Sunday, Jan 19, 2020
nationalist congress party''''s condition ''''delicate'''' than congress

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की हालत कांग्रेस से भी ‘नाजुक’

  • Updated on 7/31/2019

महाराष्ट्र विधानसभा (Maharashtra Legislative Assembly) चुनाव (Election) से ठीक पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस (Congress) पार्टी (राकांपा) कठिन समय से गुजर रही है। पिछले कुछ दिनों से पार्टी (Party) में क्षरण हो रहा है। विधानसभा चुनाव (Vidhan Sabha Election) अक्तूबर में संभावित हैं। राकांपा प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) ने आरोप लगाया है कि उनकी पार्टी से लोगों का दल बदल कर भाजपा (BJP) / शिवसेना में जाने का कारण भाजपा द्वारा शुरू की गई जोड़-तोड़ की राजनीति है। इस बीच जब पवार डैमेज कंट्रोल (Damage Controll) में लगे हुए हैं तभी चुनाव आयोग ने राकांपा को नोटिस भेजा है जिसमें कहा गया है कि उसका नाम राष्ट्रीय दलों की सूची से बाहर हो गया है। 

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महाराष्ट्र की राजनीति में पवार एक बड़े और कद्दावर नेता हैं लेकिन इस समय संख्या बल के मामले में उनकी शक्ति काफी घट गई है। पिछले ही सप्ताह वरिष्ठ राकांपा नेता सचिन अहीर  ने शिवसेना का दामन थाम लिया। उसके बाद राकांपा महिला विंग की अध्यक्ष चित्रा वाघ ने भी पार्टी छोड़ दी। इसके शीघ्र बाद अकोला से राकांपा विधायक वैभव पिछाद ने भी भाजपा में जाने के लिए पार्टी छोड़ दी। नारायण राणे के भी भाजपा में जाने की संभावना है और भाजपा को भी उन्हें पार्टी में शामिल करने में कोई आपत्ति नहीं होगी। ऐसी भी अफवाहें हैं कि छगन भुजबल भी दल बदल कर भाजपा का दामन थाम सकते हैं। इस सारे घटनाक्रम पर पवार का कहना है कि कुछ लोग पूरी उम्र सरकार का हिस्सा बने रहना चाहते हैं और ऐसे ही लोग पार्टी छोड़ रहे हैं। उन्होंने भाजपा पर राकांपा नेताओं को प्रताडि़त करने के लिए जांच एजैंसियों के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया है ताकि वे भाजपा में शामिल हो जाएं। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने किसी भी सरकार द्वारा सरकारी मशीनरी का ऐसा दुरुपयोग कभी नहीं देखा। हद से ज्यादा दुरुपयोग हो रहा है?’

हालांकि पवार का कहना है कि इस तरह के दल बदल से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले पार्टी में क्षरण किसी भी राजनीतिक दल के लिए अच्छा संकेत नहीं है। 1989 की स्थिति से तुलना करते हुए पवार ने दावा किया, ‘‘मैं इस दल बदल से ङ्क्षचतित नहीं हूं क्योंकि 1980 में जब मैं मुख्यमंत्री था उस समय भी मैंने इस तरह की स्थितियों का सामना किया था। हमारे कुल 60 विधायकों में से केवल 6 बचे थे (कांग्रेस में)। तब मैं आधिकारिक विदेश दौरे पर था। उसके बाद हुए चुनाव में दल बदलने वाले सभी लोग हार गए और मुझे मेरी सभी 60 सीटें वापस मिल गईं। ’

एक चतुर राजनेता होने के नाते पवार ने पार्टी में गिरावट कुछ समय पहले से ही भांप ली होगी। दल बदलने से कांग्रेस से भी ज्यादा नुक्सान राकांपा को हुआ है। यहां तक कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले ही इस तरह के संकेत मिलने शुरू हो गए थे। जब अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजैक्ट किया गया था तो पार्टी में काफी असंतोष था और पवार परिवार के रुतबे के बावजूद पार्थ अपनी सीट भी नहीं जीत सके थे। यहां तक कि पवार की पुत्री सुप्रिया सुले को भी परिवार के गढ़ बारामती में चुनाव जीतने के लिए काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा था। 

एक साथ चुनाव लडऩे पर सहमति
हालांकि कांग्रेस और राकांपा ने आगामी विधानसभा चुनाव एक साथ लडऩे का निर्णय लिया है लेकिन कांग्रेस के लिए भी हालात अच्छे नहीं हैं। दोनों पाॢटयां उलझन और समस्याओं का सामना कर रही हैं। दो माह पहले राहुल गांधी द्वारा पार्टी अध्यक्ष पद से  इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस पार्टी में शीर्ष स्तर पर असमंजस की स्थिति है। पार्टी को अभी नया अध्यक्ष नहीं मिला है। कांग्रेस में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर चीजें उसके नियंत्रण से बाहर हो रही हैं। कांग्रेस में भी क्षरण की स्थिति है।  जिन लोगों को राकांपा अथवा कांग्रेस की टिकट पर जीतने का भरोसा नहीं है वे इन पार्टयों को छोड़ कर बेहतर  संभावना वाली पाॢटयों में जा रहे हैं। 

स्थानीय दल गुटबाजी और अनुशासनहीनता की समस्या से जूझ रहे हैं। राज्य के स्तर पर एकल नेतृत्व का अभाव है। 2019 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद उत्साहहीनता की स्थिति है। पिछले सप्ताह कर्नाटक की सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस अब केवल पंजाब, पुड्डुचेरी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में ही काबिज रह गई है। 

लोकसभा चुनावों के बाद  राकांपा  के कांग्रेस में विलय की अफवाहें उड़ी थीं। इस मामले पर राहुल और शरद पवार की बातचीत हुई थी ताकि राकांपा का कांग्रेस में विलय कर कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद दिलाया जा सके  लेकिन यह मामला सिरे नहीं चढ़ा। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि राकांपा राजनीतिक तौर पर सिकुड़ रही है। हालांकि गत चुनावों में उसे 5 सीटें मिलीं लेकिन यह उसकी उम्मीदों से काफी कम थीं। 2019 के आम चुनावों से पहले टी.डी.पी. प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और राकांपा प्रमुख शरद पवार  ने उन्हें (पवार को) विपक्ष के चेहरे के तौर पर प्रोजैक्ट करने की कोशिश की लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली।  

भाजपा और इसकी सहयोगी शिवसेना आगामी विधानसभा चुनावों के लिए पुख्ता तैयारियों में जुट गई हैं और दोनों के मिल कर  चुनाव लडऩे की स्थिति में वे राकांपा और कांग्रेस के मुकाबले काफी बेहतर परिणाम हासिल कर सकती हैं। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस और सेना के नेता आदित्य ठाकरे विशाल जनसम्पर्क कार्यक्रमों के लिए पद यात्राएं कर रहे हैं। आगामी 2 माह कांग्रेस और राकांपा के लिए काफी अहम हैं। इस दौरान उन्हें घर में स्थितियों को सुधारना होगा क्योंकि उनके लिए काफी कुछ दाव पर है। यदि यह गठबंधन हारता है तो लगातार 2 कार्यकाल तक उन्हें सत्ता से बाहर रहना पड़ेगा। 
kalyani60@gmail.com
कल्याणी शंकर

 

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