Monday, Mar 30, 2020
politicians and workers doubts over delhi riots

दिल्ली के दंगों को लेकर अब राजनीतिज्ञों व वर्करों पर संदेह के बादल

  • Updated on 2/28/2020

11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पारित होने के तुरंत बाद इसके पक्ष और विपक्ष में शुरू हुए देशव्यापी धरनों-प्रदर्शनों के 4 दिन बाद ही 15 दिसंबर को शाहीन बाग में इसके विरुद्ध शुरू हुआ महिलाओं का धरना-प्रदर्शन 27 फरवरी को 74वें दिन भी जारी रहा।

इसी बीच 23 फरवरी को पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद से सीएए को लेकर शुरू हुए दंगों में अभी तक 38 लोगों की मृत्यु हो गई और 200 से अधिक लोग घायल होकर अस्पतालों में पड़े हैं।

इन दंगों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो गया है और दिल्ली हिंसा मामले में सुनवाई करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस मुरलीधर के तबादले को लेकर कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए इसे कपिल मिश्रा और कुछ अन्य भाजपा नेताओं को बचाने का षड्यंत्र बताया है।

हिंसा में मारे गए इंटेलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा के परिजनों ने कथित तौर पर 'आप' पार्षद ताहिर हुसैन पर हत्या का आरोप लगाया है। यह आरोप भी है कि 25 फरवरी को उनके चांद बाग स्थित मकान से उपद्रवियों ने लोगों पर पथराव किया और पेट्रोल बम फेंके।

ताहिर इससे इनकार करते रहे लेकिन 27 फरवरी को सामने आए एक वीडियो में उनके घर की छत पर काफी संख्या में बोरों में भरे पत्थर, पत्थर फैंकने के लिए गुलेल, एसिड और पैट्रोल बम बिखरे पाए गए। ताहिर हुसैन ने इसे उन्हें बदनाम करने की भाजपा की साजिश बताया है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि 'कोई भी दंगाई चाहे वह किसी भी पार्टी का हो उसे बख्शा न जाए और दंगों में शामिल लोगों का संबंध ‘आप’ के साथ पाए जाने पर उसे दोगुनी सजा दी जाए।'

इसके विपरीत केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कांग्रेस और 'आप' पर दिल्ली दंगों का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि 'पिछले साल दिसंबर में सोनिया गांधी के 'आर या पार' के आह्वान के बाद 2 महीने तक हिंसा भड़काने की कोशिश की गई।'

एक समाचार के अनुसार जहां उपद्रवियों का एक वर्ग कथित रूप से एक अस्पताल के चिकित्सा अधिकारियों से यह कहता सुना गया कि वे घायलों का इलाज न करें, वहीं एक अन्य समाचार के अनुसार कम से कम एक पुलिस कर्मचारी को चिल्लाते हुए प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग से दूसरे वर्ग के प्रदर्शनकारियों पर पत्थर मारने के लिए कहता सुना गया है।

इस घटना के चलते जहां अनमोल प्राण जाने के अलावा वर्षों से एक साथ मिलजुल कर रहते आ रहे लोगों के आपसी रिश्तों और विश्वास को ठेस लगी है वहीं बड़ी संख्या में प्राण हानि के चलते अनेक परिवार उजड़ गए, करोड़ों रुपए की संपत्ति को नष्ट कर दिया गया। अनेक भयभीत लोग अस्थायी रूप से अपने घर छोड़ सुरक्षित स्थानों को जाने लगे हैं।

इन दंगों से निपटने के मामले में दिल्ली पुलिस तथा अन्य उच्चाधिकारियों की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं। यह भी पूछा जा रहा है कि भड़काऊ भाषण देने वालों के विरुद्ध समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्तों व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि 'पुलिस से चूक हुई है। पुलिस भड़काऊ भाषण देने वालों को शुरू में काबू नहीं कर पाई। दोनों ही पक्षों के लोगों को आमने-सामने से आने से रोक दिया जाता तो हिंसा नहीं होती।'

दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त आमोद कंठ के अनुसार, 'दिल्ली पुलिस ने शुरू में पर्याप्त फोर्स क्यों नहीं निकाली? पुलिस में फोर्स की कमी नहीं है। सवाल उसके इस्तेमाल का है। जब वहां एक प्रदर्शन पहले से चल रहा था तो सीएए के समर्थकों को प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी।'

इस बीच दिल्ली के खुरेजी में प्रदर्शन स्थल पर पुरुष पुलिस अधिकारियों द्वारा सीसीटीवी कैमरे तोड़ने, महिला प्रदर्शनकारियों से दुर्व्यवहार करने के प्रमाण भी सामने आए हैं।

इस दुखद घटनाक्रम की सच्चाई तो शायद घटना की जांच के बाद ही सामने आएगी परंतु अब जबकि दिल्ली के प्रभावित क्षेत्रों में स्थिति सामान्य होने की ओर बढ़ रही है, सभी राजनीतिक दलों और सरकार को आपस में मिल-बैठकर परस्पर सद्भाव और सहयोग से हालात पटरी पर लाने की दिशा में प्रयास करने चाहिए।

हिन्दू हो, मुसलमान हो या फिर सिख या ईसाई हो, दिल्ली सबकी है और इसकी रक्षा करना सबका दायित्व है। आज दिल्ली पुकार-पुकार कर कह रही है, 'मुझे न जलाओ।'

दिल्ली पुलिस और प्रशासन को भी अब अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है ताकि देश की राजधानी का माहौल शांत हो और इस तरह की विनाशलीला और तबाही फिर कभी न हो।   

—विजय कुमार 

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