Saturday, Mar 23, 2019

‘पैडमैन’ अपना संदेश सारी दुनिया में पहुंचाना चाहते हैं 

  • Updated on 3/5/2019

कोयम्बटूर  के रहने वाले 56 वर्षीय  समाज सेवी एवं उद्यमी अरुणाचलम मुरुगनंथम के हाथ में पकड़े हैंडसैट पर बधाई देने वाली काल्स तथा संदेश लगातार आ रहे थे। उनके कार्य को दर्शाने वाली दस्तावेजी फिल्म ‘पीरियड: एंड आफ सैंटैंस’ ने सर्वश्रेष्ठ शार्ट डाक्यूमैंटरी श्रेणी में आस्कर जीता है।

मुरुगनंथम का कहना है कि वह बहुत खुश हैं। उन्हें कभी भी आस्कर अवार्ड जीतने की आशा नहीं थी। यह विषय (माहवारी के दौरान स्वच्छता) विश्व भर के दर्शकों तक पहुंच गया है। न केवल भारत में बल्कि केन्या, यूगांडा अथवा बंगलादेश में भी महिलाएं दस्तावेजी के माध्यम से माहवारी के दौरान स्वच्छता रखने बारे सीख सकती हैं। 

मुरुगनंथम के जीवन से प्रभावित अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन’ ने भारत में एक बड़ा प्रभाव छोड़ा था। मुरुगनंथम ने कहा कि ‘पीरियड : एंड आफ सैंटैंस’ को मिलने वाला आस्कर इस विषय को विभिन्न देशों में और अधिक लोगों तक ले जाएगा।

उन्होंने कहा कि उन्हें महिलाओं से बहुत-सी काल्स मिली हैं, जिन्होंने फिल्म देखी है और उन्होंने न केवल स्वयं नैपकिन्स का इस्तेमाल शुरू किया है बल्कि अन्य महिलाओं को भी शिक्षित कर रही हैं। उनके अनुसार यही वास्तविक अवार्ड है। 
लगभग  7 वर्षों के शोध के बाद अरुणाचलम मुुरुगनंथम ने 2004 में कम लागत के सैनेटरी नैपकिन्स बनाने के लिए 
मशीनों का निर्माण शुरू किया था। ये मशीनें मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित की गई हैं जहां महिलाएं नैपकिन्स बनाती और बेचती हैं। उन्होंने बताया कि भारत भर में उन्होंने 5300 मशीनें स्थापित की हैं। एक लाख से अधिक महिलाओं को उनसे रोजगार मिला है और वे सैनेटरी पैड्स के विभिन्न 1500 ब्रांड तैयार करती हैं। 

उनका उद्देश्य महिलाओं में सैनेटरी नैपकिन्स के 100 प्रतिशत इस्तेमाल का लक्ष्य हासिल करना तथा 10 लाख महिलाओं को स्व:रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना है। उन्होंने 24 अन्य देशों में भी मशीनें स्थापित करवाई हैं जिनमें से 6 मशीनें पाकिस्तान तथा 10 मशीनें बंगलादेश में शामिल हैं।

उन्होंने अफगानिस्तान में महिलाओं के एक समूह को प्रशिक्षित किया है। एक मशीन इसी माह 8 तारीख को चेन्नई में स्थापित की जाएगी जिसका संचालन 20 मूक-बधिर महिलाएं करेंगी। 
मुरुगनंथम के अनुसार चुनौती मशीनों को स्थापित करने की नहीं है बल्कि सैनेटरी नैपकिन्स के इस्तेमाल के खिलाफ वर्जना को तोडऩे की है। 

उन्होंने कहा कि बहुत से समुदायों में पैड्स के इस्तेमाल के विरुद्ध मान्यताएं हैं। ऐसी मान्यताएं बहुत से अन्य देशों में भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को माहवारी के दौरान स्वच्छता का विषय भी पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। 
दिल्ली सरकार उनके जीवन के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की योजना बना रही है।                                                                                                                                                 ---एम.एस. प्रीथा

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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