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जरूरी नहीं, केंद्र का रास्ता यूपी से ही होकर जाए

  • Updated on 5/21/2019

नई दिल्ली /अकु श्रीवास्तव। दिल्ली का सरपट रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। भारतीय राजनीति में केंद्र की सत्ता के लिए उत्तर प्रदेश के महत्व को बताता यह एक वाक्य आपने अक्सर सुना होगा। पिछले ढाई- तीन महीने से हर टीवी चैनल अपने-अपने तरीके से यह ज्ञान देता नजर आता रहा है। पुराने अनुभव भी यही बताते हैं। एक-दो अपवादों को छोड़ दें तो आजादी के बाद से यह विशाल हिंदी भाषी प्रदेश जिस दिशा में अपना रुझान दिखाता रहा है, सत्ता का दरवाजा उधर ही खुलता रहा है। देश में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें इसी प्रदेश के पास हैं। अंदाजा इससे लगाएं कि पूर्वोत्तर के सभी आठ राज्य मिलकर भी इसकी एकतिहाई सीटों तक नहीं पहुंच पाते। 

मगर 2019 में उत्तर प्रदेश का यह गरूर टूटता दिख रहा है। रविवार को जारी ज्यादातर एग्जिट पोल्स देश का रुझान जिस तरह से दिखा रहे हैं, उससे लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में अगर भाजपा को बड़ा झटका लग भी जाता है तो भी भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपने गुट यानी एनडीए के साथ सत्ता में वापसी करती दिख रही है। वैसे ज्यादातर एग्जिट पोल्स एनडीए की सीटें 300 से ज्यादा बता रहे हैं।

एग्जिट पोल में उत्तर प्रदेश को लेकर इतना विरोधाभास कभी नहीं हुआ, जितना इस बार हो रहा है। एक चैनल के शुरूआती एग्जिट पोल में भाजपा को 22 सीटें तो इंडिया टुडे चैनल 62-68 सीटें दी जा रही हैं। आम तौर पर यह अंतर पचास फीसदी तक तो हो जाता था पर तीन गुने का अंतर कभी नहीं दिखा। लेकिन, अगर न्यूनतम स्कोर को भी ले लें तो भी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए इस स्थिति में होगी कि सरकार बना ले। और वो तब जब तेलंगाना में वाईएसआर कांग्रेस और आंध्र में चंद्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस, उड़ीसा में नवीन पटनायक के बीजेडी की सेवाएं न ली जाए।

ऐसा नहीं है कि यूपी से किसी पार्टी को बहुत सीटें न मिलने पर भी उसकी सरकार केंद्र में न बनी हो, पर वह बहुमत की कभी नहीं रही। उसको किसी न किसी की बैसाखी की जरूरत रही। 2004, 2009 भी इसके उदाहरण हैं। मनमोहन सिहं कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री बने रहे।   भाजपा को सत्ता में लाने के आसार दिखाने वाले कई राज्य ऐसे हैं जहां भाजपा की राज्यों में सरकारें हैं।

बड़े राज्यों महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, के अलावा छोटे-छोटे कई राज्यों से ज्यादा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल और उड़ीसा ने भी भाजपा का रास्ता नए तरीके से आसान किया है। उत्तर पूर्व के राज्यों का भी बड़ा योगदान है। कुछ महीने पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्य गंवा चुकी भाजपा को जो नुकसान यहां से दिख रहा था, वो हो नहीं रहा। इस तरह यूपी से होता नुकसान पूरा करने के लिए उड़ीसा और पश्चिम बंगाल ही काफी दिख रहे हैं। एग्जिट पोल बता रहे हैं कि 16 राज्यों से आगे भाजपा का विस्तार तेजी से हो रहा है। पूर्वोत्तर में भी वह शानदार प्रदर्शन कर रही है।

अगर अपवाद स्वरूप पंजाब को छोड़ दें तो जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है, वहां भी मोदी का जादू काम कर रहा है। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को संभाल पाने में विफल रही। दूसरी ओर भाजपा शासित राज्यों में सत्ता विरोधी लहर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हुनर से बढऩे नहीं दिया। आज  शहरों के ट्रैफिक के ऊपर से निकलने वाले एलिवेटेड हाइवे का दौर है। इसलिए अब सत्ता का रास्ता यूपी से नहीं बल्कि उसे बायपास करते हुए ऊपर से निकलता दिख रहा है।

एग्जिट पोल आने के बाद विपक्ष की गतिविधियां ऊपरी तौर पर जिस तरह दिख रही हैं और विपक्ष आखिरी दम तक यानि मतगणना तक ( 23 मई) अपनी कोशिशों को दिखा रहा है , उसके पीछे कई संकेत हैं। बसपा नेता मायावती को सोमवार को दिल्ली में होना चाहिए था, पर वो नहीं आईं। इंतजार करना चाह रही हैं। वैसे यह भी सही है कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष की अधूरी एकता के निहितार्थ कई हैं। गठबंधन को मिलती सीटें बहुत कुछ तय करेंगी। सवाल यह होगा ही कि क्या विपक्ष की एकता मोदी फैक्टर को दबा देगा या फिर उसे कोई और रास्ता चुनना होगा। 

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