Saturday, Jul 24, 2021
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विख्यात रंगकर्मी, नाटककार,लेखक, समीक्षक और कवि उर्मिल कुमार थपलियाल का निधन

  • Updated on 7/21/2021

देहरादून/राजीव थपलियाल। एक जमाना था जब टीवी नहीं था और अखबारों की पहुंच भी आज की तरह दूरस्थ इलाकों  नहीं थी तब रेडियो यानी आकाशवाणी ही देश दुनिया की खबरों को आम जन तक पहुंचाने का साधन हुआ करती थी। लखनऊ आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले शाम के 7:20 बजे के प्रादेशिक समाचार सुनने के लिए लोग विशेष रूप से तैयार हुआ करते थे। यह बात 80 और 90 के दशक की है। ठीक समय पर रेडियो पर सायरन बजता था और एक आवाज गूंजती थी...शाम के 7बजकर20 मिनट हुए जा रहे हैं अब आप सोहन लाल थपलियाल से समाचार सुनिए।

इसके बाद अंग्रेजी में भी समाचारों का प्रसारण सोहन लाल थपलियाल ही करते थे। तब वे किसी हीरो की तरह ही शख्सियत रखते थे। मूल रूप से पौड़ी जिले के खैड़ गांव जो कि चौंदकोट में एकेश्वर ब्लॉक में आता है, के निवासी थे। उनका घर आज खंडहर के रूप में मौजूद है। प्रथम गढ़वाली बोली के साहित्यकार भवानी दत्त थपलियाल और पहले डायरेक्ट सूबेदार तोताराम थपलियाल भी इसी गांव में पैदा हुए हैं। सोहन लाल  इन्हीं के निकटतम परिजन थे। उनकी एक बड़ी पहचान देश भर में एक रंगकर्मी की भी रही। लेकिन वे आकाशवाणी की नौकरी से इतर कार्य उर्मिल कुमार थपलियाल के नाम से करते रहे। और यही नाम उनका जगत प्रसिद्ध है। दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं इसकी जानकारी शायद ही लोगों को मालूम होगी।

डॉ. उर्मिल कुमार थपलियाल नाट्यशास्त्र के विशेषज्ञ माने गए। इनके लिखे व्यंग और नाट्यशास्त्र के लेख प्रतिष्ठित समाचार पत्र- पत्रिकाओं में अकसर प्रकाशित होते रहे। फिल्मी दुनियां के कई बड़े सितारे नाट्य कला सीखने के लिए उर्मिल कुमार थपलियाल के शार्गिद भी रहे। उर्मिल कुमार थपलियाल का देहरादून से भी बड़ा नाता रहा। यहां फालतू लाइन स्थित दिवंगत पत्रकार चारू चंद्र चंदोला के घर पर उनकी नामी साहित्यकारों के साथ में बैठकी अकसर हुआ करती थी। थपलियाल का लगभग पूरा जीवन लखनऊ में ही बीता। बाद में वे नोयडा भी शिफ्ट हुए। यहां से भी उनकी साहित्ियक गतिविधियां चलती रही। फिर वे लखनऊ चले गए।

रंगमंच, रेडियो पर छाए रहने वाले लोक बोली में नौटंकियों की संगीतमय प्रस्तुति देने वाले 79 वर्षीय उर्मिल थपलियाल का मंगलवार शाम 5:30 बजे लखनऊ में निधन हो गया। अनेक विधाओं के धनी थपलियाल को संगीत नाट्य अकादमी नई दिल्ली अवार्ड तथा संगीत नाट्य अकादमी उत्तर प्रदेश अवार्ड के अलावा यश भारती अवार्ड तथा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा रत्न सम्मान से भी गौरवान्वित  किया गया था कई नाटकों के निर्देशक भी रहे।

डॉ. उर्मिल कुमार थपलियाल अपने नाटकों और नौटंकी के कारण विश्व विख्यात थे। वे हिंदी, अवधी, और गढ़वाली नाटकों के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे।  वे अप्रैल माह से कैंसर बीमारी से ज्यादा पीड़ित थे। बाल्यकाल में देहरादून की रामलीलाओं और नाटकों में उनकी प्रतिभागिता ने उन्हें रंगकर्म में जाने की प्रेरणा दी। लखनऊ में वे रंगकर्म से जुड़ गए। उत्तरप्रदेश की प्रमुख नाट्यविधा नौटंकी को नया रूप देने और लोकप्रिय बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। एक विशिष्ट काम उनका बहुत समय तक याद रहेगा वह है नौटंकी विधा में उनका व्यंग विधा का प्रयोग।

उन्होंने अनेक नाटक लिखे उनकी लिखी नौटंकी ‘हरिश चन्नर की लड़ाई’ देश के अनेक भागों में मंचित हुई। उर्मिल थपलियाल को उनके रंगनिर्देशन, नाटक लेखन और प्रदर्शन के लिए संगीत नाटक अकादमी अवार्ड और उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके निधन के साथ ही रंगकर्म का एक शिखर पुरुष हमारे मध्य नहीं रहा- पार्थसारथि थपलियाल, सेवािनवृत्त आकाशवाणी अधिकारी।

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