Monday, Jan 21, 2019

जम्मू-कश्मीर में बदलने लगे राजनीतिक समीकरण

  • Updated on 12/25/2018

जम्मू -कश्मीर विधानसभा भंग होने के चलते आगामी लोकसभा के साथ संभावित विधानसभा चुनाव की आहट पाते ही राज्य में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक भाजपा कोटे से मंत्री रहे पीपुल्स  कांफ्रैंस के चेयरमैन सज्जाद गनी लोन जहां आगामी  चुनावों में भाजपा के साथ गठबंधन करने की संभावना को नकार रहे हैं, वहीं महागठबंधन करके पी.डी.पी. के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा करने वाली नैशनल कांफ्रैंस अब पी.डी.पी. में ही सेंध लगाकर उसके बड़े नेताओं को अपने खेमे में लाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही।

नतीजतन, पीपुल्स कांफ्रैंस और नैशनल कांफ्रैंस द्वारा मचाई गई छीना-झपटी में पी.डी.पी. अपने दर्जनभर वरिष्ठ नेताओं को गंवा चुकी है। कुछ नेता माकपा, पी.डी.एफ. आदि छोटे दलों पर आधारित तीसरे मोर्चे के गठन का भी दम भर रहे हैं लेकिन यह अभी दूर की कौड़ी भर है। इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस मूकदर्शक की भूमिका में ही नजर आ रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी द्वारा समर्थन वापस लिए जाने पर राज्य सरकार के पतन के बाद से ही कमजोर नेतृत्व के कारण पी.डी.पी. लगातार बिखराव की ओर अग्रसर है। इस बिखराव का कुछ फायदा जहां नैशनल कांफ्रैंस को मिल रहा है, वहीं पी.डी.पी. से विद्रोह करके आ रहे नेताओं ने पिछली विधानसभा में केवल 2 सदस्यों वाली पीपुल्स कांफ्रैंस को काफी मजबूती प्रदान की है। 

पीपुल्स कांफ्रैंस का नैटवर्क
यह कहना गलत नहीं होगा कि जमीनी स्तर पर जिस जनाधार एवं कार्यकत्र्ताओं का नैटवर्क तैयार करने में किसी भी नई पार्टी के पसीने छूट जाएं,  व्यापक जनाधार वाले पी.डी.पी. के बागी नेताओं के माध्यम से पीपुल्स  कांफ्रैंस को वह नैटवर्क बना-बनाया मिल गया है।

वर्ष 2014 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव से पीपुल्स कांफ्रैंस को भाजपा की बी टीम माना जाता रहा है और चुनाव के बाद जब भाजपा ने अपनी सहयोगी पी.डी.पी. की तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अपने कोटे से सज्जाद गनी लोन को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिलाया तो यह बात साबित भी हो गई।

6 माह पूर्व भाजपा द्वारा समर्थन वापस लिए जाने से जब  महबूबा सरकार का पतन हुआ तो भाजपा के समर्थन से केवल 2 विधायकों वाली पीपुल्स कांफ्रैंस के चेयरमैन सज्जाद गनी लोन को मुख्यमंत्री बनाने की कवायद शुरू हो गई। 

जम्मू-कश्मीर विधानसभा होने के दिन भी सज्जाद गनी लोन ने भाजपा के 25 एवं पी.डी.पी. के 18 असंतुष्ट विधायकों के समर्थन से ही नई सरकार के गठन का दावा पेश किया था लेकिन अब लोन ने भाजपा के साथ गठबंधन किए बिना राज्य की सभी 87 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया है।

उन्हें पता है कि भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 एवं 35-ए के लिए संघर्ष करके जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को बचाने और कश्मीर मसले के समाधान के लिए पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत नहीं कर पाएंगे। मगर क्या जनता लोन और भाजपा के बीच पिछले 4 वर्ष में बने प्रगाढ़ संबंधों को इतनी जल्दी भुला पाएगी?

महागठबंधन का हश्र
उधर, पीपुल्स कांफ्रैंस और भाजपा की सत्ता में वापसी की मुहिम को रोकने के लिए राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद की पहल पर पी.डी.पी.-नैशनल कांफ्रैंस-कांग्रेस ने जो महागठबंधन बनाया था वह तो राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग करने की घोषणा के तुरंत बाद इसके सूत्रधार आजाद के उस हैरानी भरे बयान से ही धराशायी हो गया जिसमें उन्होंने कहा था कि नैशनल कांफ्रैंस एवं कांग्रेस ने पी.डी.पी. को अभी समर्थन पत्र नहीं दिया है तो पी.डी.पी. अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सरकार गठन का दावा पेश कैसे कर दिया।

इसके अगले ही दिन पार्टी विधायक दल की बैठक के बाद नैशनल कांफ्रैंस के उमर अब्दुल्ला ने भी वही बात दोहराते हुए महबूबा की जल्दबाजी पर सवाल खड़े कर दिए। 

उधर, दर्जनभर बड़े नेताओं के पार्टी को अलविदा कहने के  बावजूद पी.डी.पी. में बिखराव का सिलसिला अभी थमता नजर नहीं आ रहा है। नैशनल कांफ्रैंस नेतृत्व ने भाजपा द्वारा पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए गए एक पूर्व विधायक को अपनी पार्टी में शामिल करके जम्मू संभाग में भी जनाधार बढ़ाने का संदेश देने का प्रयास किया है।

पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तो जम्मू के लोगों से नैशनल कांफ्रैंस को वोट देने की जोरदार अपील भी की है लेकिन पार्टी अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला द्वारा दिए गए आपत्तिजनक बयानों के मद्देनजर जम्मू संभाग में कुछेक पुरानी सीटों को छोड़कर उमर अब्दुल्ला की अपील का शायद ही ज्यादा असर हो पाए। 

कांग्रेस को झटका
उधर, भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल हैं जिनके पुराने सहयोगी भी आगामी चुनावों में उनका साथ लेने को तैयार नहीं हैं। विशेष तौर पर कांग्रेस को तो नैशनल कांफ्रैंस से करारा झटका लगा है क्योंकि लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के कारण नैशनल कांफ्रैंस अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला तो श्रीनगर-बडग़ाम संसदीय क्षेत्र से विजयी होकर लोकसभा पहुंच गए लेकिन जब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गुलाम अहमद मीर की बारी आई तो सुरक्षा कारणों से अनंतनाग-पुलवामा संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव ही स्थगित हो गया।

अब देखना है कि राजनीतिक दलों में छिड़ा शह-मात का यह खेल चुनावों तक कितनी करवटें लेता है और अंत में किस अंजाम तक पहुंचता है।                                                                                                        ---बलराम सैनी   

 

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