Sunday, Mar 24, 2019

लोकसभा चुनाव के लिए पार्टियों ने फूंके बिगुल, ये 5 मुद्दे निभाएंगे अहम भूमिका

  • Updated on 3/12/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और राजनीतिक दल मैदान में उतर चुके हैं। 11 अप्रैल से 19 मई तक सात चरणों में वोट डाले जाएंगे और 23 मई को देश की नई सरकार का गठन हो जाएगा। 90 करोड़ से ज्यादा लोग वोटिंग करेंगे और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रित जश्न का हिस्सा बनेंगे। इस चुनाव में मोदी व उनकी टीम फिर से सत्ता में बने रहने के लिए ताकत झोंकेगी और बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अपना पहले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की टीम भी वापसी करने में कोई कमी नहीं छोड़ेगी। इस चुनाव में कुछ खास बातें हैं जिन पर सबका ध्यान होगा:-

सब कुछ नरेंद्र मोदी पर केंद्रित

2014 के चुनाव में मोदी ने भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। भाजपा ने 428 सीटों पर चुनाव लड़कर 282 पर जीत हासिल की थी। 1984 के बाद यह पहला मौका था जब किसी राजनीतिक दल ने स्पष्ट रूप से बहुमत हासिल किया था। इस प्रचंड जीत का सारा श्रेय नरेंद्र मोदी के सिर ही था। मोदी ने खुद को भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने वाला प्रचारित किया था
और लोगों से अच्छे दिन आने का वायदा किया था। हालांकि उनके द्वारा किए गए वायदों को पूरा करने में वे पूरी तरह से सफल नहीं रहे हैं लेकिन फिर भी वे अपनी पार्टी के लिए वोट खींचने के काम में अव्वल साबित हुए हैं। इसमें उनका सहयोग पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये चुनाव मोदी द्वारा किए कार्यों पर जनमत भी
साबित होंगे। 

वापसी की आस में कांग्रेस...

देश की 133 साल पुरानी पार्टी सत्ता में वापिस आने के लिए प्रयास करेगी। 2014 के चुनाव में इस पार्टी को केवल 44 सीटें ही मिली थी। और यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन था। इससे पहले उसकी 206 सीटें थी। 2014 के बाद से इस पार्टी का प्रदर्शन देश में हुए दूसरे चुनावों में भी खराब ही बना रहा। 2018 के मध्य में आकर कांग्रेस को जरूर कुछ सुकून मिला। राजस्थान व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में उसकी सरकारें बनी। इस समय स्थिति यह है कि भाजपा 20 राज्यों में सरकारें चला रही है और कांग्रेस 3 राज्यों में। पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी देश के प्रसिद्ध नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य हैं। सोशल मीडिया पर मजाक का केंद्र बनते रहे राहुल गांधी पिछले कुछ समय से तेजी से उभरे हैं। पार्टी ने राहुल को अध्यक्ष के रूप में स्वीकारा है और उनकी बहन प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में उतरने से भी पार्टी में नई स्फूर्ति का संचार हुआ है।

इकॉनोमी का इकोनोमिक्स...

मोदी के कार्यकाल में देश की अर्थ व्यवस्था ने कई हिचकोले खाए हैं। फसलों की कीमत को लेकर किसान लगातार संघर्ष करते रहे हैं। नोटबंदी के बाद से देशभर से आवाजें उठी हैं। कि इसने छोटे रोजगारों को तबाह कर दिया। कई तरह के व्यापार बंद हो गए। इससे बेरोजगारी बढ़ी है। इसके अलावा नई कर प्रणाली के रूप में लागू किए गए जीएसटी ने भी
व्यापारियों व कारोबारियों की दिक्कतें बढ़ाई हैं। इसकी वजह से भी माना जा रहा है कि छोटे व्यापारियों की दिक्कतें बढ़ रही हैं और रोजगार पर इसका भी विपरीत असर पड़ा है। निर्यात में गिरावट आई है और बेरोजगारी बहुत बढ़ी है। इन मुद्दों को लेकर मोदी सरकार पर सवाल उठाए जाएंगे। इसके बावजूद मोदी सरकार ने भारी पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च
करके विकास की दर को 7 प्रतिशत पर बनाए रखा है। 

लोकलुभाव वादों पर भरोषा...

मोदी सरकार हो या फिर विपक्षी दल, सभी ने लोकलुभावन मुद्दों पर जोर रखा है। किसानों को ऋण माफी का मुद्दा काफी जोर शोर से उछला और सभी ने इसे लेकर मुद्दा बनाया। कांग्रेस शासित राज्यों में दस दिन के भीतर कर्जा माफ कराया गया। इसे राहुल गांधी ने अपनी पार्टी की बड़ी यूएसपी के रूप में प्रचारित किया। साथ ही इसे लेकर दूसरे दलों पर भी
दबाव बनाया गया कि वे भी अपने द्वारा शासित राज्यों में ऐसा ही करें। मोदी सरकार भी इस तरह के फैसलों से पीछे नहीं रही। लाभकारी योजनाओं से मिलने वाला फैसला सीधे खातों में ट्रांसफर कराए जाने को जोर शोर से प्रचारित किया गया। इसके अलावा किसानों के खातों में भी सीधे पैसा ट्रांसफर किए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई। ऊंची जाति के लोगों को भी
आरक्षण देने की मुहिम भी इसी तरह का लोकलुभावन फैसला है। 

राष्ट्रवाद पर संतुलन की कोशिश...

मोदी ने पांच साल में राष्ट्रवाद के एजेंडे को कसकर पकड़े रखा। इसे लेकर कई तरह की राय बनी लेकिन इसके बावजूद मोदी ने इस एजेंडे को बनाए रखा। हिंद राष्ट्र का एजेंडा भी साथ-साथ ही चलता रहा। यह बात और है कि इस मुद्दे के चलते कई स्थानों पर लिंचिंग हुई और भीड़ द्वारा मुसलमानों को मारने की कई घटनाएं हुई। गौवंश हत्या का मामला बड़ा मुद्दा बना रहा। कई तरह के सख्त नए नियमों को लागू किए जाने की वजह से गौ हत्या एक बड़ा मुद्दा बन गया। कट्टर हिंदूवाद को लेकर आलोचनाएं भी की गई। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में से एक भी मुस्लिम सांसद चुनकर लोकसभा नहीं पहुंचा। कैराना के उपचुनाव में पहली बार मुस्लिम सांसद चुना गया। 

उत्तर प्रदेश होगा निर्णायक

2014 के चुनाव और 2019 के चुनाव में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क साबित हो सकता है उत्तर प्रदेश। देश का हर छठा नागरिक इसी राज्य में रहता है। देश की संद में यहां से 80 सांसद चुनकर जाते हैं। पिछली बार भाजपा ने यूपी में 71 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था। भाजपा के इस प्रभाव को यूपी के विधानसभा चुनावों में भी 2017 में देखा गया। भाजपा
यहां से प्रचंड बहुमत के साथ जीतकर आई। यहां के प्रमुख दलों समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी ने इस बार गठबंधन कर लिया है। दलित मतदाता बसपा के साथ रहता है तो मुस्लिम मतदाता सपा के साथ। इस गठबंधन को निर्णायक माना जा रहा है। ये दोनों दल 50 सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं और अगर ऐसा होता है तो यह केंद्र में बनने वाली सरकार के लिहाज से निर्णायक साबित हो सकता है। हालांकि भाजपा ने इसे मौका परस्त गठबंधन करार दिया है। 

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