Saturday, Mar 23, 2019

पंजाबी भाषा भी झेल रही है वैश्विक रवैये की मार

  • Updated on 2/21/2019

आज  मातृभाषा दिवस है। लम्बी बातें न करते हुए यदि केवल पंजाबी मातृभाषा बारे सोचता हूं तो मन खिल उठता है। मेरी मातृभाषा का केवल मौखिक साहित्य ही लें या केवल लोक साहित्य, यह इतना अमीर है, इतना रिद्मिक, दार्शनिक पहुंच वाला है कि बड़ी-बड़ी भाषाओं के ज्ञाता दांतों तले उंगली दबा लेते हैं।

हमारे विवाह-शादियों पर महिलाएं जो गीत गाती हैं, यहां तक कि जो सिठनियां भी देती हैं, वे राग आधारित तो होती ही हैं, हमारे सामाजिक भाईचारे, हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी फिलास्फी का संकेत भी दे जाती हैं। 

हम खुशकिस्मत हैं कि हमारी मातृभाषा के पास सिद्धों, नाथों, संतों का साहित्य है, सूफियों, गुरुओं, सुथरों, गुलाबदासियों, वजीरकों का साहित्य है, आधुनिक साहित्य है। देश के विभाजन के बाद जो खराब राजनीतिक खेल खेला गया, पंजाबी मातृभाषा को लिपियों के ‘धार्मिक बंधन’   में डालकर लूली कर दिया गया। गुरदास मान की एक बहुत प्यारी पंक्ति है-

‘‘सन संताली च होया अधरंग तैनूं, फिर न होई पब्बां भार। 
मिडियां खिलारी फिरें बुल्ले दीए काफिए नीं, किहनें तेरा लाह लेया शिंगार।’’

फिर और राजनीति हुई, पंजाब भाषाई मुद्दे पर बंट गया। हम कहां तक पतन की अवस्था में होंगे कि हमें हमारे राज्य में ही मातृभाषा की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और सरकारें इसकी परवाह तक नहीं करतीं। आप उसी भाषा में अच्छे तथा रचनात्मक कार्य कर सकते हो जिसमें सपने लेते हो लेकिन हमारे सपनों की डोर को बीच में ही कोई काट जाता है। हम हारे हुए जुआरी की तरह हाथ मलते रह जाते हैं। 

हमारी पहुंच बाकी प्रश्रों की तरह ही भाषा बारे भी वैज्ञानिक नहीं है। वैज्ञानिक नजरिया तो यह कहता है कि कोई भी प्रश्र या रवैया बाकी सामाजिक, राजनीतिक, आॢथक, सांस्कृतिक रवैयों से ही जुड़ा होता है। जो समाज में होगा, भाषा से जुड़े मसले उससे उतने ही प्रभावित होंगे जितने आर्थिक मसले।

इसलिए समाज में जो हो रहा है, मातृभाषा का प्रश्र उसमें से ही देखा जाना चाहिए। इसको उससे अलग करके समझने का प्रयास करेंगे तो हम मार खाएंगे तथा खा भी रहे हैं। इसलिए मातृभाषा को लेकर हमारे जो संघर्ष हैं, वे लोगों के संघर्ष नहीं बन रहे। हम जो लड़ रहे हैं, लोगों से अलग-थलग हैं।

हमारे बच्चे विदेश जा रहे हैं लेकिन यदि आप उन्हें मातृभाषा से जुडऩे बारे भाषण दोगे तो वे आपकी नहीं सुनेंगे। इसलिए समाज में जो हो रहा है उसी से भाषा के प्रश्र को उठाना जरूरी है।

रसूल हमजातोव अपनी पुस्तक ‘मेरा दागिस्तान’ में लिखते हैं कि हमारे यदि किसी को दुआ देनी हो तो कहते हैं कि तेरी उम्र लोकगीत जितनी लम्बी  हो और यदि बद्दुआ देनी हो तो कहते हैं जा तुझे तेरी मातृभाषा भूल जाए। हमारा पंजाबियों का दुखांत क्या है कि हम खुद को ही बद्दुआ दे रहे हैं।

तभी हम साहित्य से, कला से टूट रहे हैं। तभी हम अधिक संवेदनशील हो रहे हैं। मातृभाषा बारे हर पहलू से हमें सचेत होने की जरूरत है, तभी हम सपने देख सकेंगे और उनको पूरा कर सकेंगे।                                           ---देसराज काली 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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