Monday, Jan 21, 2019

कम नहीं हैं शक्तिकांत दास की चुनौतियां

  • Updated on 12/19/2018

भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बने शक्तिकांत दास ने खुद भी नहीं सोचा होगा कि इतिहास की पढ़ाई करने के बावजूद वह रिजर्व बैंक का शीर्ष पद संभालेंगे और वह भी सरकार के संकटमोचक के रूप में। सो अब अगर उन्हें भाजपा के सुब्रह्मण्यम स्वामी और जयनारायण व्यास समेत काफी सारे लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है तो खुद उनको भी बुरा नहीं लग रहा होगा।

इतिहास पढ़कर आई.एस. बनना व पूरी सेवा समाप्त करने के बाद अचानक इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना उनके लिए भारी है और वह आलोचना की परवाह किए बिना नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा दिए गए इस चुनौतीपूर्ण काम को संभालने में ही सारा ध्यान लगा रहे होंगे। 

एक गवर्नर की असामान्य स्थितियों में विदाई व दूसरे द्वारा बीच कार्यकाल में पद छोड़ देना इतना तो बताता है कि इस पद की चुनौतियों के साथ इधर और कुछ चीजें जुड़ी हैं जिन पर केन्द्रीय बैंक तथा सरकार के बीच ज्यादा ही बड़ा मतभेद हो रहा है।

मतभेद तो पहले भी रहे हैं पर रिजर्व बैंक का कामकाज इतना स्वायत्त है कि सरकारी दखल की ज्यादा परवाह करने की जरूरत होती नहीं थी। पिछली सरकार में भी वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर पूरे समय टकराते रहे तथा चिदम्बरम की लाख इच्छा के बावजूद रैड्डी ने बैंक दरों में राहत नहीं दी थी।

टकराव स्वाभाविक
असल में सरकार के जिम्मे पूरी अर्थव्यवस्था और उसके बहाने पूरी शासन व्यवस्था तथा अपने मतदाताओं का ध्यान रखना होता है, जबकि रिजर्व बैंक का काम सिर्फ करंसी की चिंता करना है। सो इस किस्म का टकराव होना स्वाभाविक है। लेकिन टकराव किसी एक पक्ष और अंतत: एक के लहूलुहान होने तक जाए तो पूरी अर्थव्यवस्था का नुक्सान होगा।

इस हिसाब से शक्तिकांत दास का पहला काम तो इस टकराव को टालना है और इस अनुभवी नौकरशाह को अपनी लम्बी सेवावधि में यह मेल करके काम करना खूब आ चुका होगा। मोदी सरकार में आॢथक मामलों का सचिव होने के समय वह यह कौशल दिखा भी चुके हैं। 

नोटबंदी के दौरान प्रैस से मुखातिब होने व उसका जवाब देने वाले वह अकेले नौकरशाह थे और सच कहें तो उसी सेवा ने उनको मोदी सरकार के लिए संकट बने उॢजत पटेल के इस्तीफे से पैदा हुए हालात में रिजर्व बैंक का गवर्नर बनवाया है। सो उनके लिए यह चुनौती तो है ही कि पटेल व सरकार के बीच टकराव वाले मुद्दों को सम्भालें और सरकार का पिट्टु न दिखें।

इस सरकार का अभी का कार्यकाल कम समय का रह गया है और उसे 6 महीने के अन्दर चुनाव का सामना करना है। सो दास सख्ती करें या नर्मी, सरकार के साथ वह भी अग्निपरीक्षा के दौर में होंगे।

उर्जित पटेल से टकराव का मुख्य मुद्दा था रिजर्व बैंक के आरक्षित धन का कुछ हिस्सा बैंकों, वित्तीय संस्थाओं को देकर बाजार के ऋण संकट को टाला जाए और बैंकिंग व्यवस्था को वापस रास्ते पर लाया जाए, जो एन.पी.ए. के संकट के साथ रिजर्व बैंक की पिछले दिनों की सख्ती से भी पस्त पड़े हैं।

सरकार का तर्क है कि बैंक में बिना इस्तेमाल का धन पड़ा रहे और अर्थव्यवस्था संकट झेलती रहे, यह उचित नहीं है। रिजर्व बैंक का मानना है कि उसके पास पड़ा धन देश के लोगों का है और उसकी ङ्क्षचता अपनी मुद्रा व बैंकिंग व्यवस्था को स्थिर रखने की है।

जनता का पैसा सरकारी बैंकों समेत वित्तीय संस्थाओं को देकर और पूंजी डुबाना राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है पर यह रिजर्व बैंक के लिए जिम्मेदारी का निर्वाह न करना ही होगा। सो हमारा कमिटमैंट लोगों व मुल्क के प्रति है और हम बैंकों तथा सरकार की असफलता के लिए जनता का पैसा लुटाने वाली नीति नहीं चला सकते।

उर्जित पटेल का व्यवहार 
उर्जित पटेल के कामकाज व उससे भी ज्यादा उनके व्यवहार को लेकर कई तरह की शिकायतें रही हैं। पहले तो यह माना जाता था कि एक बड़े व्यावसायिक घराने से रिश्तेदारी तथा मोदी सरकार से नजदीकी के चलते ही उनका व्यवहार इतना अक्खड़ है।

उन्होंने नोटबंदी के समय सरकार के पक्ष में न बोलकर या कम से कम बोलकर इस भ्रम को तोड़ा। पर इन-साल्वैंसी के जरिए बैंकों से उधार लेकर भागने वालों के खिलाफ जिस तरह की सख्ती उन्होंने की थी, उसके प्रशंसक भी काफी हैं और अगर एन.पी.ए. की रकम में हाल में कमी दिखती है तो इसका श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है।

लगभग 3 लाख करोड़ की रकम इन-साल्वैंसी के नए कानून के जरिए लौटी है भले ही कई डिफाल्टर कम्पनियों के मालिक बदल गए हों। अगर यह सख्ती जारी रही तभी सार्वजनिक बैंकों में जमा जनता का पैसा हड़पने वाले लोग सही रास्ते पर आएंगे। इसलिए शक्तिकांत दास पर यह दायित्व होगा कि वह इस मामले में सख्त रहें और अगर बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं को जिन्दा रखने व कामकाज सुधारने के लिए नई पूंजी देनी भी हो तो सख्त नियमों के तहत ही दी जाए।

बैंक के माहौल को भी दुरुस्त करना होगा
1980 बैच के इस आई.ए.एस. अधिकारी दास के सामने इन वित्तीय और मौद्र्रिक दिक्कतों के साथ रिजर्व बैंक के अंदर के माहौल को दुरुस्त करने की चुनौती भी होगी। हम जानते हैं कि रिजर्व बैंक के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में बदलाव और पूंजी बाजार के एक जानकार सदस्य को विदा करके संघ परिवार से जुड़े एक बौद्धिक को लाने पर भी काफी विवाद हुआ था। उसके साथ ही एक उपाध्यक्ष विरल आचार्य की बयानबाजियों ने भी सुर्खियां बटोरी हैं और माना जाता था कि उॢजत पटेल उनके माध्यम से ही अपनी नाराजगी निकालते हैं। 

वित्तीय संस्थाओं को धन देने पर राजी होने का फैसला 19 नवम्बर को हो गया था (और उसे सरकार की जीत व पटेल की हार के तौर पर प्रचारित किया गया था), पर जानकार लोग मानते हैं कि हां करने के बाद भी पटेल ने उसे लागू कराने की पहल नहीं की थी। दास के लिए इसे लागू कराना और अपना हाऊस आर्डर में करना भी एक बड़ा काम होगा क्योंकि चुनाव पास देखकर रघुराम राजन से लेकर वे सब अर्थशास्त्री भी अलग तरह से सक्रिय होने लगे हैं जो हाल ही तक मोदी समर्थक माने जाते थे।                                                                                                                         ---अरविन्द मोहन

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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