Monday, Jan 21, 2019

हिमाचल में निवेश-अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत

  • Updated on 1/9/2019

कहीं पहाड़ों की जमीनें बिकने का डर तो कहीं पर्यावरण को बचाने की राजनीतिक जद्दोजहद के बीच आज हिमाचल प्रदेश थकी आंखों से निवेशकों की ओर देख रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दिए गए  विशेष औद्योगिक पैकेज के कारण हिमाचल में बरसों पहले जो औद्योगिक क्रांति शुरू हुई थी, वह अब धीरे-धीरे बंद हो रहे उद्योगों की गवाह स्वयं बन रही है।

विशेष औद्योगिक पैकेज की रियायतों के कारण वर्ष 2004 में हिमाचल प्रदेश के बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़, कालाअम्ब, पांवटा, टाहलीवाल, गगरेट और गवालथाई में हजारों नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित हुई थीं, जिससे राज्य में हजारों करोड़ का निवेश हुआ और लाखों बेरोजगारों को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए थे।

लेकिन उसके बाद से राज्य में औद्योगिक जगत को आकॢषत करने के लिए कोई भी ठोस नीति अब तक की सरकारें नहीं ला सकीं, जिसका असर यह हुआ कि धीरे-धीरे कई उद्योग बंद होने लगे। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने उत्तराखंड की तर्ज पर इसी साल जून माह में धर्मशाला में एक बड़ी इन्वैस्टमैंट मीट की योजना बनाई है, जिसमें करीब 80 हजार करोड़ के निवेश का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए करोड़ों का बजट तय कर उद्योग विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है।

इससे पहले ऐसी कोशिश तत्कालीन कांग्रेस सरकार के शासन में भी हो चुकी है। उस वक्त भी इमॄजग हिमाचल के नाम से देश के कई महानगरों में निवेश बैठकें हुई थीं। अब नई सरकार है लेकिन वह फिर से पुराने इमॄजग  हिमाचल के नाम से निवेश का रोडमैप तैयार कर रही है। 

लंबी और थकाऊ औपचारिकताएं : हिमाचल प्रदेश में निवेश मित्र माहौल बनाने की मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की कोशिश में ईमानदारी तो दिखती है लेकिन उद्योगपतियों को हिमाचल की तरफ आकॢषत करने के लिए पहले राज्य सरकार को अपनी लंबी और थका देने वाली कागजी औपचारिकताओं को सरल करना आवश्यक है।

वहीं निवेश के लिए सबसे अहम जरूरत जमीन की रहती है क्योंकि कोई भी प्रोजैक्ट बिना जमीन के नहीं लग सकता परन्तु धारा 118 के तहत अनुमति प्राप्त करना हिमाचल प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती रहती है। वहीं रेल और हवाई नैटवर्क विहीन इस पहाड़ी राज्य में देश के बड़े  उद्योगपति आखिर क्यों निवेश करेंगे। सरकार को यह भी सोचना होगा कि उसे किस सैक्टर के लिए कौन-सी रियायतों के साथ उद्योग जगत के बीच जाना है। 

जिस उत्तराखंड का अनुसरण करने की कोशिश हो रही है वहां पर निवेश की तैयारी 2014 से शुरू हो गई थी और कुल 12 सैक्टर चिन्हित कर क्षेत्र और रोजगार को देखते हुए भारी रियायतों वाली नीतियां बनाई गई थीं। केंद्र सरकार की कैपिटल सबसिडी के अतिरिक्त उत्तराखंड राज्य को अपनी जबरदस्त रियायतों वाली अनेकों नीतियों की वजह से करीब 70 हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिले हैं।

कांग्रेस के शासनकाल में भी हिमाचल सरकार ने निवेश के लिए 9 सैक्टर चिन्हित किए थे और वर्तमान सरकार ने भी इमॄजग हिमाचल नाम से निवेशक सम्मेलनों के लिए इन्हीं पर फोकस किया है। हालांकि पूर्व सरकार के वक्त केवल उद्योग विभाग को ही राज्य में निवेश के लिए प्रमुखता दी गई थी, जिस कारण उसे सफलता नहीं मिल पाई थी।

लैंड बैंक ही नहीं : वर्तमान में हिमाचल सरकार के पास अपना कोई लैंड बैंक ही नहीं है, जबकि निवेश की पहली और बड़ी जरूरत भूमि ही है। राज्य के उद्योग विभाग की वैबसाइट पर वर्तमान में केवल 72 प्लाट्स ही उपलब्ध हैं। प्लाटों के दाम भी बहुत ज्यादा हैं।

हालांकि सरकार ने सभी जिलों के उपायुक्तों को सरकारी और निजी भूमि की तलाश कर लैंड बैंक बनाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। राज्य में उपलब्ध जमीन की कीमतें बहुत ज्यादा हैं जबकि बड़े औद्योगिक घरानों को यहां आकॢषत करने के लिए बेहद सस्ती दरों पर जमीन उपलब्ध करवानी पड़ेगी। वहीं टैक्स, बिजली और परिवहन आदि पर विशेष रियायतें भी देनी होंगी। 

उत्तराखंड सरकार ने 4 साल तक निवेशकों की जरूरतों को महसूस करते हुए जो नीतियां बनाई हैं वैसा अब हिमाचल सरकार जल्दबाजी में नहीं कर सकती है क्योंकि इसके लिए वर्तमान अधिनियमों में भी संशोधन की जरूरत पड़ेगी। परन्तु हिमाचल प्रदेश में उद्योग, पर्यटन और रियल एस्टेट सैक्टर में जो निवेशक पिछले कई सालों से कार्य कर रहे हैं उनके अनुभव इस राज्य को लेकर काफी कड़वे रहे हैं।

अनुमतियों के लिए अभी तक भी ऐसे अनेकों निवेशक सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं क्योंकि राज्य के उच्चाधिकारी अपने स्तर पर ही अनावश्यक औपचारिकताएं समय-समय पर चैक लिस्ट में शामिल करते आ रहे हैं।

वहीं राज्य में रियल एस्टेट सैक्टर में निवेश कर चुके निवेशक सरकार द्वारा अभी तक रेरा अथारिटी न बनाए जाने से अपने प्रोजैक्ट आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं।

रियल एस्टेट सैक्टर के लिए आवश्यक ग्रीन फैलिंग को राज्य मंत्रिमंडल ने पिछले वर्ष सितम्बर माह से अपनी मंजूरी दे रखी है लेकिन अभी तक भी इसकी अधिसूचना जारी नहीं हो सकी है। ऐसे में नए निवेशकों को तलाशने की सरकार की कोशिश तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक वह मौजूदा नियमों को सरल न करे। 

उत्तराखंड व गुजरात की नीतियां : बेहतर होगा कि निवेशक सम्मेलन करने से पहले मुख्यमंत्री अपनी टीम को उत्तराखंड और गुजरात राज्य की नीतियों का अध्ययन करने को कहें, जिससे कि एक ठोस योजना के साथ देश के उद्योग जगत के बीच हिमाचल अपनी अलग पहचान बना सके।

सरकार राज्य की जी.डी.पी. के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले पर्यटन और बागवानी व कृषि सैक्टर के अलावा फिल्म सिटी, आई.टी.सिटी, टैक्सटाइल पार्क, फार्मा, आयुष, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्टर और मैडीसिटी पर बेहतरीन नीति बनाकर हिमाचल में निवेश के दरवाजे खोलने की कोशिश करे तो यह प्रयास सफल हो सकता है।

लेकिन इसके लिए पहले राजनीतिक बंदिशें तोड़कर युवा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को मौजूदा नियमों में उचित बदलाव भी करने होंगे। जाहिर है कि ऐसे बदलावों के लिए विपक्ष उनका विरोध भी करेगा।                          ---डा.राजीव पत्थरिय

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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