Friday, Sep 30, 2022
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प्रोजेक्ट चीता- MP के जंगलों में चीते भरेंगे रफ्तार, पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट

  • Updated on 8/8/2022

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। भारत में 70 साल पहले विलुप्त घोषित चीते को अफ्रीका से भारत में फिर से बसाए जाने की तैयारियां जोरों पर हैं। उम्मीद जताई जा रही है आजादी की 75वीं वर्षगांठ से पूर्व यहां के जंगलों में चीते रफ्तार भरते दिखेंगे। योजना के तहत पहले चरण में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीतों को लाया जाना है, जिनमें छह मादा और छह नर 
होंगे, जबकि नामीबिया से आठ चीते आने हैं।

क्या है प्रोजेक्ट चीता
यह एक राष्ट्रीय परियोजना है, जिसमें राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और मध्य प्रदेश सरकार शामिल हैं। इस परियोजना के तहत चीतों को उनके मूलस्थान नामीबिया-दक्षिण अफ्रीका से हवाई रास्ते से भारत लाना और उन्हें मध्य प्रदेश (एमपी) के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में बसाया जाना है।

अगले पांच वर्ष में 50 चीते लाने की योजना है। इसके बाद भारत एकमात्र ऐसा देश बन जाएगा जहां ‘बिग कैट’ प्रजाति के पांचों सदस्य -बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और चीता मौजूद होंगे। बता दें कि देश में चीते अंतिम बार 1947 में देखे गए थे। सरकार ने वर्ष 1952 में इसे विलुप्त घोषित कर दिया था।

शिकार के लिए चीतल भेजे
चीतों के शिकार के लिए वन अधिकारियों ने उद्यान में चीतल भेजे हैं। पहली खेफ में पेंच टाइगर रिजर्व के बांस नाला बोमा टुरिया बीट से 26 चीतल पहुंचाए गए हैं। आने वाले दिनों में अन्य उद्यानों से भी चीतल भेजे जाने की तैयारी है।  

748 वर्ग किमी में फैला है उद्यान 
कूनो-पालपुर राष्ट्रीय उद्यान 748 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यह छह हजार 800 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले खुले वन क्षेत्र का हिस्सा है। चीतों को लाने के बाद उन्हें दो से तीन महीने बाड़े में रखा जाएगा ताकि वे यहां के वातावरण में ढल जाएं। इससे उनकी बेहतर निगरानी भी हो सकेगी। 

रफ्तार का दूसरा नाम...
चीते का सिर छोटा, शरीर पतला और टांगे लंबी होती हैं। इनसे उसे रफ्तार पकडऩे में मदद मिलती है। चीता 120 किमी की रफ्तार से दौड़ सकता है। 

शोध के लिए मुफीद है योजना
प्रिटोरिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एड्रियन टॉर्डिफ का कहना है कि दक्षिण अफ्रीकी और नामीबियाई चीतों को भारतीय में ले जाने की शुरुआत चुनौतियों और अनूठे शोध अवसर से भरी साबित हो सकती है। चीतों को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में ले जाने और इसे जंगल में रखने के मद्देनजर यह दुनिया में अपनी तरह की पहली परियोजना है। 

पहले भी हो चुकी है कोशिश 
इससे पूर्व भारत सरकार ने 1970 में चीतों को ईरान से लाने का प्रयास किया था। इसके लिए ईरान से बातचीत भी की गई थी, लेकिन यह पहल सफल नहीं हो सकी।

सह-अस्तित्व को लेकर चिंता 
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) के अध्यक्ष विनोद बी माथुर का मानना है कि भोपाल के आस-पास बाघों को घूमते देखना एक तरफ तो सकारात्मक रूप में यह दर्शाता है कि बाघ ने शहरी इंसान के साथ अपना वजूद कायम कर लिया है।

दूसरी ओर, यह सह-अस्तित्व आगे चलकर चिंता का विषय भी बन सकता है, क्योंकि हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि बाघ एक जंगली जानवर है, जो अन्य जीवों का शिकार करके अपना पेट भरता है।

तय करनी होगी शहरीकरण की सीमा 
मनुष्य और वन्य जीवों के बीच जारी संघर्ष तेज होने से देश के अलग-अलग राज्यों में बाघ के साथ ही हाथी, नीलगाय, बंदर और जंगली सुअर को लेकर जैव विविधता संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। जंगलों के आस-पास तेजी से हो रहे शहरीकरण की कोई तो सीमा तय होनी चाहिए। 

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