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nadda to be tested by delhi election how will cross the river when kejriwal is in front

दिल्ली चुनाव से होनी है नड्डा की परीक्षा, कैसे करेंगे दरिया पार जब सामने हैं केजरीवाल

  • Updated on 1/24/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर।  बीजेपी (Bjp) के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा (JP Nadda) की उस समय ताजपोशी हुई है जब देश की राजधानी की गली-गली में विधानसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियों में पहुंचने की होड़ लगी हुई है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अपनी पहली ही परीक्षा में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा क्या पार्टी के लिये दिल्ली में 20 साल का बनवास तोड़ पाएंगे या नहीं? यह भी सही है कि बीजेपी को दिल्ली की सत्ता से बेदखल हुए एक अरसा बीत चुका है। पूरी की पूरी एक पीढ़ी जवान हो चुकी है। बीजेपी को सत्ता दिलाने का वादा करते- करते पता नहीं कितने फन्ने खां आए और चले गए। और फिर दिल्ली की सत्ता बीजेपी के हाथों से दूर ही रही।

JP Nadda in a programme


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कुशल रणनीतिकार के तौर पर नड्डा की पहचान
अब जबकि संगठन में माहिर, कुशल रणनीतिकार के तौर पर अपनी पहचान कायम करने वाले जेपी नड्डा के लिये दिल्ली की सत्ता में वापसी करना किसी पहाड़ की चोटी पर चढ़ने से कम नहीं है। हालांकि नदियों में गोताखरी की बात होती तो नड्डा अच्छे तैराक साबित हो सकते है। लेकिन क्या करें उन्हें तो पहाड़ की चढ़ाई जो चढ़नी है। पता नहीं कितने कदम चल पाएंगे। इसके वाबजूद नए अध्यक्ष को जिम्मेदारी के बोझ का गठरी लिये अपने सिर पर लेकर सिर्फ चलना नहीं बल्कि दौड़ना होगा। ठीक उसी तरह जैसे 'भाग मिल्खा भाग' फिल्म में फरहान अख्तर दौड़ते हुए कई बार मिल्खा सिंह की याद दिला गए थे।

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जब केजरीवाल ने जीता दिल्ली का दिल
अब सवाल उठता है कि मौजूदा दिल्ली की राजनीतिक समीकरण में बीजेपी सत्ता से कितनी दूर और कितनी पास खड़ी है। याद किजीए जब 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के आंधी में बीजेपी सातों सीटें ले उड़ी, तो उस समय नई नवेली दुल्हन की तरह दिख रही आप पार्टी ने घूंघट से बाहर आना ही उचित समझा। आनन-फानन में चुपचाप दुल्हन की तरह ही दिल्ली की सड़कों को आंगन समझते हुए ऐसा झाड़ू लगाया कि बीजेपी का सारा 'मोदी वाला नशा' ही उतार दिया। यह बात अलग है कि 5 साल बाद दिल्लीवासी अरविंद केजरीवाल के साथ उतनी मजबूती के साथ खड़े हुए नजर नहीं आते है जब झाड़ू लेकर सफाई करने पहली बार निकले थे। 

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कभी अमित शाह थे अजेय, लेकिन टूट गया तिलिस्म
उस समय के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जो अजेय माने जाते थे अभी-अभी जेपी नड्डा को ताजपोशी थमा दी है। उन्होंने यह ताजपोशी तब दी है जब लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने अपने करिश्माई नेतृत्व से पार्टी को 300 पार पहुंचाकर ही दम लिया। इससे अमित शाह ने लंबी छलांग लगाते हुए नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अपना नाम भी इतिहास में दर्ज कराने में कामयाबी हासिल की है।
 
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बीजेपी के पास मोदी-शाह के बाद नड्डा का कुशल नेतृत्व
बीजेपी के लिये गर्व की बात है कि उसके पास नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रुप में बहुत बड़े और लोकप्रिय नेताओं का नेतृत्व प्राप्त है। लेकिन आपको याद दिलाना आवश्यक है कि जेपी नड्डा की छवि भी मुखर तरीके से चमकने के लिये तैयार है। उनकी मोदी- शाह की काबीलियत से तुलना में कमतर आंकना किसी भी राजनीतिक पंडित के लिये सही नहीं होगा।       

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दिल्ली बीजेपी के लिये करो या मरो वाली स्थिति
जहां तक दिल्ली चुनाव की बात है तो बीजेपी के लिये करो या मरो वाली स्थिति बन गई है। आप यह दावा नहीं कर सकते कि जब अमित शाह को 2015 में केजरीवाल ने यमुना घाट का पानी पिला दिया तो जेपी नड्डा को भी कहीं का नहीं रखेंगे। आगे हाल क्या होगा वो भगवान जाने या अल्लाह जाने बात तो एक ही है। लेकिन सच से पर्दा तो आगामी 11 फरवरी को EVM के खुलने से ही पता चलेगा। 

Amit sah,Manoj tiwari and nadda in a Rally

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केजरीवाल की लोकप्रियता में आई कमी
लेकिन इतना तो तय है कि अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता में काफी कमी आई है। यह कमी भी इसलिये आई है कि उन्होंने जो वायदे किये थे उस पर अधिकांश उनकी पार्टी खरी नहीं उतरी। बीजेपी अक्सर यह दावा करती है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है। आप अरविंद केजरीवाल के 2015 के नायक वाली छवि को भूल जाईए। पिछले 5 साल में ही आप पार्टी में भी उतने ही गंदगी का अंबार लग गया है जैसे यमुना की सफाई करने वक्त भी उतना नहीं निकलेगा। अन्य पार्टियों से अलग खड़े होने का दावा सौ फीसदी सही साबित नहीं हो पाया है। 


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बीजेपी के लिये दिल्ली जीतना प्रतिष्ठा का विषय
बीजेपी के लिये दिल्ली में सत्ता प्राप्त करना न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित करेगा बल्कि लोकसभा चुनाव के बाद लगातार या यूं कहिये पहले से ही तीन राज्यों से हारने का जो सिलसिला शुरु हुआ है उसे रोकेगा भी। अगर ऐसे में दिल्ली का चुनाव भी बीजेपी हारती है तो यह ठप्पा लगने में देरी नहीं लगेगी कि केंद्र में नरेंद्र मोदी को पीएम के तौर पर देश तो देखना चाहता है, लेकिन राज्यों के चुनावों में करिश्माई नेतृत्व नहीं देने से जनता दूसरे दलों के साथ जाने से परहेज भी नहीं करती है।

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