं थी। उस समय टेरेसा ने निर्मल हृदय नाम की चैरिटी संस्था खोली जो लोगों का इलाज और उनको खाना खिलाती थी। उन्होंने शांति के लिए काम किया और धर्म जाति से ऊपर उठकर लोगों की सेवा की। उनका यह संस्थान मरीजों की सेवा करता, लावारिसों की मृत्यु हो जाने पर उनके धर्म के हिसाब से अंतिम संस्कार जैसा काम किया करता था। कहा जाता है कि टेरेसा लोगों का इतना ध्यान रखती थी कि वह प्रत्येक मरीज से स्वयं मिलती और उसका हाल-चाल जानती थी।

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टेरेसा गरीब बच्चों, भूखों और बेसहराओं की मां थी। उनका संस्थान दुनिया भर में 5 लाख से अधिक लोगों को खाना खिलाती और उनकी सेवा करती थी। और उनके इसी काम के लिए दुनिया ने उनको अनगिनत पुरस्कारों से सम्मानित किया था।

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धर्मांतरण के लगे आरोप
मदर टेरेसा को अपने काम के लिए दुनियाभर से प्यार मिला था मगर कुछ लोगों ने उनकी आलोचना भी की है। भारत में हिंदू संगठन RSS का आरोप है कि मदर ने भारत में मिशिनरीज को बढ़ावा दिया और हिंदुओं का धर्मांतरण किया। वह आरोप लगाते हैं कि मदर ने लोगों का अंतिम संस्कार उनकी मर्जी के खिलाफ इसाई धर्म की रीति-रिवाज से किया करती थी। और उनका उद्देश्य रहता था कि जिनकी सेवा की जा रही है उन्हें ईसाई बनाया जाए।

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इसी तरह की बात अरुप चर्टजी अपनी किताब 'द फाइनल वरडिक्ट मदर टेरेसा' में कहते हैं कि मदर टेरेसा के काम को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है। वह खुद मदर की संस्था से काम करने के दावे के साथ कहते हैं कि मदर पीड़ितों से कहा करती थी कि पीड़ा जीसस के करीब लाती है जो मानवता के लिए सूली चढ़े थे लेकिन खुद के बीमार होने पर वह मंहगे अस्पतालों में इलाज कराती थी।

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मदर की मौत 5 सितंबर 1997 में हुई थी उस दिन पूरी दुनिया रोई थी भले ही उनके साथ कुछ विवाद जुड़े हो मगर उन्होंने मानवता के लिए जो किया शायद ही कोई कर सके, वह इंसानी जीवन की रोल मॉडल थी। बंगाल मे भूखे, गरीब, अपाहिज के साथ जिनका कोई नहीं था उनकी मां थी मदर टेरेसा। उनकी संस्था ऐसे लोगों को खाने के साथ शिक्षा, एवं स्वास्थ्य के लिए काम करती थी जिनका कोई नहीं होता था। जिनकी न सरकार सुनती थी न ही भगवान सुनते थे असल में वही उनकी भगवान थी।

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