Saturday, Oct 01, 2022
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padmashree awadhesh kaushal, the pioneer of the eradication of bonded labor, passed away

बधुआ मजदूरी उन्मूलन के प्रणेता, पद्मश्री अवधेश कौशल का निधन

  • Updated on 7/12/2022

देहरादून/ब्यूरो। पदमश्री से सम्मानित अपनी जीवटता व संघर्ष के प्रतीक अवधेश कौशल का आज देहरादून के मैक्स हॉस्पिटल में  निधन हो गया। उन्हें जन सरोकारों के लिए व सत्ताप्रतिस्थानों के विरुद्ध संघर्ष के लिए सदैव याद किया जाएगा।

अवधेश कौशल ने अपना 86 वर्ष का जीवन दबे- कुचलों के हितों में खपा दिया। जहां भी नागरिक हितों की अनदेखी का सवाल आता है, वहां 86 वर्ष के वयोवृद्ध समाजसेवी पद्मश्री अवधेश कौशल डटकर खड़े दिख जाते थे। लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों की मिलने वाली सुविधाओं को हाई कोर्ट में चुनौती दे बंद करा दिया था।

जन सरोकारों की जो लड़ाई उन्होंने बंधुआ मजदूरी के खात्मे के लिए वर्ष 1972 में शुरू की थी, अंतिम समय तक तमाम मुकाम हासिल कर अनवरत जारी रही। आज अगर देश में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन अधिनियम-1976 लागू है तो उसका श्रेय पद्मश्री अवधेश कौशल को ही जाता है। वर्ष 1972 में तमाम गांवों का भ्रमण करने के बाद जब अवधेश कौशल ने पाया कि बड़े पैमाने पर चकराता क्षेत्र में लोगों से बंधुआ मजदूरी कराई जा रही है तो वह इसके खिलाफ खड़े हो गए।

उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की और बंधुआ मजदूरी का सर्वे करवाया। सरकारी आंकड़ों में ही 19 हजार बंधुआ मजदूर पाए गए। इसके बाद वर्ष 1974 में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को बंधुआ मजदूरी से ग्रसित गांवों का भ्रमण कराया। जब सरकार को स्थिति का पता चला तो वर्ष 1976 में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन एक्ट लागू किया गया। इसके बाद भी जब बंधुआ मजदूरों को समुचित न्याय नहीं मिल पाया तो इस लड़ाई को अवधेश कौशल सुप्रीम कोर्ट तक लेकर गए और दबे- कुचले लोगों के लिए संरक्षण की राह खोलकर ही दम लिया।

हालांकि, जनता के हितों के संरक्षण का उनका अभियान यहीं खत्म नहीं हुआ और पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील दून घाटी में लाइम की माइनिंग के खिलाफ भी अस्सी के दशक में आवाज पी आइ एल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट बुलंद की। माइनिंग से मसूरी के नीचे के हरे- भरे पहाड़ सफेद हो चुके थे। इसके खिलाफ भी कौशल ने सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी और संवेदनशील क्षेत्र में माइनिंग को पूरी तरह बंद कराने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

विकास से उपक्षित वन गूजरों के अधिकारों को संरक्षित करने का बीड़ा भी अवधेश कौशल ने उठाया था उसके लिए लंबी लड़ाई के बाद केंद्र सरकार वर्ष 2006 में शेड्यूल्ड ट्राइब्स एंड अदर ट्रेडिशनल फॉरेस्ट ड्वेल्स एक्ट में वन गूजरों को संरक्षित किया गया।

अलग-अलग आयाम से यह लड़ाई अंतिम समय तक जारी रही। गूजरों के परिवारों के लिए दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूल संचालन, महिला अधिकारों और पंचायती राज में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए अवधेश कौशल रूलक संस्था के माध्यम से अंतिम समय तक प्रयासरत रहें हैं। वे सदैव अपनी जीवटता के लिए जाने जाएंगे।

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