Thursday, Aug 16, 2018

सभी समस्याओं की जड़ बढ़ती आबादी

  • Updated on 8/10/2018

आयोग ने पानी की समस्या के संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट देकर इस समस्या की दिन प्रतिदिन गंभीर होती परिस्थिति से देश को सावधान करके एक बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। इस रिपोर्ट के संबंध में मीडिया में बहुत अधिक चर्चा हुई है और हो भी रही है। इस महत्वपूर्ण काम के लिए नीति आयोग को बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा परन्तु मुझे एक बात की बड़ी हैरानी है कि इस विस्तृत रिपोर्ट में पानी की समस्या की भयंकर होती स्थिति के मूल कारण की ओर कोई संकेत भी नहीं किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 60 करोड़ भारतवासी पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहे हैं।

2 लाख लोग प्रति वर्ष शुद्ध पानी की कमी के कारण मर जाते हैं। 70 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं है। गुणवत्ता की दृष्टि से विश्व के 122 देशों में भारत बहुत नीचे 120वें स्थान पर है। 75 प्रतिशत घरों में पीने के पानी की उचित व्यवस्था नहीं है। 84 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल द्वारा पानी की व्यवस्था नहीं है। भूमिगत पानी के 54 प्रतिशत कुंओं का स्तर घट रहा है। 21 प्रमुख नगरों में 2020 तक पानी उपलब्ध नहीं होगा। नीति आयोग जैसी एक उच्च स्तरीय संस्था द्वारा इस प्रकार की रिपोर्ट भारत के भविष्य की एक डरावनी तस्वीर सामने लाती है। इतना ही नहीं, कई जगह ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। पानी के लिए तरसते लोग आपस में झगड़ रहे हैं।

इतनी बड़ी समस्या और भविष्य में उसकी इतनी डरावनी तस्वीर-- यह एकदम तो उत्पन्न नहीं हो गई। नीति आयोग को इसके कारणों पर भी प्रकाश डालना चाहिए था। बहुत से कारण हैं और हो सकते हैं, परन्तु सबसे प्रमुख और बुनियादी कारण बढ़ती आबादी का प्रकोप है। हम 34 करोड़ से बढ़कर 136 करोड़ हो गए। प्रतिवर्ष 1 करोड़ 60 लाख बढ़ रहे हैं। कुछ वर्षों के बाद भारत चीन को पीछे छोड़कर विश्व में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। प्रकृति के सभी साधनों की एक सीमा है परन्तु भारत की आबादी बढ़ाने की कोई सीमा नहीं है।

देश की राजधानी दिल्ली गैस चैम्बर बन गई है। बच्चों की बीमारियां बढ़ रही हैं। पूरे नगर का कूड़ा-कचरा जिस एक स्थान पर इकट्ठा किया जाता है वहां एक बहुत बड़ा पहाड़ बन गया। पिछले दिनों उसमें आग सुलगी, गिरा और उसके नीचे 2 लोग मर गए। कूड़े-कचरे के इस ढेर की गंध सुप्रीमकोर्ट तक पहुंची और कोर्ट ने पूछा कि इसकी व्यवस्था करने की जिम्मेदारी किसकी है। दिल्ली में प्रतिदिन सैंकड़ों नई गाडिय़ां सड़क पर आ रही हैं।

भीड़ बढ़ रही है, यातायात रुक रहा है। इस संबंध में भी सुप्रीम कोर्ट को पूछना पड़ा, इसकी व्यवस्था क्यों नहीं हो रही। देश की राजधानी दिल्ली में यदि सरकार कूड़ा-कचरा नहीं संभाल सकती और यातायात को व्यवस्थित नहीं कर सकती तो सरकार देश को कैसे संभालेगी। इस समस्या का सबसे बड़ा कारण बढ़ती आबादी का विस्फोट है।

बढ़ती आबादी के दबाव में सैंकड़ों गैर-कानूनी बस्तियां बस गईं। कई प्रदेशों में अवैध निर्माण हो गए। बढ़ती आबादी के कारण मकानों की जरूरत बढ़ी है और सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार से पूरे देश के सभी स्थानों पर अवैध निर्माण हुए हैं। कई बार सारा मामला न्यायपालिका के पास जाता है। अवैध निर्माण गिराने का आदेश दिया जाता है।

बुल्डोजर करोड़ों की सम्पत्ति को ध्वस्त करता है। अधिक आबादी के दबाव में मकानों के निर्माण के लिए रेत और बजरी की आवश्यकता पड़ती है। उपलब्धता कम होती है, लोग चार गुना भाव पर खरीदने के लिए तैयार होते हैं तो अवैध खनन होता है। पूरे देश में रेत माफिया खड़ा हो गया। कई जगह नदी-नालों की रेत निकाल ली, अब उनकी आन्तडिय़ां तक कुरेदी जा रही हैं।

बढ़ती आबादी के दबाव में कई जगह जंगल कट गए, पशु-पक्षी परेशान हो गए। अब बंदर, चीते और हाथी तक बस्तियों में घुसने शुरू हो गए हैं। बंदरों के कारण हिमाचल में हजारों किसानों ने खेती करना बंद कर दिया है। सब प्रकार की विकास योजनाओं के बाद भी भारत में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ी है। एक तरफ भारत विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, विश्व के 6 अमीर देशों में भारत का नाम है, प्रतिवर्ष अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, परन्तु दूसरी तरफ दुनिया में सबसे अधिक भूखे लोग भारत में रहते हैं।

कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक भारत में है। विश्व में सबसे अधिक आॢथक विषमता भारत में है। भूख सूचकांक में भारत सबसे नीचे के देशों में है। बढ़ती बेरोजगारी की हालत यह है कि पुलिस के सिपाही और चपड़ासी के पद के लिए लाखों उम्मीदवार और उनमें बी.ए. और एम.ए. भी शामिल। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण युवा पीढ़ी निराश-हताश हो रही है। आत्महत्याओं की संख्या बढ़ रही है। नशे के बढ़ते प्रकोप का एक कारण यह भी है।

राजधानी के किसी बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों की भीड़ को देख कर हैरानी होती है कि कैसे डाक्टर उन्हें देखते हैं और दवाई देते हैं। बरामदे तक खचाखच भरे रहते हैं। सड़क, अस्पताल और जेलों की भीड़ पर तो सुप्रीम कोर्ट को यह तक कहना पड़ा कि कैदियों को पशुओं की तरह नहीं रखा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने पिछले 4 वर्षों में पूरी योजना को नई दिशा दी है। गांव-गरीब व किसान के लिए नई योजनाएं प्रारम्भ की हैं परन्तु मुझे डर है कि इन योजनाओं से होने वाले लाभ को बढ़ती आबादी का दानव न निगल जाए।

चीन ने बढ़ती आबादी रोक ली। यदि समय रहते चीन की तरह भारत भी संभल गया होता और देश की आबादी 100 करोड़ पर रोक दी होती तो आज देश की ऐसी चिन्ताग्रस्त परिस्थिति न होती। इस सारी समस्या के संबंध में सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि देश की राजनीति इस संबंध में बिल्कुल मौन धारण किए हुए है। राजनीतिक दल कई बार छोटी अनावश्यक समस्याओं पर भी आवाज उठाते हैं परन्तु जनसंख्या वृद्धि पर कोई भी राजनीतिक दल कुछ नहीं कहता।

इसका सबसे बड़ा कारण वोट की राजनीति है। हैरानी मुझे इस बात की हुई कि नीति आयोग ने पानी की समस्या की भयावहता को तो बड़े विस्तार से बताया परन्तु उस समस्या के सबसे बड़े कारण बढ़ती आबादी के प्रकोप पर कुछ नहीं कहा। मुझे देश के मीडिया पर भी हैरानी होती है। इस समस्या के संबंध में एक प्रबल जनमत खड़ा करना चाहिए। उनके सामने तो वोट की राजनीति जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।

समाज के कुछ वर्गों में जागरूकता के कारण जनसंख्या नियंत्रण हो रहा है, पर कुछ वर्गों में बहु-विवाह के कारण या किसी अन्य कारण से जनसंख्या बहुत बढ़ रही है। एक चिंताजनक असंतुलन बन रहा है। उसके कारण समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। इन सब समस्याओं का एक ही समाधान है, देश नया संकल्प करे, ‘‘हम दो हमारे दो अब सब के भी दो’’। इतना ही नहीं, एक बच्चे के परिवार को प्रोत्साहन दिया जाए। अधिक सुविधाएं दी जाएं। आबादी रोकना ही जरूरी नहीं, कम करना भी जरूरी है।

इस संबंध में निर्णय लेने पर तुरन्त कोई विशेष लाभ नहीं होगा परन्तु कुछ वर्षों के बाद देश को लाभ होना शुरू होगा। हमने अपना वर्तमान तो खराब कर लिया परन्तु देश के भविष्य को संभालने की कोशिश अवश्य करनी चाहिए। अब पानी सिर के ऊपर निकल गया है। सभी दलों को मिलकर एक राष्ट्रीय सहमति बनाकर एक राष्ट्रीय जनसंख्या नीति बनानी चाहिए। कुछ भी करें, कैसे भी करें, परन्तु अब इस समस्या के समाधान को टाला नहीं जा सकता।

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