Wednesday, Dec 01, 2021
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Nathuram Godse killed Mahatma Gandhi Sentence to death 15 November

आज के दिन बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे को अंबाला जेल में दी गई थी सजा-ए-मौत

  • Updated on 11/15/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। 30 जनवरी 1948 के काले दिन को अपना विवेक खो चुके नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) ने अहिंसा वादी, शांति के समर्थक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की हत्या की। हत्या के करने के बाद वो वहां से भागा नहीं। उसने आत्मसमर्ण कर लिया। डेढ़ साल से ज्यादा लंबे चले हत्या के केस के बाद हत्यारे नाथू राम गोडसे को आज ही के दिन 15 नवंबर 1949 को फांसी की सजा दी गई थी। नाथू राम को अंबाला जेल में सूली पर लटकाया गया था। नाथूराम गोडसे को सूली पर लटकाए जाने के बाद उनका शव उनके परिवार को नहीं सौंपा गया था। गुपचुप तरीके से ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था।

कहा जाता है कि अपनी फांसी से पहले गोडसे ने एक वसीयत भी लिखी थी, जिसमें उन्होंने अपने बीमा के पैसों को अपनी भाई दत्तात्रेय गोडसे और अपनी पत्नी को देने की बात कही थी। नाथूराम गोडसे ने अपने अंतिम संस्कार का अधिकार भी अपने भाई को दिया था। इसके साथ ही गोडसे ने अपनी अंतिम इच्छा भी लिखी थी। गोडसे की इच्छा थी कि उनकी अस्थियों को सिंधु नदी में प्रवाहित किया जाए।  

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गांधी के पुत्र ने की थी गोडसे से मुलाकात
महात्मा गांधी को गोली मारने के बाद नाथू राम गोडसे जब जेल में थे तब उनके बेटे देवदास उनसे मिलने गए थे। इस मुलाकात का जिक्र नाथूराम के भाई और गांधी की हत्या में सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब गांधी वध क्यों, में किया। इसमें कहा गया है कि देवदास जब जेल में नाथू राम गोडसे से मिलने गए तो उन्होंने बहुत ही सौम्य और सरल स्वाभव से देवदास से बात की। 

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गांधी की मौत का गोडसे ने जताया था दुख
तब नाथू राम ने दुख जताते हुए कहा था कि मैंने जो भी किया उसमें मेरा कोई भी व्यक्तिगत कारण नहीं था। मेरे कारण आपके सिर से पिता का साया उठ गया। आपका परिवार आज दुख मैं है लेकिन यकीन मानों इस बात का मुझे भी बहुत दुख है। ये सुनने के बाद देवदास ने नाथूराम से पूछा था कि तो फिर आपने ऐसा क्यों कहा। तब जवाब में गोडसे ने कहा था कि मैंने जो भी किया उसके पीछे राजनीतिक कारण थे। कहा जाता है कि जेल के नियमों के चलते देवदास के सम्मुख गोडसे अपना पक्ष नहीं रख सके। 

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देवदास ने गोडसे को लिखा था पत्र
इसके बाद गांधी जी के पुत्र देवदास ने गोडसे को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने गोडसे से कहा कि आपने भले ही मेरे पिता के पार्थिव शरीर को मार दिया हो, लेकिन उनके विचार अमर हैं। आप देखोगे की उनके जाने के बाद भी उनके विचार जिंदा रहेंगे। 

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