Sunday, Mar 29, 2020
prashant kishor in bihar is challenge to nitish kumar

बिहार में 'सुशासन बाबू' के लिए चुनौती बने प्रशांत किशोर

  • Updated on 2/19/2020

नई दिल्ली / शैलेश। नाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) क्या अब एक नई पार्टी बनाएंगे? उनकी प्रेस कान्फ्रेंस तो कुछ ऐसा ही संकेत दे रही है। उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खुली चुनौती दे दी है। वह सौ दिन बिहार घूमेंगे और जन जागरण करेंगे। इसे उन्होंने ‘बात बिहार की’ यात्रा का नाम दिया है।

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नीतीश शासन में विकास नहीं
प्रशांत कह रहे हैं कि नीतीश के शासन में बिहार (Bihar) का असली विकास नहीं हुआ। 2005 में जब नीतीश ने सत्ता संभाली तब बिहार सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल था। नीतीश कुमार के करीब 15 सालों के शासन के बाद भी बिहार सबसे पिछड़े राज्यों की कतार में ही है। विकास की सूची में बिहार 22वेें नम्बर पर है। प्रशांत इसे 10 सर्वश्रेष्ठ राज्यों की सूची में लाने का सपना दिखा रहे हैं।

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प्रशांत किशोर की बिहार रणनीति
बिहार में विधानसभा के चुनाव नवम्बर में होने हैं। इसलिए प्रशांत किशोर का यह अभियान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रशांत को चुनावों का माहौल बदलने में माहिर माना जाता है। 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के चुनाव अभियान की रणनीति प्रशांत किशोर ने ही बनाई थी। बाद में वह नीतीश कुमार से जुड़ गए। 2015 के विधानसभा चुनावों की रणनीति बनाने में प्रशांत किशोर की अग्रणी भूमिका थी। पंजाब में कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में वाईएस आर कांग्रेस और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के लिए रणनीति भी उन्होंने ही बनाई थी। अब तक उनकी रणनीति सिर्फ उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों में असफल रही है। तब वह कांग्रेस के साथ थे।

चुनाव की रणनीति बनाते-बनाते प्रशांत की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी सामने आई। नीतिश कुमार ने उन्हें अपनी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और उसके पहले कश्मीर में धारा 370 में फेरबदल को लेकर प्रशांत और नीतीश में विवाद शुरू हुआ। उसका पटाक्षेप प्रशांत को पार्टी से निकाले जाने के बाद हुआ।

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प्रशांत के निशाने पर विकास
प्रशांत किशोर ने अपनी जिस रणनीति की घोषणा की है, उससे लगता है कि वह सीधे-सीधे सुशासन बाबू की राजनीतिक बुनियाद पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। नीतीश कुमार के राजनीतिक दबदबे के तीन मुख्य आधार प्रचारित हैं। पहला सुशासन यानी गुड गवर्नेंस, दूसरा अपराध पर नियंत्रण और तीसरा विकास। प्रशांत ने विकास को सबसे पहले निशाने पर लिया है। अब भी बिहार में अच्छे कॉलेज और विश्वविद्यालय (University) नहीं खुले हैं और बिहार के छात्र दिल्ली और दूसरे राज्य के प्राइवेट विश्वविद्यालयों की तरफ भाग रहे हैं। 

बिहार में न तो उद्योग आए हैं और न ही रोजगार बढ़ा। बिहारी नौजवान रोजगार के लिए देशभर में भटक रहा है। कभी गुजरात में तो कभी महाराष्ट्र में उस पर हमला होता है। प्रशांत ने सबसे पहले बिहार के बेरोजगार नौजवानों को अपने अभियान का केंद्र बनाया है। वह 18 से 35 वर्ष के युवकों को टारगेट कर रहे हैं।

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जेडीयू और बीजेपी गठबंधन को बड़ा नुकसान
प्रशांत ने अभी कोई पार्टी बनाने की घोषणा नहीं की है लेकिन वह अपने साथ एक करोड़ लोगों को जोडऩे की तैयारी कर रहे हैं। जाहिर है कि आगे चलकर पार्टी की घोषणा भी हो सकती है। इसका बड़ा नुकसान जेडीयू (JDU) और बीजेपी (BJP) गठबंधन को हो सकता है। सवर्ण मतदाता का इस गठबंधन को समर्थन है। अब रोजगार का संकट इस समुदाय के युवाओं को प्रभावित कर रहा है।

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सत्ता में नीतीश को 15 साल
नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को सत्ता में जमे 15 साल होने जा रहे हैं, इसलिए अब वह कमियों का ठीकरा लालू प्रसाद यादव या राजद पर नहीं फोड़ सकते। बीजेपी के साथ जेडीयू के गठबंधन पर प्रशांत सीधा निशाना साध रहे हैं। उनका कहना है कि गांधी और गोडसे एक साथ नहीं चल सकते। दरअसल यह लड़ाई तो तब ही शुरू हो गई थी, जब प्रशांत जेडीयू में थे। प्रशांत ने सबसे पहले नीतीश पर कश्मीर मुद्दे को लेकर ही निशाना साधा था। 2015 के विधानसभा चुनावों में नीतीश आरजेडी के साथ थे इसलिए मुसलमानों का वोट भी उन्हें आसानी से मिल गया था।

मगर अब मुस्लिम मतदाता बीजेपी के साथ-साथ उसके सहयोगियों के भी खिलाफ दिखाई दे रहे हैं। नीतीश के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती होगी अति पिछड़ा और अति दलित के साथ सवर्ण मतदाताओं को जोड़े रखना। प्रशांत किशोर इसी वोट बैंक में सेंध मार सकते हैं। रोजगार और विकास ऐसे मुद्दे हैं जो राज्यों के चुनाव में सब पर भारी दिखाई दे रहे हैं। आक्रामक मुस्लिम विरोधी अभियान के बावजूद बीजेपी दिल्ली और झारखंड में चुनाव नहीं जीत पाई। बदले हुए माहौल में नीतीश के लिए भी यही सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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विपक्ष को ताकत मिलेगी
जाति से ब्राह्मण प्रशांत किशोर एक बड़ा राजनैतिक विकल्प भले ही नहीं बना सके लेकिन उनके बिहार अभियान से सुस्त पड़े विपक्ष को एक नई ताकत मिल सकती है। राष्ट्रीय जनता दल अब भी बिहार में सबसे बड़ा राजनैतिक दल है। कांग्रेस उसके साथ बनी हुई है। जीतन राम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश भले ही अभी राजनीतिक पैंतरेबाजी में जुटे हैं, लेकिन चुनाव में उनके पास भी आरजेडी (RJD) के साथ रहने के अलावा कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। प्रशांत किशोर अगर युवकों को जोड़कर नई राजनीतिक ताकत बन भी जाते हैं तो भी उन्हे गैर नीतीश और बीजेपी दलों के साथ रहना पड़ सकता है। चुनाव का माहौल बदलने में प्रशांत किशोर अपनी महारत कई बार हासिल कर चुके हैं।

राजनीति में नया होने के कारण अभी उनकी छवि साफ सुथरी है। ऐसे में उनका अभियान बिहार में एक नया माहौल पैदा कर सकता है। नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भी बिहार में खलबली दिखाई दे रही है। ऐसे में बिहार का एक नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरण से सामना होगा। विधानसभा चुनावों में अभी 8 महीने बाकी हैंं। प्रशांत अपने अभियान पर डटें रहते हैं तो खुद भी राजनीतिक शक्ति बन सक ते हैं।  

 

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