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ramdhari dinkar nehru favorite patriot nationalist knocking in the eyes of the british prsgnt

नेहरू के चहेते, राष्ट्रभक्त और अंग्रेजों की आंख में खटकने वाले राष्ट्रकवि थे रामधारी सिंह दिनकर...

  • Updated on 9/23/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। आज देश राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 112वीं जयंती मना रहा है। इस मौके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) समेत तमाम नेताओं ने राष्ट्रकवि दिनकर को विनम्र श्रद्धांजलि दी है। पीएम मोदी ने ट्वीट करके कहा, “राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी कालजयी कविताएं साहित्यप्रेमियों को ही नहीं, बल्कि समस्त देशवासियों को निरंतर प्रेरित करती रहेंगी।”  

दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 में बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया में हुआ था। दिनकर को उनकी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कविताओं के लिए जाना जाता है। दिनकर ने अंग्रेजों के खिलाफ काफी कुछ लिखा जिसमें से रेणुका और हुंकार जैसी रचनाओं ने तहलका मचा दिया था। 

इतना ही नहीं, राष्ट्रकवि दिनकर की कविताओं में विरोधी और राष्ट्रभक्ति के सुर साफ़ नज़र आते थे। दिनकर के बारे में कहा जाता है कि देश पर जब चीन ने आक्रमण किया था तब दिनकर बेहद आहत हुए थे। जिसके बाद दिनकर ने सन् 1962 में 'परशुराम की प्रतीक्षा' लिखी थी। इस कविता का पाठ दिनकर ने पटना विवि के सीनेट हॉल में किया था।

पढे़ं, 'रामधारी सिंह दिनकर' की वो कविता जिसे सुनाकर PM मोदी ने जवानों में भरा जोश

पंडित नेहरू ने कहा था उन्हें राष्ट्रकवि
बताया जाता है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ही सबसे पहले रामधारी सिंह दिनकर को राष्ट्रकवि कहा था। दोनों के बीच काफी अच्छे संबंध बताए जाते हैं। लेकिन फिर भी दिनकर जवाहर नेहरू की आलोचना करते रहते थे। चीन के साथ हुए युद्ध के बाद दिनकर जवाहर लाल नेहरू के पूरी तरह से खिलाफ हो गए थे। 

दिनकर की पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ तत्कालीन सत्ता के ही खिलाफ थी लेकिन इसके बावजूद जीवन भर दोनों के आपसी संबंध मधुर बने रहे हैं।

12 साल रहे राज्यसभा सदस्य
रामधारी सिंह दिनकर को 1952 से लेकर 1964 तक 12 साल कांग्रेस के कोटे से राज्यसभा के सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया था। जबकि दिनकर ने नेहरू को “लोकदेव” की उपाधि दी थी और “लोकदेव नेहरू” किताब लिखी थी। हालांकि ये किताब ज्यादा नहीं चली थी लेकिन नेहरू से उनके संबंधों को लेकर इस किताब का जिक्र किया जाता है।

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चार साल में 22 बार तबादला
रामधारी सिंह दिनकर के बारे में बताया जाता है कि 1932 में दिनकर ने पटना विवि से इतिहास में ऑनर्स की डिग्री लेने के बाद उन्होंने 1934 में पटना निबंधन कार्यालय में सब रजिस्ट्रार के पद से नौकरी की शुरुआत की थी। दिनकर पटना के निबंधन कार्यालय में पहले भारतीय रजिस्ट्रार थे। इस पद पर रहते हुए भी उन्होंने हुंकार, रसवंती आदि रचनाएं लिखीं थी, जिसके कारण अंग्रेजों की उनसे रार बनी रही और उनके चार साल के अंदर 22 बार तबादले किए गए। लेकिन फिर तंग आकर दिनकर ने 1945 में नौकरी छोड़ दी।

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