Wednesday, Oct 16, 2019
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संविधान में धर्मनिरपेक्षता का दावा गलत! भागवत बोले भारत है एक हिंदू राष्ट्र

  • Updated on 10/3/2019

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और इसको बदला नहीं जा सकता है। भारत एक हिंदू राष्ट्र है या भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है? इस बात को देश में मौजूद सभी राजनीतिक और गैर राजनीतिक संगठनों को एक बार मिलकर स्पष्ट कर देना चाहिए। क्योंकि संविधान हर किसी ने तो पढ़ा नहीं है! इस प्रकार की बयानबाजी से देश की एकता-अखंडता पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही देश में चल रहे कई अहम मुद्दों के स्थान पर इन मुद्दों को तवज्जो दी जाने लगती है। भारत पहले से ही मंदी की मार झेल रहा, युवा बेरोजगार हैं इसलिए राजनीतिक रैलियों में जा- जा कर घर का खर्च चला रहे हैं, किसान आंदोलन रत हैं, कश्मीर बंद पड़ा है, प्याज महंगा हो गया है... इन मुद्दों के स्थान पर हर दूसरे दिन हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे पर चर्चा करना इस देश के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा बनने लगा है।  

भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिर्रपेक्ष राष्ट्र है। साल 1976 में भारतीय संविधान में 42वां संशोधन करते हुए संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' 'धर्मनिरपेक्ष' और 'एकता-अखंडता' जैसे शब्द जोड़े गए। भारतीय विविधता की खूबसूरती को कायम रखने के लिए ये फैसला लिया गया। इस देश की विविधता और सर्वधर्म समभाव ही इसको विश्व के सभी राष्ट्रों से अलग बनाती है। फिर भारत को बार-बार एक हिंदू राष्ट्र क्यों कहा जा रहा है?

हिंदू का मतलब धर्मनिरपेक्ष होना है?
क्या मोहन भागवत ये साबित करना चाहते हैं कि हिंदू का मतलब धर्मनिरपेक्ष होना है? भारतवासी चाहे वो किसी भी धर्म का हो खुद को हिंदू कहे क्योंकि वो धर्मनिरपेक्ष भारत का नागरिक है? आखिर क्या मतलब है इस प्रकार के बयान का? हम मान लेते हैं कि उन्होंने किसी राजनीतिक लाभ, किसी भी समुदाय विशेष का तुष्टीकरण, विचारधारा के प्रभाव में ये बयान नहीं दिया। क्योंकि अपनी सफाई में वो ये कहेंगे ही। तो फिर आखिर उन्हें ऐसा कौन सा तथ्य मिल गया जो उन्होंने भारत को हिंदू राष्ट्र का दर्जा दे दिया।  

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत या जो भी लोग इस प्रकार के बयान लगातार दे रहे हैं, उनको धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ या तो नहीं मालूम या फिर वो इस देश को एक हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। उनका एक ही लक्ष्य रह गया है कि भारतीय विविधता को तार-तार कर इस देश में केवल हिंदू धर्म को ही मान्यता दी जाए। बाकी के लोग या धर्म परिवर्तन कर लें या देश छोड़ कर चले जाएं। यही कारण है कि एनआरसी के मुद्दे पर हमेशा यही कहा जाता है कि किसी भी हिंदू को देश छोड़कर जाना नहीं पड़ेगा।

सैकड़ों सालों के साथ के इतिहास
हिंदू-मुस्लिम के सैकड़ों सालों के साथ के इतिहास को दरकिनार कर आप एक विशेष समुदाय को यहां से बाहर निकालने पर क्यों अड़े हुए हैं।  हमारे खान-पान, साहित्य, लेखन, कविता, पहनावा, रोजमर्रा की जिंदगियों में पड़ी हुई छाप... सैकड़ों सालों से एक दूसरे के साथ होने का प्रमाण चीख-चीख कर देती है। फिर क्यों आप इस अमूल्य विरासत, इस प्यार, इस भाईचारे को नफरत में तब्दील करने में जुटे हैं?

अगर आपको नहीं मालूम तो बता देती हूं कि धर्मनिरपेक्षता का आसान शब्दों में अर्थ है सभी धर्मों का समान होना। यानी अगर भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है तो यहां सभी धर्म समान हैं। ये देश केवल हिंदुओं का नहीं है अपितु मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन सभी धर्म के लोगों का है और यही इस देश का सबसे बेहतरीन, सबसे अगल और बेहद खूबसूरत गुण हैं। इस देश के इस गुण को संभालें और संजोए रखें।

लेखिका: कामिनी बिष्ट

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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