Sunday, Jan 19, 2020
role of fast track court in indian judicial

जानें भारतीय न्यायिक प्रक्रिया को कितना सुदृढ़ बनाती हैं फास्ट ट्रैक अदालतें

  • Updated on 12/4/2019

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। देश में लगातार बढ़ रही रेप की घटनाओं से फास्ट ट्रैक अदालतों (Fast Track Court) की चर्चा इन दिनों जोरो पर है। हैदराबाद (Hyderabad) की पशु चिकित्सक के साथ रेप और हत्या की घटना सामने आने के बाद सारे देश में महिला सुरक्षा (Women Security) पर सवाल और यौन अपराधों को फास्ट ट्रैक अदालतों द्वारा ज्लद से जल्द निपटाने और दोषियों को तुरंत सजा देने की मांग एक बार फिर उठने लगी है। 

साल 2012 में दिल्ली के निर्भया गैंग रेप के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर जब भी कोई बलात्कार का मुद्दा तूल पकड़ता है तो राज्य सरकारें तुरंत मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने का काम करती हैं। हैदराबाद वाले मामले में भी मुख्यमंत्री चंद्र शेखर राव ने ऐसा ही किया है। प्रश्न ये है कि क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट से वाकई न्याय जल्द मिलता है और वो भारतीय न्यायिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाती है या केवल एक अदलात का बोझ दूसरी अदालत पर स्थानांतरित हो जाता है? 

मानसून सत्र में 1023 फास्ट ट्रैक कोर्ट के निर्माण की घोषणा

संसद के मानसून सत्र के दौरान बलात्कार और पोक्सो कानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों को तुरंत निपटाने के लिए 1023 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान किया गया। तब कानून मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया था कि ये फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट देश भर में लंबित 1.66 लाख यौन अपराधों के मामलों को निपटाने के लिए बनाए जाएंगे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वत: संज्ञान लिया और आदेश दिया कि जहां पोक्सो के तहत दर्ज हुए 100 से ज्यादा मामले लंबित हैं वहां नई अदालतें सिर्फ पोक्सो से जुड़े ही केसों की सुनवाई करेंगी। भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट का इतिहास लगभग 20 साल यानी 2 दशक पुराना है।

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आई जानते हैं फास्ट ट्रैक अदालतों के बारे में कुछ तथ्य:- 

  • भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत साल 2000 में हुई। 
  • 11 वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार देश में 1734 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का प्रस्ताव पास हुआ, जिसमें 502 करोड़ की लागत आने का अनुमान था। 
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना पहले केवल 2005 तक के लिए लागू की गई थी, बाद में इसे बढ़ाकर 2011 तक जारी रखा गया। 
  • 2011 के बाद केंद्र ने फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए बजट देना बंद कर दिया, हलांकि कुछ राज्य सरकारों ने बजट देना जारी रखा। 
  • साल 2019 में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में फास्ट ट्रैक कोर्ट के आंकड़ों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि 519 फास्ट ट्रैक कोर्ट देश में काम कर रहे हैं, जिन पर 5.9 केसों का बोझ है। 
  • पिछले लगभग 20 साल में केंद्र ने इन फास्ट ट्रैक अदालतों में कुल 870 रुपये खर्च किया। इतने खर्च और फास्ट ट्रैक अदालतों के बाद भी यौन अपराधों के मामलों का बोझ कम नहीं हो सका है। 

मामले अधिक और जजों की संख्या बहुत कम 
लगातार बढ़ रहे आपराधिक मामलों की संख्या पर वरिष्ठ वकीलों का विशेषज्ञों का मानना है कि जब देश में जनसंख्या इतनी अधिक हो और जजों की संख्या इनती कम तो केसों का बोझ बढ़ना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि इस समस्या का हल यही है कि अधिक जजों की नियुक्ति की जाए और जनता और जजों के अनुपात को सही किया जाए। 

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एक से दूसरी जगह शिफ्ट हुआ केसों का बोझ
वहीं न्यायिक सुधारों पर काम करने वाली संस्था ने मामलों के बढ़ते बोझ का कारण संसाधनों की कमी को बताया है। उसका कहना है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की कार्यप्रणाली साधारण अदालतों से अलग होनी चाहिए। उसके लिए अलग से जजों को नियुक्ति किया जाना चाहिए, जबकि इस देश में ऐसा कभी हुआ ही नहीं। केवल मौजूदा जजों में से ही कुछ जजों को निकाल कर फास्ट ट्रैक कोर्ट भेज दिया गया, जिससे सिर्फ अदालतों का बोझ एक से दूसरी जगह शिफ्ट हुआ है कम नहीं।  

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