Tuesday, May 21, 2019

नदियों को नाले में तब्दील करने की ‘राजनीति’

  • Updated on 4/30/2019

ऋषिकेश के दक्षिणी छोर पर रंभा नामक छोटी नदी गंगा में मिलती है। इसके अलावा ऋषि कुंड और सरस्वती कुंड से निकलने वाली धाराओं का स्रोत यमुनोत्री से निकलने वाली यमुना और बद्रीनाथ के समीप निकलने वाली सरस्वती को माना जाता है। दोनों ही जलधाराएं त्रिवेणी घाट पर कभी गंगा में मिलती रही हैं।

फलत: इसे त्रिवेणी संगम कहा गया। अब इनकी हालत बदल चुकी है। इस घाट के समीप स्थित ऋषि कुंड दिखता तो है, पर प्रदूषण की समस्या का सामना करता यह स्रोत दम तोड़ रहा है। अब यह जलराशि गंगा तक पहुंचती भी नहीं है। सरस्वती की हालत इस कदर दयनीय है कि इसे ठीक से देख पाना तक मुमकिन नहीं है।

भू-माफियाओं ने इस पर कब्जा कर अट्टालिकाएं खड़ी की हैं, पर यह सदानीरा स्रोत अब तक निर्जल नहीं हो सका है। भू-माफियाओं के कैदी तहखाने में जमा होने वाला जल रात के अंधेरे में उसी गंदे नाले की भेंट चढ़ता है, जिसने सरस्वती की पुण्य सलिला धारा को बदरंग करने में कोई कसर शेष नहीं रखी है। शासन-प्रशासन और स्थानीय लोग इन गतिविधियों से अनजान भी नहीं हैं।

रंभा और सरस्वती जैसी छोटी नदियों को सरकार की नमामि गंगे परियोजना में नाला कहा गया है। यह उन पवित्र धाराओं की परिभाषा बदलने का सरकारी अभियान प्रतीत होता है, जिन्हें शास्त्र-पुराणों में भी पवित्र माना गया है। जल बिरादरी इससे क्षुब्ध होकर विरोध कर रही है।

हाल ही में नमामि गंगे परियोजना के प्रदेश प्रमुख और उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष समेत 7 लोगों ने रंभा और सरस्वती नदी को नाले में तबदील करने के विरुद्ध आवाज बुलंद की है। नगर निगम के महापौर से इसकी परिभाषा नहीं बदलने की गुहार के साथ 5 सूत्रीय मांग की गई है। इसमें रंभा और सरस्वती नदी के संरक्षण के लिए विशेष प्राधिकरण गठित करने की बात भी कही गई है।

गांव के लोग बागड़ से खादर की ओर बहते जलस्रोतों को नदी व नाला कहते हैं। ब्रिटिश नगर नियोजन की व्यवस्था में इनसे सीवर लाइन का काम लिया गया। इस व्यवस्था ने जलस्रोतों को दूषित किया। साथ ही नदी और नाले के बीच का फासला पाटने का काम किया। हालांकि इनमें मौलिक भेद है।

बरसाती जल का प्रवाह नाला कहलाता है। ऐसा प्रवाह यदि किसी सदानीरा प्राकृतिक स्रोत से जुड़ा हो तो उसे नदी माना जाता है। कुदरती स्रोतों से संपर्क के कारण ही रंभा और सरस्वती नदी कहलाती हैं।

एक अर्से से इनकी भूमि पर कब्जा करने में लगे लोग इसी ऋषिकेश के निवासी हैं लेकिन आज इसके लिए जिम्मेदार सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना है। इन स्रोतों की रक्षा के लिए जिम्मेदार सरकार ही यदि इन्हें नालों में तबदील करने पर आमादा हो तो निश्चय ही इन्हें गंदा नाला बनने से रोक पाना असंभव होगा।

किसी नदी को नाले में तबदील करना प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का संगीन मामला है। इसका दायरा ऋषिकेश तक ही सीमित नहीं है। देश भर में कई जगह ऐसी कोशिशें चल रही हैं। तमाम छोटी नदियों को गंदे नाले में तबदील करने का उपक्रम कई दशकों से चल रहा है।

ऐसा करने से पर्यावरण की अपूर्णीय क्षति होती है। पर इसका राजनीतिक अर्थशास्त्र फायदे का ही सौदा माना जाता है। साथ ही शासन-प्रशासन नदी के संरक्षण की मुश्किलों से भी बच जाते हैं। विकास के ठेकेदारों को लाभ ही लाभ है। आसपास के लोगों को अतिक्रमण के लिए खाली जमीन मिल जाती है परंतु इसका अंतिम सच हानिकारक ही साबित होता है।

आजादी से पहले ही महात्मा गांधी से प्रेरणा लेकर मीरा बेन (मेडलिन स्लेड) ने ऋषिकेश को अपना केन्द्र बनाया था। नगर की दक्षिणी सीमा पर स्थित बापूग्राम और पशुलोक आश्रम आज भी इसकी गवाही देते हैं। वापस इंगलैंड लौटने से पहले तक वह यहां सक्रिय रहीं। इसी बापूग्राम और तीर्थनगरी के बीच की पहाड़ी को काट कर 60 के दशक में राष्ट्रीय राजमार्ग बनाया गया था।

इससे सीख लेकर पहाडिय़ों पर अतिक्रमण का सिलसिला शुरू हुआ। नतीजतन काले की ढाल नामक यह क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है, पर यह भूमि जैसे सिकुड़ रही है, ठीक वैसे ही इसकी फिजा में घुला समीर फैल रहा है। दरअसल रंभा झील से उठने वाले समीर से इस क्षेत्र को विशेष पहचान मिलती है।

इसे संजय झील भी कहते हैं। इसके समीप ही शिवालिक की पहाड़ी पर कई सदानीरा स्रोत और भी हैं। इन सभी जलस्रोतों के मिलने से ही यह झील बनती है। फिर एक सदानीरा नदी भी निकलती है। करीब 4-5 किलोमीटर की दूरी तय कर रंभा नामक यह छोटी नदी वीरभद्र महादेव मंदिर के पास गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा-यमुना की तरह इसके विषय में भी स्कंद पुराण के केदार खंड में वर्णन है।

20 हजार करोड़ रुपए की नमामि गंगे परियोजना का अहम हिस्सा हरिद्वार, ऋषिकेश और बनारस जैसे तीर्थ स्थलों के नाम है। केवल ऋषिकेश में ही आज 127 करोड़ की योजनाओं पर काम चल रहा है। डाऊनस्ट्रीम में लक्कड़घाट के पास 26 एम.एल.डी. क्षमता का सीवर ट्रीटमैंट प्लांट, इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए जरूरी पमिं्पग स्टेशन और रंभा एवं सरस्वती नालों को पक्का करने का काम इसी की कडिय़ां हैं।

हालांकि इन छोटी नदियों और इनके सदानीरा स्रोतों को संरक्षित कर ऐसा दर्शनीय क्षेत्र विकसित किया जा सकता है, जो हिमालय के फुटहिल्स में ही दुर्गम पहाड़ी पर स्थित नदियों के उद्गम को समझने में मददगार साबित हो। ऐसा करने से इनकी परिक्रमा का पुराना रिवाज भी पुन: शुरू हो सकता है।

एक पुरानी कहावत है। कलिकाल में गंगा और यमुना तो खूब उछलती हैं, पर सरस्वती मंद पड़ जाती है। यह ऋषिकेश में आज भली-भांति चरितार्थ हो रहा है। पर्यावरण की अपूर्णीय क्षति को नजरअंदाज करने के कारण उत्तराखंड के निवासियों ने केदारनाथ की तबाही देखी है इसलिए यदि इन 7 लोगों के सहयोगियों की संख्या शीघ्र ही बढ़ जाए तो कोई अचरज की बात नहीं होगी।

क्या ऐसा जनसमूह सरकारी नीतियों को तबदील कराने में सक्षम होगा? इस प्रश्न का उत्तर तो वक्त ही बताएगा, पर आॢथक संकट से जूझता ऋषिकेश नगर निगम इस चुनौती को एक ऐसे अवसर में बदल सकता है, जिससे खजाना खाली न हो। साथ ही नदियों को नाले में तबदील करने की राजनीति से मुंह मोड़ कर देश को नई दिशा दे सकता है।---कौशल किशोर

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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