Saturday, Apr 04, 2020
petition filed in supreme court to curb hate speeches

नफरत फैलाने वाले भाषणों पर लगाम कसने के लिये सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

  • Updated on 2/27/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने आज सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर मांग की है कि  नफरत फैलाने वाले भाषण देने के अपराध से सख्ती से निबटा जाना चाहिये।  इस पर अगले कुछ दिनों में सुनवाई होने की उम्मीद है।     

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दिल्ली दंगे में 37 लोगों की हो गई है मौत

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुये दंगों से कुछ दिन पहले ही चंद नेताओं के कथित नफरत भरे भाषणों पर दिल्ली उच्च न्यायालय के कठोर रुख अपनाने के बाद इस तरह की जनहित याचिका का दायर होना महत्वपूर्ण है। इन दंगों में अभी तक कम से कम 37 व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है और करीब 200 अन्य जख्मी हुये हैं। इस जनहित याचिका में उपाध्याय ने गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय को विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट पर अमल करने का निर्देश देने का अनुरोध किया है।

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विधि आयोग ने सौंपी थी रिपोर्ट

विधि आयोग ने नफरत फैलाने वाले भाषणों पर लगाम के लिये मार्च, 2017 में यह रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। शीर्ष अदालत ने 2014 में विधि आयोग से कहा था कि यदि वह उचित समझे तो नफरत फैलाने वाले भाषण को परिभाषित करे और इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिये निर्वाचन आयोग को अधिक अधिकार देने के बारे में संसद से सिफारिश करे।  

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नए नियमों की है आवश्यकता

विधि आयोग ने नफरत फैलाने वाले भाषणों के संदर्भ में भारतीय कानून और विदेशों में इस बारे में कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करने के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारतीय दंड संहिता में इस समस्या से निबटने के लिये नये प्रावधान करने की आवश्यकता है। आयोग ने भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन कर इसमें धारा 153सी (घृणा को भड़काने पर रोक) और धारा 505ए (चुनिन्दा मामलों में भय या ङ्क्षहसा के लिये उकसाना) जोडऩे की सिफारिश की थी।

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अभिव्यक्ति की आजादी से लोग दे सकते है चुनौती

विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नफरत फैलाने वाले भाषण बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी को विषम चुनौती पेश करते हैं। इन चुनौतियों के प्रति संवैधानिक नजरिया समानता से बहुत दूर है क्योंकि नफरत को बढ़ावा देने की अनुमति नहीं होने और बोलने की आजादी के संरक्षण के बीच काफी अंतर है। रिपोर्ट ने इस संबंध में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों के कानूनी प्रावधानों का भी हवाला दिया था।      

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