Wednesday, Oct 27, 2021
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read the story of delhi police officers, in their own words musrnt

पढ़ें दिल्ली पुलिस के अधिकारियों की कहानी, उनकी ही जुबानी

  • Updated on 9/20/2021

‘अटल रह तू बस अपने फैसलों पर, चलता रह मत रख नजर फासलों पर 
मंजिल मिलेगी जरूर तुझे, तू बस टिका रह अपने हौसलों पर।’ 

उपरोक्त हर शब्द उन लोगों पर सटीक बैठते हैं जो कुछ करने की ठान लेते हैं। दिल्ली पुलिस में कई ऐसे आईपीएस अधिकारी और पुलिसकर्मी हैं, जिन्होंने अनेक बाधाओं और मुश्किलों का सामना किया लेकिन डटे रहे और आज कामयाबी के शिखर पर हैं। दिल्ली पुलिस महकमे में कई ऐसे पुलिसकर्मी भी मौजूद हैं, जिनके भले ही सपने पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन उनके बच्चों ने उनका सपना साकार किया है। आखिर कैसी मुश्किलातों का सामना करते हुए इन लोगों ने अपनी मंजिल पाई और किस तरह ये लोग आगे बढ़े। ऐसे ही कुछ चुनिंदा लोगों से नवोदय टाइम्स के लिए संजीव यादव ने बातचीत की, जिसमें इन लोगों ने बताया कि अगर आपके अंदर हौसला है और जज्बा है तो आप किस तरह अपने मजबूत इरादों के जरिए हर मंजिला पा सकते हैं। 


DCP मोनिका भारद्वाजः न बड़ा स्कूल, न ही सुविधाएं फिर भी बनीं आईपीएस

DCP क्राइम मोनिका भारद्वाज हरियाणा के छोटे से गांव सांपला से किसान परिवार से निकली हैं। ये पहली अधिकारी महिला हैं,इनके गांव में न तो बड़ा स्कूल था और न ही सुविधाएं, यहीं नहीं, वे उस राज्य से भी हैं, जहां लड़कियों को पैदा होते ही मारने की सोची जाती है, लेकिन उसके बाद भी मोनिका भारद्वाज आईपीएस बनीं, मोनिका बतौर क्राइम ब्रांच में तैनात हैं और दिल्ली पुलिस के इतिहास में क्राइम ब्रांच में किसी महिला आईपीएस की तैनाती पहली बार की गई है।

आईपीएस मोनिका के पिता कप्तान सिंह हरियाणा पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं, मोनिका को 2008 में यूपीएससी के सिविल सर्विसेज एग्जाम में ऑल इंडिया 142 रैंक मिली। उनकी पहली च्वाइस आईएएस थी। परंतु जनरल कैटेगरी में होने की वजह से उन्हें सेकेंड च्वाइस मिली। उन्होंने आईपीएस ज्वाइन किया। वे राजधानी में कई जिलों में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुकी हैं,यही नहीं अपने कार्यकाल के दौरान कई संगीन अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया। मोनिका के पिता हरियाणा के बतौर सब इंस्पेक्टर हैं और वो अपने पिता और दादा की प्रेरणा के चलते आईपीएस बनीं। वे बताती हैं कि उनका डर लोगों के बीच रहकर ही खत्म हुआ।

मोनिका भारद्वाज ने बताया कि सपने पूरा करने के लिए हौसला कायम रखना होता है और इरादे मजबूत, मेरे को सिविल सर्विसेज में भेजने का सपना मां ने देखा,जिसके बाद उसे पूरा करने के लिए मुझे हरियाणा से दिल्ली कई किलोमीटर दूर अपने कॉलेज के लिए आना पड़ता। कई घंटे लगते थे, कई तरह की समस्याएं आती थीं, लेकिन उसके बाद भी हिम्मत नहीं टूटी, जब मैं बसों में आती- जाती तो कई बार लोगों की नजरें और आसमाजिक तत्वों का भी सामना करना पड़ता था,लेकिन उसके बावजूद हिम्मत से ये मुकाम हासिल किया। 

सचिन कुमार सिंघल सरकारी अस्पताल में थे डॉक्टर, अब हैं IPS

हर सपने को पूरा करना ही मुख्य उद्देश्य था। पिता का बिजेनस का कारोबार था,दिल्ली शहर था नतीजतन पिता का सपना था कि बेटा एक बड़ा अधिकारी बने और खुद मेरा सपना था कि डॉक्टर बनूं और उन्होंने दोनों ही सपनों को पूरा किया। 
दिल्ली शहर के घर में बिजनेस का माहौल होने के बाद पिता चाहते थे कि बेटा आईपीएस बने लेकिन सचिन सिंघल को डॉक्टर बनना था,जिसके लिए वे दिन-रात मेहनत कर रहे थे।

पहले वर्षों के संघर्ष, लगन और मेहनत के बलबूते अपना डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। जब डॉक्टर बन गए और सरकारी नौकरी भी लग गई, तब अपने सपने की हकीकत को पीछे छोड़कर पिता की ख्वाहिश पूरी करने के लिए फिर मेहनत की और आईपीएस बन गए। 

वे बताते हैं कि डॉक्टर बनने के बाद दिल्ली राजधानी के दो अस्पतालों में जिनमें बाबू जगजीवन राम और दूसरा दीप चंद बंधु अस्पताल जिसमें उन्होंने बतौर जूनियर रेजीडेंट के पद पर सेवाएं दीं, लेकिन मन में अलग सा था, कुछ अलग जुनून घर कर गया था कि किसी भी तरह कुछ ऐसा किया जाए, जिससे जीवन चैलेजिंग के रूप में रहे और हर दिन एक नया चैलेंज सामने आए। इसलिए डॉक्टर की पढ़ाई पूरी करने और जॉब करने के दौरान उन्होंने पिता के सपने को पूरा करने की ठानी।

चूंकि राह बिल्कुल अलग थी,कठिनाइयां भी सामने थी,लेकिन हौसला पूरा था और जज्बा था कि सविल सर्विस लेना है। इसलिए उन्होंने सिविल सर्विस की तैयारी की और 2017 में 193वीं रैंक के साथ आईपीएस बने। फिलहाल वे दिल्ली में एडिशनपल डीसीपी आउटर नॉर्थ के पद पर कार्यरत हैं।

मौजूदा समय सचिन सिंघल आईपीएस होने के बाद भी अक्सर लोगों की मदद करते दिखते हैं और अपने डॉक्टर सहित आईपीएस बनने के लिए किस तरह का हौसला और जज्बा कायम रखना होता है,उन लोगों को बताते हैं जो अपने अपने सपनों को पूरा करने के लिए जी जान से मेहनत करते हैं।

IPS इंगित प्रताप सिंह सेना में 3 बार असफल होने पर भी नहीं टूटी हिम्मत

आईपीएस इंगित प्रताप सिंह दिल्ली में बतौर साउथ वेस्ट डीसीपी के पद पर कार्यरत हैं,इससे पूर्व में क्राइम सहित कई जगहों पर डीसीपी पोस्ट रह चुके हैं। इनके लिए आईपीएस बनना चुनौतीपूर्ण था। वे सेना में जाना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने परीक्षाएं भी दीं, पास भी की,लेकिन मेडिकल टेस्ट में लगातार 3 बार अनफिट पाए गए,लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। पिता का सपना था कि बेटा एक बड़ा अफसर बने और बचपन से इंगित का भी सपना था कि उनके कंधों में सितारे जड़े हों।

मेडिकल के चलते उनके इस सपने में बाधा आई,लेकिन वे शुरू से पढ़ाई में होशियार थे,इसलिए उन्होंने फिर सिविल सर्विसेज की तरफ रुख किया और अपने पहले ही प्रयास में इसे पास किया। इन्हें आईपीएस कैडर एलॉट किया गया, जिसके बाद इन्होंने मुड़कर नहीं देखा। वे बताते हैं कि जब आप सपना देखते हो उसमें लगातार बाधाएं आती हैं तो मायूसी छा जाती है,लेकिन अगर हौसले आपके मजबूत हैं कि कुछ भी कर सकते हैं।

इसलिए सेना के बाद उन्होंने सिविल सर्विसेज की तरफ रुख किया और उसे पास किया। उन्होंने बताया कि इस सर्विस में कई बार आपके सामने कई मुश्किल हालात आते हैं, कई ऐसे केस भी आते हैं जो आपको झकझोर देता है, लेकिन आपके इरादे मजबूत हैं तो आप हर बाधा को पार सकते हैं। 

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