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oh brother just watch it be careful shaheen bagh is ahead

ए भाई जरा देख कर चलो! सावधान...आगे शाहीन बाग है

  • Updated on 1/28/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। शाहीन बाग (Shaheen Bagh) अब किसी परिचय के मोहताज नहीं। आपको भले ही यह पता नहीं हो कि शाहीन बाग दिल्ली के किस विधानसभा में आता है या वहां जाने का मार्ग कौन-सा है, लेकिन दुनिया को पता है कि दिल्ली का शाहीन बाग आज- कल CAA को लेकर अपने अलग तेवर के लिये एक जाना-पहचाना सा विरोध केंद्र बनकर तेजी से उभरा है। और फिर सामने दिल्ली विधानसभा चुनाव हो तो Hot Cake की तरह इस पर चर्चा तो बनती है। जब गृह मंत्री अमित शाह यह कहते है कि बटन इतना जोर से दबाना कि शाहीन बाग तक सुना जाए। तो जवाब में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल कहते है कि गृह मंत्री को शाहीन बाग पहुंचकर लोगों से बातचीत करनी चाहिये। 

A poster for agitation of CAA and NRC

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शाहीन बाग के शांति पूर्वक आंदोलन से लोग हुए है प्रभावित

लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि शाहीन बाग का यह शांतिपूर्वक प्रदर्शन देश के अन्य हिस्सों के विरोध से एक अलग अंदाज कायम किया है। वहीं JNU, जामिया, और AMU के हजारों छात्रों ने खुलकर प्रदर्शन करके यहां तक कि हिंसा का सहारा लेकर चर्चा में आए तो उस समय शाहीन बाग एक आदर्श बनकर उभरा है। क्या दिल्ली चुनाव को प्रभावित करने के लिये शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन को शुरु किया गया है? या यह विरोध महिलाओं का स्वाभाविक प्रदर्शन है जो सभी राजनीतिक दलों से एक समान दूरी बनाकर चलती हैं। इस प्रदर्शन के पीछे कौन-सी ताकत खड़ी है जो महीनों से इसे चला रही है यानी पर्दे के पीछे के चेहरे को जानना बहुत जरुरी है। तमाम सवाल मन में कौंधता रहा तो आज खुद को शाहीन बाग जाने से रोक नहीं पाया।

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जब जज्बा शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से मिलने का तो...

जब मैं अपने घर से निकला तो इस विश्वास के साथ कि शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से बात करके रहूंगा। यह जाना तब हुआ जब शाहीन बाग में कल ही एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ कथित भीड़ ने हाथापाई की और बाबा रामदेव को दिल्ली पुलिस ने नसीहत दी कि आप वहां न जाएं तो बेहतर है। मेरे कई मित्रों ने वहां न जाने की सलाह दी। लेकिन मैंने उसे अनसुना करते हुए वहां के लिये प्रस्थान किया। मैंने मेट्रो का सफर तय करके जब शाहीन बाग पहुंचा तो वहां के वातावरण को समझने की कोशिश की। जिसका जिक्र हम आगे करेंगे। बहरहाल जब मेट्रो से बाहर निकला तो वहां प्रदर्शन स्थल से थोड़ा दूर के रास्ते में टंगे तिरंगा ने यात्रा स्थल की ओर इंगित कर दिया। मैं आगे बढ़ा तो सीधा गली में दाखिला होकर दायां कुछ दूर चलने पर शाहीन बाग पहुंचा।

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मोदी सरकार के खिलाफ लगते है जमकर नारेबाजी 

सभा स्थल पर तकरीबन 150 महिलाएं धरना पर बैठी हुई थी। ठीक सामने मंच से मोदी सरकार को कोसा जा रहा था। मैंने बैनर लगाये हुए एक युवक से जानना चाहा कि यह विरोध का कारण क्या है। उन्होंने CAA को लेकर पीएम मोदी के फैसले की तीखी आलोचना की। लेकिन मेरी नजरें उस भीड़ में दबंग दादी को खोज रही थी, उनसे मिलने की उत्सुकता बरककार थी। तभी मैंने बुर्का पहने एक महिला से आग्रह किया तो उन्होंने मंच के पीछे से जाने का इशारा किया। उन्होंने अपने साथ आने को कहा। मैं उनके साथ जब मंच के पीछे पहुंचा तो वहां बाहर बैठे युवाओं से उन्होंने मेरा परिचय मीडिया से कहते हुए कराया। मैं जब अंदर दाखिला हुआ तो दबंग दादी वहां बैठी हुई थी।

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दबंग दादी ने दिया साफगोई से जवाब

मैंने सवाल किया तो उन्होंने बहुत ही साफगोई से अपना जवाब दिया। उन्होंने अपने आंदोलन के 44 दिन पहुंचने पर गर्व महसूस करते हुए इसे तब तक जारी रखने का ऐलान किया जब तक CAA और NRC को वापस नहीं लिया जाता है। यह जानकर संतोष हुआ कि उन्होंने भूखे इस आंदोलन को जारी नहीं रखा है। जिसे उन्होंने बड़ी विनम्रता से स्वीकार भी किया। उन्होंने देश भर में CAA का विरोध करते हुए 40 बच्चों की जान जाने पर अफसोस जताते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को चेताया। उन्होंने कहा कि आज कई बच्चे जेल में बंद है। वो निर्दोष है। सरकार को तुरंत उन्हें रिहा करना चाहिये।

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दबंग दादी आगे कहती है कि उनलोगों को कोई शौक नहीं है कि इस तरह प्रदर्शन में बैठे रहें। उन्होंने यह भी साफ किया यह आरोप बहुत बेबुनियाद है कि हम लोगों ने पैसे लेकर इस धरना को जारी रखा है। यह सरासर बदनाम करने की साजिश है। जब मैंने इस आंदोलन के पीछे के ताकत के बारे में उनसे जानना चाहा तो उन्होंने हाथ का इशारा करते हुए इन महिलाओं के जज्बे को बताया। हाल ही में दिल्ली के उपराज्यपाल से मुलाकात के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आश्वासन मिला है कि अगले 4 हफ्ते में केंद्र सरकार उनके मांगो पर विचार करके बताएगी।

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बाहर पुरुषों ने कर रखी है भारी सुरक्षा

ठीक उसी समय भगदड़ मच जाती है कि दिल्ली पुलिस अंदर दाखिला कभी-भी हो सकती है। आनन-फानन में कई पुरुष सकते में आ जाते है। शाहीन बाग आंदोलन स्थल को चारों तरफ से लोगों ने घेरा बना लिया है। बाहर मोदी के खिलाफ नारे भी लगते है। तभी गलियों से लोगों की टोली आंदोलन स्थल पर जमा होने लगते है। बाहर बार के उस पार पुलिस खड़ी हुई है। जहां से केमरे तस्वीरों को कैद करने को आतुर है। इधर उग्र हो रहे लोग आंदोलन की धार तेज होने का संकेत बार-बार देता है।

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हालांकि इस आंदोलन से लाखों लोगों के प्रभावित होने की बात तो सही है। लेकिन यदि आंदोलन दिल्ली के विरोध स्थल जंतर-मंतर या रामलीला में होता तो क्या उसे लोगों का समर्थन नहीं मिलता? बहुत बड़ा सवाल है कि लोगों का रास्ता रोककर क्या कभी राहें निकल सकती है? वैसे तो आंदोलन की बात की जाए तो इस बात से आंदोलनकारी कहीं डर तो नहीं गए कि जंतर-मंतर पर तो कई आंदोलन चलते रहते है सरकार शायद ही संज्ञान लेती होगी। हम आगे शाहीन बाग का चुनावी बिसात पर किस तरह उपयोग बड़ी खूबसूरती से किया जा रहा है इस पर भी विशेष चर्चा करेंगे। फिर यह भी बताएंगे कि दिल्ली के बाहर कैसे शाहीन बाग एक आंदोलन का मॉडल बनकर उभरा है।  
 

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