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तीर्थ यात्रा में अगर आपने भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग के नहीं किए दर्शन तो यात्रा है अधूरी

  • Updated on 5/22/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। वैसे तो भारत के अंदर भगवान शिव के अनेकों मंदिर हैं जिनमें से कुछ मंदिरों की मान्यताएं ज्यादा है। इसके अलावा भगवान शिव के करीब 12 ज्योतिर्लिंग हैं जिसमें अधिकतर लोगों ने 4 धाम कि यात्रा कि है। लेकिन अभी भी लोग भगवान शिव कि महिमा से अनभिज्ञ हैं, वो इसलिए क्योंकि 4 धाम कि यात्रा के अलावा भी भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग हैं जिनके दर्शन अगर आपने नहीं किए तो आपकी तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाएगी।

जी हां, हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश में स्थित भगवान शिव के चौथे ज्योतिर्लिंग यानी कि ओंकारेश्वर मंदिर कि इस मंदिर का इतिहास काफी पूराना है साथ ही इसका पौराणिक कथाओं में भी उल्लेख किया गया है। यहां तक कि इस मंदिर का पुराणों में जैसे स्कन्द पुराण, शिवपुराण व वायुपुराण में ओम्कारेश्वर क्षेत्र की महिमा के बारे में वर्णन किया गया है। बता दें कि, ओम्कारेश्वर में कुल 68 तीर्थ है जिनकी यात्रा के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

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भगवान शिव के चौथे ज्योतिर्लिंग के मात्र दर्शन से लोगों के सारे पाप धुल जाते हैं और सारे संकट से मुक्त हो जाते हैं। ओम्कारेश्वर मंदिर एक भगवान शिव का जाना माना मंदिर है और यह मोरटक्का गांव से लगभग 12 मील (20 कि॰मी॰) दूर बसा एक टापू है, जो हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार का बना हुआ है। मंदिर की इमारत कि ऊंचाई पांच मंजिला है साथ ही यहां हर दिन अहिल्याबाई होल्कर की तरफ से मिट्टी से निर्मित 18 शिवलिंग तैयार करके नर्मदा नदी में विसर्जित किए जाते हैं।

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ओम्कारेश्वर मंदिर से जुड़ी कथा

पौराणिक कथाओं कि मानें तो राजा मान्धाता ने नर्मदा किनारे इस पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था जिसके बाद भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए। भगवान शिव के प्रकट होते ही राजा ने उनसे यहीं निवास करने का वरदान मांग लिया। तभी से उक्त प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ओंकार-मान्धाता के रूप में जानी जाती है। जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है। इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं जहां 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं।

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क्या है इस मंदिर का इतिहास 

इस मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या की थी तथा शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसे शिव ने देवताओ का धनपति बनाया था। कुबेर के स्नान के लिए शिवजी से आग्रह किया जिसके बाद भगवान शिव ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी को उत्पन्न किया था। यह नदी कुबेर मंदिर के बाजू से बहकर नर्मदाजी में मिलती है, जिसे छोटी परिक्रमा में जाने वाले भक्तो ने प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देखा है, यही कावेरी ओमकार पर्वत का चक्कर लगाते हुए संगम पर वापस नर्मदाजी से मिलती हैं, नर्मदा और कावेरी के इस मिलन को संगम के नाम से भी जाना जाता है।

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