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128वीं जयंती के मौके पर जानिए, बी.आर आंबेडकर के विषय में कुछ रोचक तथ्य

  • Updated on 4/14/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। भारत के संविधान रचियता, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक बाबा भीमराव आंबेडकर की रविवार यानि 14 अप्रैल को जयंती है। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे। भारत को संविधान देने वाले डॉ भीमराव का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के एक गांव में हुआ था। वे अपने माता-पिता की 14वीं और आखिरी संतान थे।

बाबा साहिब का जन्म महार जाति में हुआ था, जिसे उस समय अछूत और निम्न वर्ग का माना जाता था। बचपन से ही उन्होंने अपने और अपने परिवार के साथ सामाजिक और आर्थिक तौर पर भेदभाव होते हुए देखा था, जिससे उनका मन बेहद दुखी और आहत रहता था। उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त छूआछूत, दलितों, महिलाओं और मजदूरों से भेदभाव जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद की।

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सामाजिक स्तर पर दलितों को सम्मान दिलवाने का उन्होंने अथक प्रयास किया। आर्थिक मुश्किलों से जुझते हुए भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और डट कर परेशानियों का सामना किया। गरीबी, बहिष्करण, लांछन से भरा बचपन मन के एक कोने में दबाये हुए आंबेडकर ने देखा था कि उनके जैसे करोड़ों लोग भारत में किस प्रकार का जीवन जी रहे हैं। उनके जीवन और आत्मा में प्रकाश केवल शिक्षा ही ला सकती है। यही शिक्षा उन्हें दासता से मुक्त कर सकती है।

डॉ. आंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई थी। रमाबाई की मृत्यु के बाद उन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया था। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था।

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डॉ बी.आर आंबेडकर के बारे में कुछ रोचक तथ्य-

हिंदू धर्म को छोड़ अपना लिया था बैद्ध धर्म

बाबा भीमराव अंबेडकर हिंदू धर्म में व्याप्त छुआछूत, भेदभाव को देख इतने विचलित हो गए थे कि आखिरकार उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। उनके साथ लाखों दलितों ने भी बौद्ध धर्म को अपना लिया। दरअसल, वे देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक तो हो लेकिन गैर-बराबरी को जीवन मूल्य न माने।

उनका एक वाक्य आज भी लोगों को उस समय की सामाजिक स्थिति से अवगत कराता है। जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं हिंदू तो पैदा हुआ हूं लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं। आखिरकार ऐसा ही हुआ और उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया। उनका मानना था कि मानव प्रजाति का लक्ष्य अपनी सोच में सतत सुधार लाना है।

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9 भाषाओं के जानकार थे बाबा साहब

जानकारों का मानना है कि डॉ भीमराव आंबेडकर करीब 9 भाषाओं के जानकार थे। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थी, इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां भी प्राप्त थी। साल 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। नोबल प्राइज जीतने वाले अमर्त्य सेन अर्थशास्त्र में बाबा साहिब को अपना गुरु मानते थे। बी.आर आंबेडकर पेशे से वकील तो थे ही साथ ही साथ वे दो साल के लिए मुंबई के लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल पद पर भी नियुक्त हए थे।

संविधान निर्माण समिती के अध्यक्ष बने बी.आर आंबेडकर

डॉ आंबेडकर को आजादी के बाद संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर उनकी अध्यक्षता में दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ। संविधान में बाबा साहिब ने दलित और पिछड़े वर्ग को ध्यान में रखते हुए किए बिल शामिल किए, जिससे उन सभी लोगों को मुख्यधारा में ला जाया जा सके।

हिंदू कोड बिल पर हुआ उनका जमकर विरोध

आजादी के बाद पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में डॉक्टर आंबेडकर कानून मंत्री बने और नेहरू की पहल पर उन्होंने हिंदू कोड बिल तैयार किया, लेकिन इस बिल को लेकर उन्हें जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा। खुद नेहरू भी तब अपनी पार्टी के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर बढ़ते दबाव के सामने झुकते नजर आए।

इस मुद्दे पर मतभेद इस कदर बढ़े कि अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि बाद में हिंदू कोड बिल पास हुआ और उससे हिंदू महिलाओं की स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव भी आया, लेकिन अंबेडकर के बिल से ये कई मामलों में लचीला था।

 

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