Monday, Jan 21, 2019

नैया डूबती देख मोदी को याद आए क्षेत्रीय दल

  • Updated on 1/4/2019

प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने एक ताजा टी.वी. साक्षात्कार में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को प्राथमिकता दिए जाने वाले बयान ने देश भर में एक प्रश्न खड़ा कर दिया है और चर्चा भी छेड़ दी है। उनके इस साक्षात्कार की कांग्रेस ने बेशक ‘म्यूचुअल अंडरस्टैंङ्क्षडग’ कह कर आलोचना की है, मगर जो प्रश्र उत्पन्न हुए वे दोनों पाॢटयों का पीछा करने लगे हैं। इन प्रश्रों से पीछा छुड़ा लेना अब इतना आसान नहीं है।

जब हम क्षेत्रीय पहचानों, क्षेत्रीय भाषाओं की बात करते हैं तो संघीय ढांचे की ओर झुकने वाले प्रगतिशील विचार के उभरने वाली स्थिति उत्पन्न होती दिखाई देती है। भारत जैसे देश के लिए यह बहुत बढिय़ा तथा सम्मानजनक बात होगी परन्तु क्या हकीकत तथा यथार्थ के स्तर पर यह संभव है? इस प्रश्र का उत्तर जानना बहुत जरूरी है क्योंकि इसकी जड़ें अतीत की परिपाटी में हैं।

कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता व भाजपा हिन्दुत्व के नाम पर क्षेत्रीय पहचानों से दूर
क्षेत्रीय पहचानों के मसले तथा जो क्षेत्रीय सामाजिक, राजनीतिक, आॢथक, सभ्याचारक मसले हैं उनको यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझना है तो दो तरह से समझा जा सकता है। यदि कांग्रेस का पक्ष लेना हो तो उसका केन्द्रीय प्रभाव भारी रहा है। वह चाहे इसे धर्मनिरपेक्षता के नाम से क्रियाशील रख रहे हों क्योंकि धर्मनिरपेक्षता बारे जवाहर लाल नेहरू की एक टिप्पणी भी आजकल काफी चर्चा में है, जिसका अभिप्राय: यह है कि हम किसी भी धर्म का अनादर नहीं कर सकते बल्कि हर धर्म का एक समान आदर करते हैं।

हां, यह बात भी जरूर है कि कांग्रेस ने शुरू से क्षेत्रीय पहचानों के मसलों को स्वीकार किया तथा यदि उन्होंने भाषायी आधार पर राज्यों का गठन किया तो कांग्रेस का इनके प्रति सार्थक रवैया ही कहा जाना चाहिए। मगर फिर भी वह जब भारतीय स्तर की राजनीति का खेल खेलते हैं तो क्षेत्रीय आधार की जगह भारत को एक ईकाई मान कर ही खेलते हैं। उस समय कांग्रेस का व्यवहार यह होता है कि वे दलित तथा ब्राह्मण को एक नजरिए से देखते हैं, पंजाबी, मराठी तथा तमिल उनको एक ही नजर आ रहे हैं। अमीर-गरीब का अंतर नहीं है। औरत-मर्द का अंतर नहीं है।

अब यदि हमें इन पहचानों या मसलों को हल करना है तो यथार्थ  यही है कि दलित तथा तथाकथित उच्च जाति के लोगों में बहुत बड़ा अंतर है। ऐसे ही तो भीमा-कोरेगांव की याद मनाने के लिए दलितों को इतनी सुरक्षा की जरूरत नहीं पड़ गई। भारत में जातियों को लेकर जो अलगाव है उतना तो अन्य मसलों में नहीं है। ऐसे ही जो भौगोलिक मसले हैं, धर्म के मसले हैं, वे बहुत बड़ी रेखा खींच कर लड़ाई लड़ रहे हैं।

क्या पंजाब की समस्याएं तमिल समस्याओं से भिन्न नहीं? क्या मराठों को जिन मसलों से दो-चार होना पड़ता है वे अन्य राज्यों से अलग नहीं? बिल्कुल, ये सभी मसले अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ही हैं और ये विभाजन अथवा अलगाव बहुत तीखे रूप में एक-दूसरे के टकराव में भी हैं। इसलिए इनका समाधान करते समय क्षेत्रीय दलों का सहारा लेना तथा उनकी विचारधारा को भी समझना पड़ेगा। तभी हम इस सम्बोधन को प्रगतिशील विचार कह सकते हैं।

बिखरे भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई
इस मसले को यदि भाजपा के नजरिए से लेना है तो इसे चाहे नरेन्द्र मोदी की डूबती नैया को लेकर मजबूरी ही कह लें लेकिन भाजपा ऐसा कदम उठाएगी जिसके बारे में संदेह ही किया जा सकता है। मजबूरी के कारण भी वे अपनी विचारधारा से कैसे भटक सकते हैं?

उनकी विचारधारा तो भारत को एक हिन्दू राष्ट्र के तौर पर स्थापित करना ही है। वे कैसे इससे पलटी मार सकते हैं? भाजपा की जो अल्पसंख्यक भाईचारे के प्रति पहुंच है, उससे कैसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह किसी भी तरह इन अलगावों को भुला कर सभी पक्षों को गले लगा लेगी? यह एक रोमांटिक विचार ही कहा जा सकता है, हकीकत कहीं और पड़ी है। 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर मजबूरी के बावजूद भी भाजपा से यह आशा की ही नहीं जा सकती।

क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ जो कुछ अन्य पाॢटयां उभर कर सामने आईं, चाहे वह लालू यादव की पार्टी हो, रामविलास पासवान की हो या बहुजन समाज पार्टी की हो या जो कुछ समाजवादी विचारों से पीठ मोड़ कर इधर आए हैं, उनमें से अधिकतर जाति को आधार बनाकर सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।

कुछ सफल भी हुए हैं। यह भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है और हमें इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसलिए उनके साथ भाजपा की सांझेदारी का आधार क्या होगा, यह भी एक प्रश्र बना हुआ है। इस प्रश्र को समझे बिना भी इन पाॢटयों को प्राथमिकता देने वाली सोच पर पहरा नहीं दिया जा सकता। इसलिए चाहे कांग्रेस, जो समस्त भारत को धर्मनिरपेक्ष रूप में देखती है और चाहे भाजपा, जो भारत को हिन्दुत्व के रूप में देखती है, दोनों के सामने आगामी चुनावों में यह प्रश्र चुनौती बना रहेगा।

भारत : जहां समानता एक बुत है
हां, यह अवश्य है कि यदि इस प्रश्र को लेकर दलित लहर में उभार पैदा होता है या कहीं यदि नारी शक्ति की लहर उत्पन्न होती है अथवा फिर वामपक्षी इसे सम्बोधित करते हैं तो उनके पास इस विचार के वाहक बनने की शक्ति जरूर है। हमारा बुद्धिजीवी वर्ग यह मानता भी है कि नारी शक्ति उभार चाहे दक्षिण की ओर से ही सही या फिर दलित उभार चाहे महाराष्ट्र में ही जोर दिखाता नजर आ रहा है।

गत वर्ष अप्रैल महीने में जैसे एस.सी./एस.टी. एक्ट में हुए संशोधन के विरोध को लेकर दलित पक्षों ने भारत बंद करवाया था, उसकी मिसाल भारत के राजनीतिक इतिहास में कहीं नहीं मिलती। ऐसे ही सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की जो लड़ाई नारी शक्ति ने जीती है वह भी बेमिसाल है। वैसे भी इन शक्तियों का उभार भारतीय समाज के लिए सार्थक भविष्य की निशानदेही साबित हो सकता है।

यह प्रश्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय लोकतंत्र, संघीय ढांचे के लिए एक आवश्यक शर्त है। भारत के बहुलतावाद के लिए, भारतीयों को समानता में बांधने हेतु इसकी बहुत जरूरत है। भारत एक बहु-भाषायी देश है, बहु-सांस्कृतिक पहचानों वाला राष्ट्र है।

यदि हम अपनी भाषाओं को सम्मान नहीं देंगे तो हम किसी भी तरह की नैतिक तरक्की नहीं कर रहे होंगे। हम अपने समाज को किसी भी तरह से तरक्की की ओर नहीं ले जा रहे होंगे। इसलिए ये नुक्ते बहुत महत्वपूर्ण हैं और ध्यान दिए जाने की मांग करते हैं। भारत की समानता ही इसमें है कि क्षेत्रीय मसलों को पहल दी जाए। अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि हमें यह कहना पड़ जाए कि ‘भारत एक ऐसा देश है, जहां समानता एक बुत है’।                                   ---देसराज काली 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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