Saturday, Mar 23, 2019

बारामूला में कश्मीरी पंडितों का व्यवसाय चलाने में मदद कर रहे मुसलमान

  • Updated on 3/8/2019

वर्ष 1989-90 में आतंकियों के अत्याचारों से परेशान होकर बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करना पड़ा था। लोग अपना मकान- दुकान, जमीन सब छोड़कर जम्मू चले आए थे। हालांकि, बारामूला के कई कश्मीरी पंडित तो ऐसे भी हैं जो बाद में फिर से वापस लौट गए।

यहां कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों के बीच किसी प्रकार का द्वेष नहीं है, लोग बड़ी सहजता के साथ एक-दूसरे के दुख-सुख में खड़े होते हैं। व्यापार में भी हिन्दू-मुसलमान यकीन के साथ आपस में हाथ बंटाते हैं, साथ निभाते हैं। लोगों के बीच सामंजस्य की यहां अनूठी मिसाल देखने को मिलती है। 

पेशे से सेल्समैन 27 वर्षीय इश्फाक अहमद मलिक बारामूला शहर में भीड़ से खचाखच भरे बाजार के बीच अपनी कपड़े की दुकान से होने वाली बिक्री के रिकार्ड को दुरुस्त करने में व्यस्त हैं।

पास ही कैश काऊंटर के नजदीक एक अलमारी में कई हिन्दू देवी-देवताओं ‘लक्ष्मी, दुर्गा, गणेश’ की प्रतिमाएं रखी हुई हैं। दरअसल, इश्फाक के मालिक हृदयनाथ गंजू जोकि कश्मीरी पंडित हैं, शिवरात्रि मनाने के लिए इन दिनों जम्मू में हैं। 

शिवरात्रि मनाने चले जाते हैं जम्मू
इश्फाक कहते हैं, ‘‘मैं उनकी दुकान पर तकरीबन 11 वर्षों से काम कर रहा हूं। हर बार हिन्दू त्यौहार आते हैं और वह 
दुकान छोड़कर अपने जम्मू स्थित दूसरे घर चले जाते हैं। वह तकरीबन 1 महीने तक वहां रहते हैं और होली मनाकर वापस लौटते हैं। वह हम पर यकीन करते हैं और हम इस दौरान उनके व्यापार का पूरा ख्याल रखते हैं।’’ 

बता दें कि गंजू का परिवार उन 29 कश्मीरी पंडितों में से है, जो बारामूला में रहकर मुसलमानों (शिया और सुन्नी) के सहयोग से अपनी दुकान चलाते हैं। वीरवान के पास कुछ कालोनियां बनी हुई हैं, जहां पर कश्मीरी पंडित रहते हैं। पलायन के बाद जो कश्मीरी पंडित अभी भी यहां हैं, उनमें से भी ज्यादातर लोग शिवरात्रि मनाने के लिए जम्मू चले जाते हैं। 

बारामूला के सभी पंडित सुरक्षित
इन सबके इतर यहां के स्थानीय लोग, दुकानदार और लोकल इंडस्ट्री एसोसिएशन के सदस्य इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि बारामूला में रहने के लिए जो पंडित वापस आ गए वे अब सुरक्षित हैं। बारामूला ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ (65) कहते हैं, ‘‘हम एक-दूसरे की खुशियों में शरीक होते हैं, फिर चाहे वह त्यौहार हो, किसी का जन्मदिन या विवाह का आयोजन।’’ 

अशरफ ने यह भी कहा, ‘‘1989 में जब लोगों ने मजबूरन पलायन किया तो हम मुसलमानों को बहुत बुरा लगा था। मेरी दुकान के आगे वाली शॉप देखिए। इसे सोहन लाल बिन्द्रू और उनके बेटे चलाते हैं। वह एक हकीम (स्थानीय डाक्टर) हैं। वह और उनका परिवार यह व्यापार 70 वर्षों से चला रहा है। 1989 में वे यहां से चले गए थे लेकिन फिर कुछ वक्त बाद वापस आ गए। हम चाहते हैं कि हिन्दुओं को यहां वापस आना चाहिए। हम सभी उनका स्वागत करेंगे।’’ 

वसीम (36) 17 साल की उम्र से बिन्द्रू की दुकान में काम कर रहे हैं। बिन्द्रू द्वारा चलाया जाने वाला आयुर्वैदिक स्टोर बारामूला की चॢचत दुकानों में से एक है। वसीम (36) कहते हैं, ‘‘हमारे ज्यादातर ग्राहक मुसलमान हैं।

असल में मैंने दवाओं से संबंधित जानकारी अपने मालिक हकीम साहब से जुटाई है। मैंने 17 साल की उम्र में उनके साथ काम करनाशुरू किया था। मैं उनका अहसानमंद हूं कि वह मुझ पर यकीन करते हैं।’’ 

खास बात यह भी है कि बारामूला में अलग-अलग देवी-देवताओं के पांच मंदिर हैं। इन मंदिरों में से कुछ की पहरेदारी सी.आर.पी.एफ. के जवान करते हैं।                                                                               ---आर. दुआ, ए.टी. सिंह

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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