Monday, Nov 28, 2022
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घटस्थापना  के साथ शुरू हुआ नवरात्रि पर्व, पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा

  • Updated on 9/26/2022

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। शारदीय नवरात्रि पर्व की शुरुआत आज यानि सोमवार 26 सितम्बर से हो चुकी है जोकि 5 अक्तूबर तक होगी। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानि कलश स्थापना किए जाने की प्रथा है। घटस्थापना के बाद ही देवी की उपासना लगातार नौ दिनों तक विधिपूर्वक की जाती है। प्रत्येक दिन मां के किसी विशेष रूप पर आधारित होता है। मालूम हो कि शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन प्रारंभ होती है।

इस साल घटस्थापना के लिए श्रद्धालुओं को 1 घंटा 33 मिनट का समय मिल रहा है। सुबह 6 बजकर 28 मिनट से लेकर 8 बजकर 1 मिनट तक कलश स्थापना का विशेष महत्व बताया जा रहा है। जो लोग नौ दिनों तक व्रत रखकर अखंड जोत जलाते हैं उनके लिए इस एक घंटे के भीतर घटस्थापना करने पर विशेष फल की प्राप्ति का योग बन रहा है। हालांकि 10 बजकर 19 मिनट तक घटस्थापना की जा सकती है।

घटस्थापना के दौरान मां के लिए लाल चुनरी, लाल वस्त्र, रोली-मोली, शृंगार का सामान, फूलमाला, दीपक, घी, धूप, पानी  वाला नारियल, साबूत चावल, कुमकुम, देवी की प्रतिमा, पान-सुपारी, लौंग, इलायची, बताशे या मिसरी, कपूर, फल व मिठाई सहित कलश और जौ की आवश्यकता होती है। श्रद्धालु सुबह उठकर स्नान कर शुद्धि के बाद घर के मंदिर में दीप जलाकर मां दुर्गा का गंगाजल से अभिषेक करते हैं। मां की मूर्ति स्थापित कर वस्त्र, लाल चुनरी उन्हें पहनाई जाती है।

अक्षत, सिंदूर और लालपुष्प व माला पहनाई जाती है। उन्हें मिठाई, फल, लौंग, इलायची, पान का भोग लगाया जाता है। इसके बाद एक बर्तन में रेत भरकर उस पर कलश स्थापित करने किया जाता है। कलश रखने से पहले पानी डालकर जौ बोई जाती है। कलश के ऊपर आम के पत्ते रखकर लाल कपड़े या चुनरी में लपेटकर नारियल पर कलावा बांध उसे स्थापित किया जाता है। इस दौरान दुर्गा चालीसा, नवदुर्गा सप्तशती का पाठ करने का विशेष महत्व होता है। मां की आरती के बाद श्रद्धालु अपना व्रत प्रारंभ करते हैं।

पहले दिन होती है मां शैलपुत्री की पूजा
नवरात्रि पर्व के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना साधक द्वारा की जाती है। नवदुर्गाओं में यह प्रथम दुर्गा हैं, जिन्हें पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने की वजह से शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। मां शैलपुत्री वृषभ पर सवार होती हैं इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल, बाएं हाथ में कमल पुष्प रहता है। शैलपुत्री देवी का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार पूर्वजन्म में भी वो शिवजी की अद्र्धांगिनी थीं और उस समय उन्हें सती के नाम से जाना जाता था। 

झंडेवालान मंदिर में 170 सीसीटीवी रखेंगे नजर
प्राचीन ऐतिहासिक झंडेवाला देवी मंदिर में जहां प्रत्येक प्रवेश द्वार पर चरण पादुका स्टैंड बनें हैं । वहीं भक्तों के वाहन खड़े करने के लिये रानी झांसी मार्ग (पेट्रोल पम्प के पास) व फ्लैटिड फैक्ट्री परिसर में नि:शुल्क पार्किंग की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुऐ 170 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

कालकाजी मंदिर: दूर-दूर से आए जोत लेने 
कालकाजी मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि कालकाजी मंदिर के पूरे परिसर को रंग-बिरंगी लाइटों व पुष्पों से सजाया गया है। दूर व दिल्ली-एनसीआर से आने वाले श्रद्धालु लगातार कालकाजी मंदिर में जलने वाली अखंड जोत से जोत ले जा रहे हैं। 

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