Wednesday, Jun 29, 2022
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आंदोलन खत्मः किसानों को मिला एकता का उपहार

  • Updated on 12/10/2021

नई दिल्ली/अकु श्रीवास्तव। आखिरकार किसान आंदोलन खत्म हो गया। एक  साल से ज्यादा समय तक चले आंदोलन के दौरान कई तरह की परिस्थितियां पैदा हुईं और यह सवाल सबसे बड़ा है कि आखिर किसानों को मिला क्या? आजादी के बाद के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक इस किसान आंदोलन की उपलब्धियां क्या हैं?

सरकार का कहना था कि वह किसानों की भलाई के लिए तीन नए कानून लाई थी। दूसरी ओर किसानों ने उन्हें काला कानून कहा। खासकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने। क्या सिर्फ इन काले कानूनों का वापस होना ही उपलब्धि है। क्या जो शांतिपूर्ण आंदोलन हुआ, (अगर 26 जनवरी की लाल किले की घटना को छोड़ दें), उससे किसानों को कितना लाभ हुआ।

जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की बात है तो उस व्यवस्था को जारी रखने की बात सरकार पहले भी कह रही थी और लिखा पढ़त में अब भी उसने कहा है। अब वह इसको लेकर  एक कमेटी सरकार बना रही है, जिसमें किसानों के प्रतिनिधि भी होंगे।

भले सरकार लगातार चुनिंदा फसलों पर एमएसपी बढ़ाती रही है लेकिन इसको लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। यह भी सच है कि आम किसानों की सालाना आय नहीं बढ़ी। दूसरी तरफ किसानों की खेती कम होती गई। पैसा कम होता गया। स्थिति खराब होती गई। 

अभी प्रथम दृष्टया जो दिख रहा है वह यह है कि फिलहाल किसानों को उन्हीं दिक्कतों से राहत मिली है, जो आंदोलन के दौरान उपजीं। जैसे किसानों पर दर्ज हुए मामलों की वापसी का मामला हो, जिसे सरकार ने मान लिया है।  इसके अलावा पराली जलाने के कारण होने वाले मुकदमों से भी सरकार ने किसानों को राहत दे दी है। जहां तक बिजली बिलों का मामला है, उसे राज्यों को ही तय करना है। यानी कुल मिलाकर जिसे उपलब्धि माना जा रहा है, वह आंदोलन की वजह से उपजे हालात के कारण पैदा हुए मामलों की वापसी पर स्थिति लौटती है।

इस आंदोलन की जो उपलब्धि मानी जा सकती है, वह यह है कि इतना बड़ा आंदोलन चलना। बहुत लंबे समय बाद सरकार को अपने कानूनों को वापस लेना पड़ा। पहले यह माना जाता था कि यह सरकार जो फैसला करती है, उसे लागू करती है। वापस नहीं ले सकती। मगर किसानों ने इस सरकार को कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया।
सरकार किन हालात में कानून वापस लेने के लिए मजबूर हुई है, वह भी किसी से छुपा नहीं है। सरकार की ओर से  माफी मांगना एक राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है। लेकिन सरकार को झुकना पड़ा , से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सरकार को क्यों झुकना पड़ा? 

इसमें कोई शक नहीं है कि सरकार को भी राजनीतिक कारणों से ही झुकना पड़ा। आंदोलन चल रहा था। इससे दिल्ली और दिल्ली के आसपास के लोगों को दिक्कतें थीं। मगर इसकी तुलना में किसानों की जो दिक्कत थी वह ज्यादा बड़ी थी। वे घरबार छोड़कर बैठे थे। हाल ही के उपचुनाव में भाजपा को कई जगह  शिकस्त मिली। किसानों में यह संदेश न जाए कि सरकार हमारे विरोध में है, इसलिए उसने कानून वापसी का फैसला किया।

अगर आप यह ढूंढने की कोशिश करेंगे कि किसानों को क्या मिल रहा है तो उसमें आपको ज्यादा कुछ नहीं दिखेगा। किसानों के कर्ज का सवाल था?  मुआवजे और बिजली बिल को लेकर बातें अभी अंधेरे में हैं। इस सबके बावजूद किसान इसे एक बड़ी उपलब्धि मान सकते हैं, क्योंकि इस आंदोलन ने देश में किसानों में एक बड़ी एकता पैदा की है।

हालांकि राकेश टिकैत लगातार इस आंदोलन को आगे ले जाने के मूड में दिखते रहे हैं। इसके पीछे भी उनके अपने राजनीतिक कारण हो सकते हैं। मगर बाकी किसान नेता उससे किनारा कर चुके थे। कुल मिलाकर किसान एकजुट हुए हैं, वे एक होने के वादे के साथ घरों को लौट रहे हैं। उन्होंने दिखाया है कि सरकार पर दबाव बनाने में सक्षम हैं।

इस आंदोलन की जो भी उपलब्धि होगी, वह आने वाले दिनों में सरकार से बातचीत के बाद ही सामने आएगी। यही काम सरकार और किसान आपसी बातचीत के जरिए पहले कर लेते तो ज्यादा बेहतर होता। मगर तब सरकार ने भी खुद आगे बढ़कर काम नहीं किया।

सरकार अगर इन कानूनों को लागू करने से पहले संबंधित पक्षों और किसानों से ठीक तरह से बात कर लेती तो अन्य राजनीतिक दलों को उससे फायदा उठाने का मौका नहीं मिलता। पूर्ववर्ती सरकारें भी यही करना चाहती थीं। कांग्रेस सरकार के समय भी इसी तरह की रिपोर्ट तैयार हुई थी।

इस पूरे आंदोलन से एक जीत की ध्वनि आती है। यह अच्छी बात है। किसानों को आगे भी अपने अधिकारों के लिए लडऩा पड़ सकता है, क्योंकि किसानों के लिए अपनी उपज का सही दाम ले पाना ,अब भी आसान नहीं है। यूरिया, डीएपी और खाद के लिए उसे लडऩा पड़ता है और भविष्य में भी नहीं जूझना पड़ेगा , इसके कोई ठोस संकेत नहीं हैं।  अब सुधारी करण की प्रक्रिया कब शुरू होगी, यह एक बहस की बात होगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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