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ऑफ द रिकॉर्डः देश का जन्नत अब सुरक्षित, जानें कश्मीर का सच और धारा 370 का भ्रम

  • Updated on 8/12/2019

नई दिल्ली/ कुमार आलोक भास्कर। अक्सर कश्मीर का नाम सुनते ही हम लोगों के दिलो-दिमाग में बम, बंदूक, आतंकवाद, खून से लथपथ नौजवान, लाशों की लगती ढ़ेर, शहीद हुए अपने देश के जवान, इस सबके ऊपर अलगावादी नेताओं की भारत को धमकी गूंजने लगती है। 

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धारा 370 को लेकर हमेशा धमकी

इसके साथ ही महबुबा मुफ्ती, फारुक अब्दुला, उमर अब्दुला जैसे नेताओं के धारा 370 को हाथ भी लगाने पर जलजला आने की भारत सरकार को सीधी चुनौती,  ऊपर से पाकिस्तान का कश्मीर को सुलझाने के लिए वैश्विक नेताओं से गुहार- 70 साल से यही तस्वीर देखते- देखते देश की कई पीढ़ियां बीत गई। लेकिन कश्मीर के न हालात बदले, न आतंकवाद खत्म हुआ। अब बस।

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जब धारा 370 और 35 A खत्म किया गया

क्योंकि यह पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार है। 5 अगस्त 2019 इतिहास में स्वणिम अच्छरों में लिखा जाएगा।  इसी दिन वह शुभ घड़ी आई जब जम्मू और कश्मीर से धारा 370 और 35 A को समाप्त कर दिया गया। इसके लिए आज देश मोदी-शाह की जोड़ी का अभिनंदन कर रही है। यह आसान निर्णय नहीं है क्योंकि पिछले 70 सालों से देश में किसी की सरकार ने साहस नहीं दिखाया। देश के सभी पीएम ने अगली सरकार को यह तोहफा प्लेट में सजाकर देता रहा। आखिरकार मोदी-शाह ने कश्मीर की सूरत, सीरत बदलने का साहसिक प्रयास किया है। जिसका चौतरफा स्वागत होनी चाहिए।

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धारा 370 को लेकर सिर्फ राजनीति हुई  
जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। अक्सर आपने देश के बुद्धिजीवी, पत्रकार और सबसे ज्यादा हमारे देश के होनहार नेताओं के श्रीमुख से सुना होगा। लेकिन क्या कभी आपने यह सुना कि इस राज्य का विलय भी अन्य रियासत की तरह ही हुआ था। आज जम्मू और कश्मीर देश ही नहीं दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि यह कहा जाए कि जबसे कश्मीर भारत का हिस्सा बना तभी से कश्मीर ज्वलंत मुद्दा बनकर छाया रहा तो गलत नहीं होगा। लेकिन आज जब हम कश्मीर की बात करते है तो बदले हुए कश्मीर की बात करने से पहले उस इतिहास को भी खंगालेंगे जब जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय हुआ था।   

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कश्मीर पर पूर्व पीएम नेहरु खुद नजर रख रहे थे

हम बात कर रहे है हरि सिंह की जो एक जमाने में कश्मीर के राजा हुआ करते थे। आपने उनके बेटे कर्ण सिंह को कांग्रेस सांसद के तौर पर कई बार बोलते हुए सुना होगा। जब देश आजाद हुआ तो उस समय छोटे-छोटे रियासत मौजूद थे। एक तरफ लगभग 600 रियासतों को मिलाने की जिम्मेदारी खुद तबके गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल उठा रहे थे तो कश्मीर के हालात पर देश के पहले पीएम नेहरु पैनी नजर रख रहे थे। हम इस बहस में यहां नहीं पड़ना चाहेंगे कि नेहरु ने क्या गलती की या सरदार ने कैसे 600 रियासत को भारत का हिस्सा बना लिया।

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जब अंग्रेजों ने खेली चाल

अंग्रेज ने भारत का 2 टुकड़ा धर्म के आधार पर जब करने का फैसला लिया तो उस समय के रियासतों के राजाओं को कहा कि आप या तो किसी देश के साथ मिल सकते है या आजाद भी रह सकते है। इसके पीछे अंग्रेजों की यह चाल थी कि भारत और पाकिस्तान भले ही आजाद हो जाए लेकिन यह छोटे-छोटे रियासतों से परेशान रहेंगे। लेकिन सरदार ने सूझबूझ से इन रियासतों को न सिर्फ पाकिस्तान का हिस्सा बनने से रोका बल्कि भारत में बिना किसी शर्त के मिला भी लिया। 

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राजा हरि सिंह कश्मीर को आजाद रखने के पक्ष में

लेकिन जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह ने आजाद मुल्क की कल्पना की और उन्होंने सोचा कि वे अपने रियासत को स्विटजरलैंड बनाकर रखेंगे। इसके साथ ही उन्हें यह भी डर सता रहा था कि अगर कोई देश हमला करे तो अपने रियासत को कैसे सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए उन्होंने एक सधी चाल चली। राजा हरि सिंह ने 'Stand still Agreement' भारत और पाकिस्तान के साथ किया। इसका मतलब है कि आप दोनों देश से कोई अगर उनपर हमला करेगा तो वो अपने रियासत को दूसरे देश के साथ मिला लेंगे। भारत ने कश्मीर से दूर ही रहना उचित समझा। 

पाक ने भेजे कबिलाई लड़ाके

लेकिन पाकिस्तान ने हड़पने की नीति से कश्मीर में कबिलाई लड़ाके को भेज दिया। जब यह कबिलाई लड़ाके लूटपाट मचाते हुए बारामूला पहुंचा तो वहां जबरदस्त नरसंहार किया जिसे 'बारामूला नरसंहार' के नाम से जाना जाता है। 

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भारत के साथ बिना शर्त का विलय हुआ 
वहां से ठीक 60 km की दूरी पर बैठे राजा हरि सिंह को लगा कि अब उनके जान पर आफत आने वाली है तो डर के मारे भारत के पीएम से बचाने के लिये गिड़गिड़ाया। तो पीएम नेहरु और माउंटबैटेन ने शर्त रख दी कि पहले आप कश्मीर का भारत में विलय संधि पर हस्ताक्षर करिये तभी भारतीय सेना कश्मीर पहुंचेगी। राजा हरि सिंह ने सर पर लटक रही तलवार से खुद को बचाने के लिए यह शर्त मान ली फिर 27 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया। भारतीय सेना ने कश्मीर जाकर कबिलाई लड़ाके को पीछे हटने के लिये मजबूर कर दिया। हालांकि पाकिस्तान ने कभी नहीं स्वीकारा कि कबिलाई लड़ाके को उसने भेजा है।     

शेख अब्दुला ने मुस्लिम की बहुलता का उठाया फायदा
राजा हरि सिंह और पीएम पंडित नेहरु में गहरे मतभेद थे। लेकिन नेहरु जो खुद कश्मीरी थे उनका शेख अब्दुला से काफी दोस्ती थी। इस दोस्ती का कीमत न सिर्फ हरि सिंह ने चुकाया बल्कि भारत को कश्मीर एक राज्य से ज्यादा समस्या के रुप में मिला। नेहरु ने हरि सिंह से उस समय जेल में बंद शेख अब्दुला को बाहर निकालने को कहा।

जम्मू कश्मीर में भले ही राजा हिंदू हो लेकिन वहां लगभग 90 फीसदी मुसलमान नागरिक थे। अब यह शेख अब्दुला अपने शुरुआती दौर में सरकारी नौकरी के लिए दर-दर भटकता रहा जब नहीं मिला तो यह समझने में देरी नहीं लगाई कि 10 फीसदी हिंदू हम पर राज करता है। अगर इस 90 फीसद मुसलमानों को एकजुट कर लिया जाए तो सत्ता का समीकरण भी बदल सकते है। 

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राजा हरि सिंह हाशिये पर
शेख अब्दुला ने 1938 में नेशनल कांफ्रेस नाम की एक पार्टी बनाई। फिर उन्होंने जल्द ही नेहरु से दोस्ती करके राज्य में राजनीतिक हालात को बदलने में अहम भूमिका निभाना शुरु कर दिया। वे उस समय कश्मीर के सदर ए रियासत बने। धीरे-धीरे राजा हरि सिंह हाशिये पर जाने लगे और शेख अब्दुला का राज्य में प्रभाव बढ़ता गया। 

नेहरु कश्मीर को ले गए संयुक्त राष्ट्र
उस समय कश्मीर में पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिये पीएम नेहरु को माउंटबैटेन ने सलाह दी कि वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाए। माउंटबेटेन की यह योजना थी कि संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन का प्रभाव होने से कश्मीर का मुद्दा लटकता रहेगा। फिर बाद में जाकर कश्मीर को एक पोल बनाकर रखा जाएगा ताकि भारत और पाक समेत एशिया पर नजर रखा जा सकता है। 

नेहरु को शेख अब्दुला ने रखा अंधेरे में
लेकिन नेहरु जहां एक तरफ माउंटबैटेन की योजना को समझने में नाकाम रहे तो दूसरी तरफ महात्वाकांक्षी शेख अब्दुला के रणनीति से भी अनजान रहे। नेहरु ने 1 जनवरी 1949 को कश्मीर मुद्दा को जैसे ही UNO में ले जाने की गलती की। वहां से भारत के लिये कश्मीर को लेकर उल्टी गिनती शुरु हो गई। पाकिस्तान ने UNO में भारत के खिलाफ कश्मीर मुद्दा को जोरदार ढ़ंग से उठाने में सफल रहा। UNO ने अपने आदेश में कश्मीर में जनमत संग्रह की बात कही। जिससे भारत सहम गया।

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देश का कानून लागू नहीं होता था कश्मीर में
 

पीएम नेहरु ने सोचा कि अगर शेख अब्दुला को पक्ष में रखा जाए तो Refrendum के समय कश्मीर की जनता को भारत में मिलाने में सहायक होगा। शेख अब्दुला इस बात को जानता था और उसने नेहरु से वो सब करा लिया जिसको लेकर कश्मीर हमेशा के लिए धधकता आग का गोला बनकर रह गया। और आज तक भारत के कानून वहां लागू नहीं हो सका।

नेहरु और शेख अब्दुला में हुआ समझौता
कश्मीर को भारत से अलग-थलग रखने की पृष्ठभूमि तैयार हो गई थी। बस इसे अमलीजामा पहनाना बाकी था। नेहरु और शेख अब्दुला के बीच 1952 में Delhi Agreement हुआ। जिसे आधार बनाकर 35 A जम्मू और कश्मीर में लागू किया गया। यह धारा 35 A 14 मई 1954 को नेहरु कैबिनेट ने सिर्फ राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के हस्ताक्षर से पास कर दिया। जबकि संसद की अनुमति भी नहीं ली गई। जबकि नियमतः संविधान संशोधन करके ही इस 35 A को जोड़ा जा सकता था।

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कश्मीर को विशेष राज्य का दिया दर्जा

लेकिन पीएम नेहरु ने शेख के सलाह पर संसद को दरकिनार करते हुए जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया। यह तो 35 A की कहानी है। जिसमें राज्य के नागरिक को विशेष सुविधा दी गई। बाहर के लोगों को नागरिकता से दूर रखा गया। यानी कश्मीर को बंद कमरे बनाने की पूरी तैयारी हो गई थी। जिसे हम धरती का जन्नत कहते है उस कश्मीर के आबोहवा को कैद करने की साजिश रची गई।

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गोपालस्वामी अयंगर की भी महत्वपूर्ण भूमिका 
अब ऐसे ही धारा 370 की बात की जाए तो स्पष्ट है कि यहां भी पीएम नेहरु से चूक ही हुई है। इसे लागू करने में नेहरु के भरोसेमंद गोपालस्वामी अयंगर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यह अयंगर बिना पोर्टफोलियो के मंत्री थे। एक तरह से कहा जाए तो गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के कामकाज पर नजर रखने के लिए भी नेहरु इनका उस समय उपयोग करते थे।

कश्मीर को खोने का डर
जनाब अयंगर ने 1948 में कहा कि कश्मीर के दोनों हिस्से भारत में और पाक अधिकृत कश्मीर (pok) में हालात अच्छे नहीं है। कश्मीर की जनता में असंतोष है। अगर भारत अपने राज्य कश्मीर की जनता को अस्थायी तौर पर विशेष दर्जा नहीं दिया तो मामला बिगड़ सकता है। यानी कश्मीर भारत खो देगा।  

धारा 370 एक अस्थायी प्रावधान   
अब अयंगर और शेख अब्दुला ने पीएम नेहरु से धारा 370 के प्रावधान को लागू करने के लिये राजी कर लिया। यह भी तर्क दिया गया कि जब राज्य में सामान्य हालात हो जाएंगे तो धारा 370 को हटा दिया जाएगा। इसके अलावा यह भी जोड़ा गया कि जम्मू और कश्मीर का संविधान सभा जब भंग होगा तब यह धारा भी उसके साथ ही समाप्त कर दिया जाएगा। क्योंकि अधिकृत तरीके से जम्मू कश्मीर संविधान सभा ही धारा 370 को जोड़ने का प्रावधान रखा था। 

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राष्ट्रपति के आदेश से कभी खत्म किया जा सकता
कश्मीर रुपी घाव जो उस समय बढ़ रहा था उस पर मरहम लगाने के लिये यह जोड़ दिया गया कि भारत के राष्ट्रपति सीधा एक आदेश देकर कभी-भी धारा 370 को खत्म कर सकता है। इसके लिये संसद की अनुमति नहीं चाहिए। तब भी पिछले 70 साल से देश के किसी प्रधानमंत्री ने धारा 370 को खत्म करने के लिए अनुशंसा राष्ट्रपति से नहीं की। जबकि बहुत ही पहले आसानी तरीके से इसे खत्म किया जा सकता था। लेकिन नहीं हुआ। 

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संविधान सभा के साथ ही धारा 370 भी होना था खत्म
कश्मीर को हमेशा से छला ही गया है। इसका सीधा सबूत है कि जब जम्मू और कश्मीर का संविधान सभा 1957 में ही भंग हो गया तो धारा 370 भी अपना वजूद खो दिया। तो भी किसी पीएम ने संसद में खड़े होकर यह नहीं कहा कि धारा 370 को अब खत्म कर देना चाहिए।

संसद के कानून नहीं लागू होता था कश्मीर में

लेकिन कश्मीर को लेकर आश्चर्य तो तब होता है कि जब संसद का कानून पूरे देश में लागू होता है वो कश्मीर में लागू नहीं होता है। इस बात का जिक्र विस्तार से पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने देश के नाम संबोधन में किया था। यानी पूरे कश्मीर मुद्दे को हाईजेक करके वहां की मुख्य राजनीतिक पार्टी ने लंबे समय तक रखा और राज किया। यह कैसा विरोधाभास है कि कश्मीर की अवाम को धारा 370 के लॉलीपॉप से कभी फायदा नहीं पहुंचा। भारत सरकार के किसी नौकरी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अलग-थलग ही रहा।

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अलग-अलग कानून देश और कश्मीर का

यह सुनकर भी आश्चर्य होता है कि आप हिस्सा तो भारत का है लेकिन आपका संविधान अलग, आपका झंडा अलग, आपका कानून अलग, आपका नागरिकता अलग। कश्मीर के इस मिजाज से भारत के सभी राज्यों से दूरी बनी रही। यह दूरी बताती है कि कश्मीर को सिर्फ रक्षा और पैसा भारत से चाहिए बाकी कुछ भी नहीं।

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कश्मीरी अवाम के हित में जरुरी था हटाना

लेकिन मोदी सरकार ने धारा 370, 35 A को खत्म करके यह संकेत भी दे दिया है कि कश्मीर की अवाम के हित के लिये जो भी भारत सरकार के कानून होते है उसे सीधे तौर पर उनतक पहुंचना चाहिए। भले ही यह राजनीतिक पार्टी और अलगाववादी नेता कितना ही विरोध ही न करें। देश से कश्मीर की दूरी भले ही 70 साल के बाद मिट रही है लेकिन मिठास भरा इसका परिणाम होगा इसमें संदेह नहीं होना चाहिए। कश्मीर को लेकर जो आर-पार की रणनीति भारत ने शुरु की है उससे बौखलाहट में पाकिस्तान के तो हो होश उड़े हुए है। पाकिस्तान हमारे अंदरुनी मुद्दों पर नसीहत दें तो उसके लिये भी अलग से नीति बनाई जा सकती है। अभी तो जश्न का समय है और कश्मीर के लोगों को गले लगाने का दिन है।

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