Wednesday, Jun 29, 2022
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दिल्ली वालों के लिए पीएम 2.5 के कण साबित हो रहे जानलेवा

  • Updated on 5/15/2022

नई दिल्ली/पुष्पेंद्र मिश्र। देश में दिल्ली में वायु स्वच्छता सूचकांक की मापक इकाई पार्टिकुलेट मैटर(पीएम 2.5) का प्रभाव सर्वाधिक देखा गया है। दिल्ली में वार्षिक रूप से पीएम 2.5 का प्रसार करीब 110 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर क्यू तक बढ़ जाता है। वहीं इसका प्रसार सर्दियों में सर्वाधिक 250 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर क्यू हो जाता है। जिसके कारण बीते वर्षों में सर्दियों में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी गई।

पीएम 2.5 के अमोनियम नाइट्रेट और अमोनियम सल्फेट से सर्दियों में मृत्युदर बढ़ी
इसी मामले पर हाल ही में सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेस आईआईटी दिल्ली, सेंट जॉन मेडिकल कॉलेज बेंगलुरू और सीएसआईआर नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी गाजियाबाद ने एक शोध प्रकाशित किया है। जिसके अनुसार यूएस या जापान की तरह दिल्ली में लोगों को आयरन, आर्सेनिक व लेड से इतना खतरा नहीं है जितना जीवाष्म ईंधन को जलाने, बायोमास जलने से उत्सर्जित कार्बन और डीजल वाहनों से उत्सर्जित सल्फेट-नाइट्रेट से हो रहा है।

65 वर्ष से ऊपरी आयु के बुजुर्गों के लिए बढ़ा है खतरा
नाइट्रेट और सल्फेट दिल्ली की हवा में अमोनिया से अभिक्रिया कर अमोनियम नाइट्रेट बनाते हैं। शोध कर्ताओं ने कहा कि केवल दो दिनों के लिए हवा में अमोनियम नाइट्रेट के विसर्जन से मृत्युदर में 3.89 फीसद और अमोनियम सल्फेट के केवल एक दिन के प्रसार से मृत्यु दर में 2.4 फीसद की बढ़ोत्तरी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने कहा कि दिल्ली में पीएम 2.5 के कण ज्यादा खतरनाक हैं।

वर्ष 2017 में 11732 लोगों ने की जान प्रदूषण के कारण गई थी
इसलिए दिल्ली में जलने वाले बॉयोमास जीवाष्म ईंधन के बारे में पुन: विचार करना चाहिए। इस तरह की रासायनिक अभिक्रियाओं से दिल्ली के बुजुर्गों खासकर 65 फीसद से अधिक आयु के लोगों को अधिक खतरा है। इसलिए शोध में जीवाष्म ईधन जलाने, बायोमास जलाने, वाहनों के प्रदूषण कम करने की तत्काल मांग की गई है। बता दें वर्ष 2017 में 11732 लोगों की जान प्रदूषण से गई थी। जिसके ज्यादातर मामले सर्दियों में आए थे।

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