सोनिया गांधी के गोद लिए गांव उड़वा जरूर जाएं प्रियंका 

  • Updated on 2/11/2019

रायबरेली जिले में एक गांव है उड़वा। इस गांव को वहां की सांसद सोनिया गांधी ने गोद लिया है। गांव में घर के बाहर धूप सेंक रही एक महिला सोनिया गांधी की घोर आलोचक है। उसका कहना है कि सोनिया ने गांव गोद लिया और फिर गोद से उतार भी दिया। पड़ोस के गांव लोहिया हो गए।

लोहिया यानी अखिलेश यादव की सरकार के समय विकास के काम जम कर हुए और ऐसे गांवों को लोहिया गांव कहा जाने लगा। उसने आगे बताया  कि समाजवादी पार्टी के नेता हमारे गांव का विकास नहीं करते और कहते हैं कि सोनिया गांधी ने गोद लिया है उनसे ही करवाओ। 

महिला प्रधानमंत्री मोदी से भी नाराज है। साल भर से उज्जवला गैस योजना के तहत मिले सिलैंडर को रिफिल नहीं करवा पा रही है क्योंकि देने के लिए एक साथ 800 रुपए नहीं हैं।  

अपने कच्चे-पक्के घर में परछत्ती पर बोरी में बांधे गए गैस चूल्हे को दिखाती है। सोनिया और मोदी के काम से नाखुश महिला से जब प्रियंका गांधी के बारे में पूछा गया तो कहने लगी कि प्रियंका वह आंधी है जो मोदी को उड़ा देगी। पास की महिलाएं हंस पड़ती हैं। उनसे पूछता हूं कि क्या वह सब इससे सहमत हैं तो कुछ हां कहती हैं तो कुछ न। 

चुनावी संभावनाओं की तलाश
इस हां और न के बीच प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में चुनावी संभावनाएं तलाशने उतर रही हैं। पूर्वी यू.पी. की कुल मिलाकर 48 सीटों की जिम्मेदारी उन्हें दिए जाने की चर्चा है। इनमें रायबरेली और अमेठी की सीटें शामिल हैं। बात हो रही थी सोनिया गांधी के गोद लिए गांव उड़वा की। इसी गांव में गर्म कपड़ों की दुकान चला रहे एक नौजवान से बात हुई। पास की एक मिल में नौकरी कर रहे इस नौजवान की नोटबंदी के कारण नौकरी जाती रही थी।

नौजवान इससे हताश तो था और मोदी सरकार से नाराजगी भी दिख रही थी लेकिन नौजवान गांधी-नेहरू परिवार से भी पूरी तरह नाउम्मीद नजर आया। प्रियंका गांधी का नाम लिया तो कहने लगा कि कौन प्रियंका... मैं नहीं जानता। बाद में चाय पीते हुए कहने लगा कि वह सोनिया या प्रियंका का नाम तक नहीं लेना चाहता क्योंकि इन लोगों ने रायबरेली के लिए कुछ नहीं किया। 

उसी चाय की दुकान पर बैठे कुछ अन्य लोगों का भी यही कहना था। एक ने कहा कि आज तक सोनिया इस गांव में कभी नहीं आईं, चुनाव के समय वोट मांगने तक नहीं। एक ने कहा कि कुछ साल पहले बगल के गांव में प्रियंका का जरूर आना हुआ था और नई पीढ़ी की प्रियंका से कुछ उम्मीद बांधी जा सकती है। कुल मिलाकर सोनिया के गोद लिए गांव उड़वा में लोग सांसद से लेकर प्रशासन तक से दुखी नजर आए। प्रियंका को एक बार उस गांव में जाकर गांववालों से जरूर बात करनी चाहिए। 

बात तो रायबरेली और अमेठी के स्थानीय पत्रकारों से भी करनी चाहिए। प्रियंका को भी और राहुल गांधी को भी। इन पत्रकारों का कहना है कि वह स्थानीय कांग्रेस नेताओं से कई दफे आग्रह कर चुके हैं कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी से ऑफ  द रिकार्ड बात करना चाहते हैं लेकिन ऐसा मौका कभी नहीं मिला।

पत्रकार बताते हैं कि दोनों सीटों पर दोनों सांसदों (सोनिया  और राहुल) के स्थानीय नुमांइदे सच्चाई बताते ही नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों नेता केन्द्र से परियोजनाएं यहां लेकर नहीं आए लेकिन उन परियोजनाओं का काम किस रफ्तार से चल रहा है, रुकावटें कैसे दूर की जा सकती हैं, आगे की किस्तें नहीं आने से काम कैसे अटक रहा है और परियोजना के शुरू होने के बाद उसके संचालन में क्या-क्या खामियां पेश आ रही हैं, इन बातों की जानकारी न तो सोनिया को दी जाती है और न ही राहुल को। यहां तक कि प्रियंका तक को स्थानीय नेताओं की चौकड़ी घेरे रहती है जो भरोसा दिला देती है कि सब कुछ ठीक चल रहा है, जनता बहुत खुश है और परियोजनाओं का लाभ आम जनता भरपूर उठा रही है।

आई.टी.आई. और रेल डिब्बा कारखाना
पत्रकार रायबरेली के आई.टी.आई. का उदाहरण देते हैं जो एक समय अपने समय से बहुत आगे हुआ करता था, पांच सितारा होटल की तरह, हर तरह की सुविधाओं से लबालब।  लेकिन आज आई.टी.आई. जर्जर हालत में है। पत्रकार दावा करते हैं कि सोनिया गांधी को पता ही नहीं होगा कि बड़े जोर -शोर से शुरू आई.टी.आई. किस हालत में है।

इसी तरह रेल डिब्बों का कारखाना तो सालों पहले लग गया लेकिन डिब्बे बनने शुरू नहीं हुए और सोनिया गांधी को यहां भी अंधेरे में रखा गया। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डिब्बों के निर्माण की नींव रखी और सोनिया गांधी पर तंज कसा कि कैसे रेल डिब्बों की फैक्टरी में पंजाब से बने बनाए डिब्बे लाकर रखे जाते थे और जिन्हें यहां बनता दिखा दिया जाता था। 

लेकिन यह सच्चाई सोनिया और राहुल इसलिए भी नहीं जान पाए क्योंकि यहां की जनता हर बार इन्हें जितवा देती थी। उड़वा गांव में ही सोनिया की आलोचना करने वाले भी कह रहे थे कि जीतेंगी तो सोनिया गांधी ही या फिर प्रियंका गांधी (अगर वह चुनाव लड़ती है तो)।

यहां तक कि नजदीक के एक गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपना पक्का घर बनवा रहे एक दम्पति का भी कहना था कि इस बार उन दोनों का वोट तो मोदी को मिलेगा लेकिन चुनाव तो सोनिया को ही जीतना है। जीत का यह भरोसा रायबरेली और अमेठी की जनता से सोनिया और राहुल की दूरी बढ़ा रहा है इस बात को प्रियंका जितनी जल्दी समझ लें उतना ही फायदा यू.पी. में कांग्रेस को हो सकता है। 

राजनीति बदल रही है
राजनीति तेजी से बदल रही है। मोदी और अमित शाह ने काम काज की शैली को बहुत बदला है। रोज नई जगह जाकर कुछ नया करना है या पुराने को इस तरह दोहराना है कि नया जैसा लगे। इस बात को समझने में राहुल को 4 साल लग गए। जब समझे तो राजस्थान,छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जीते भी। इस सिलसिले को प्रियंका गांधी को आगे ले जाने की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए स्थानीय कांग्रेस कार्यकत्र्ताओं के साथ-साथ स्थानीय जनता के विश्वास को जीतना होगा। इसकी शुरूआत प्रियंका गांधी चाहे तो रायबरेली के उस उड़वा गांव से कर सकती हैं जिसे उनकी मां सोनिया गांधी ने गोद लिया था। 

इसके बाद रायबरेली के स्थानीय पत्रकारों से मिलना होगा। जाति, मजहब के नाम पर राजनीति, विकास बनाम आरोपों के नाम पर राजनीति, इंदिरा गांधी से शक्ल मिलने के नाम पर राजनीति, पति वाड्रा पर लग रहे आरोपों और जांच के नाम पर राजनीति और धर्मनिरपेक्षता बनाम 

देश तोडऩे के नाम पर राजनीति तो होती ही रहेगी लेकिन पहले उस महिला से तो मिलो जिसे मलाल है कि सोनिया गांधी ने जिस गांव को गोद लिया था उसे गोद से क्यों उतार दिया।                                                             ---विजय विद्रोही

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