Friday, May 14, 2021
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सफरनामा 2020ः धारा 370 हटाने के बाद कितना बदला जम्मू कश्मीर?

  • Updated on 12/25/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। किसी भी इंसान या देश के जीवनकाल में तारीख का विशेष महत्व होता है। जिसको दरकिनार करना आसान नहीं होता है। यानी एक सही या गलत निर्णय आपको कहीं से कहीं पहुंचा सकता है। यह जितना आपके जीवन पर सही फिट बैठता उतना ही देश या राज्य के जीवनकाल पर भी चरितार्थ होता है। हम बात कर रहे है जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) की-जिसको अब दो हिस्सों में बांटकर देखा जाएगा। एक वो दौर था जब जम्मू कश्मीर का नाम आते ही बम,बंदूक,खून से लथपथ युवा, बदले की आग से आतंकी कैंप में भटक जाना-बस यहीं अखबारों की हेडलाइंस दशकों से चली आ रही थी। लेकिन इसमें बदलाव की तारीख भी तय थी। जब कभी-भी जम्मू-कश्मीर की चर्चा छिड़ जाती है तो आंखों में अनेक विचार कोंधने स्वाभाविक है।

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बदलाव की राह पर जम्मू-कश्मीर

लेकिन अब जम्मू-कश्मीर भी बदलाव की राह पर तेजी से आगे बढ़ती नजर आ रही है। तो इसका क्रेडिट पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को पूरा जाएगा। बीजेपी के स्टार द्वय नेता मोदी-शाह की जोड़ी ने 5 अगस्त 2019 को ऐसा इतिहास लिख दिया जिसकी गूंज दशकों तक गूंजती रहेगी। कारण साफ है कि देश के किसी पीएम ने धारा 370 को छूना तो दूर चर्चा करना भी जरुरी नहीं समझा। लेकिन हां इतना जरुर किया कि अगली सरकार को हमेशा की तरह धारा 370 को प्लेट में सजाकर तोहफा देते रहें। फिर यह सिलसिला यूं ही चलता रहा... लेकिन बताने की जरुरत नहीं है कि देश में पिछले 70 सालों से ऐसे बहुमत की सरकार रही जो चाहते तो यह मसला कब का हल हो चुका होता। खासकरके 1989 तक का जिक्र करना जरुरी है क्योंकि इसी साल से आतंकवाद शुरु हुआ। जबकि पहले तो जम्मू-कश्मीर में शांति काल ही रही।

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 पत्थरबाजी और आतंकी कैंप से युवाओं ने मोड़ा मुंह 

लेकिन मौजूदा बदले हुए जम्मू-कश्मीर में अब कम से कम पत्थरबाजी की घटना, बड़े पैमाने पर युवाओं का आतंकी कैंप में भर्ती होना-यह सारे मुद्दे धीरे-धीरे गौण होते जा रहे है। हां इतना जरुर है कि कभी धारा 370 को हाथ लगाने पर कश्मीर में जलजला आने या फिर तिरंगा को उठाने वाले न मिलने की धमकी देने वाले पूर्व सीएम फारुख अब्दुला, उमर अब्दुला,महबूबा मुफ्ती की बोलती आजकल जरुर बंद है। हालांकि ऐसा नहीं हैं कि इन पूर्व सीएम जब नजरबंदी से बाहर आए तो आग बबूला और भड़काऊ बयान नहीं दिये। लेकिन उनके इस बयान पर जम्मू-कश्मीर के युवा जो पहले आंख मूंदकर चलते थे,उन्होंने परहेज करना शुरु कर दिया।

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गुपकार समझौते से खोई हुई जमीन पाने की नाकाम कोशिश

अब्दुला परिवार और मुफ्ती परिवार ने जम्मू-कश्मीर में अपने खोते जनाधार को फिर से पाने के लिये धारा 370 को फिर से बहाल करने के लिये गुपकार समझौते किये। जिसमें पीडीपी,नेका,कांग्रेस आदि पार्टी शामिल है। पिछले 1 साल में मोदी सरकार के लिये सबसे बड़ी चुनौती भी यहीं रही कि हर हाल में पाकिस्तान के शह पर जम्मू-कश्मीर को अंगुली पर नचाने वाले राजनीतिक पार्टियां, अलगाववादी नेता और आतंकी कैंप की जड़े कमजोर करना जरुरी था। जिसमें बहुत हद तक कामयाबी भी मिली। अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी अब नैपथ्य में जाने को मजबूर हो चुके है। कभी कश्मीर को लेकर फैसले लेने में हुर्रियत की अनदेखी करना भी मुनासिब नहीं था। कारण अलगाववादी नेताओं के एक इशारे पर ही पत्थरबाजी होना, या अन्य गतिविधि होना आम घटना थी। लेकिन अब यह सबकुछ उसी इतिहास के पन्नों में सिमट गए है। 

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लोकतंत्र की जड़ें हुई मजबूत

दरअसल जम्मू-कश्मीर में सही मायने में लोकतंत्र अब जाकर स्थापित हो पाया। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। कारण पिछले 72 साल में भारतीय संविधान हो या संसद के फैसले या फिर सुप्रीम कोर्ट का आदेश-सबकुछ जम्मू-कश्मीर के लिये बैमानी ही था। अक्सर इतिहास के पन्ने जब भी खंगाले जाएंगे तो तारीख हमें बहुत कुछ जानकारी दे जाती है। जिसकी अनदेखी तबके शासक जरुर कर देते है। लेकिन लंबे समय तक सच से मुंह मोड़कर रहा नहीं जा सकता। यह नहीं भूलना चाहिये कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय भी 27 अक्टूबर 1947 को बिना शर्त के हुई थी। लेकिन इसके वाबजूद कश्मीर का मुद्दा उलझता गया तो इसकी पूरी जिम्मेदारी से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु नहीं बच सकतें। उनकी सबसे बड़ी अदूरदर्शिता का ही परिचायक है कि जम्मू-कश्मीर का मुद्दा विवादित बना। 

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नेहरु की अदूरदर्शिता जब दिखी...

सवाल उठता है कि क्या धारा 370 का लागू होने का तार UN के उस फैसले से जुड़ता है जिसमें जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह का आदेश पारित किया गया। इसको गहराई से समझने की जरुरत है। दरअसल पंडित नेहरु ने जाने-अनजाने में 1 जनवरी 1949 को जम्मू-कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र में उठा दिया। अक्सर होता है कि एक गलती को सही करने के चक्कर में दूसरा गलती कर बैठते है... फिर यह कड़ी से कड़ी बनती जाती है। ऐसा ही जवाहर लाल नेहरु से भी हो गया। कम से कम यहां तो यहीं प्रतीत होता है। दरअसल जैसे ही नेहरु ने कश्मीर का मुद्दा UN में उठाया तो पाकिस्तान ने बहुत ही जोरदार तरीके से भारत को घेरने की सफल कोशिश की। जिसका परिणाम यह हुआ कि UN ने भारत से कहा कि जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाना चाहिये।

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ताकि कश्मीर में न हो जनमत संग्रह...

जब कभी-भी धारा 370 का जिक्र होगा तो एक शख्स को नहीं भुलाया जा सकता-गोपालस्वामी अयंगर। जिन्होंने ही पंडित नेहरु के दिमाग में यह बात बैठा दी कि यदि कश्मीर में जनमत संग्रह की नौबत आएगी तो शेख अब्दुला को अपने पाला में रखना जरुरी है। अगर शेख अपने साथ नहीं रहें तो जनमत संग्रह होने की स्थिति में बहुसंख्यक मुसलमानों को भारत के पक्ष में रखना मुश्किल हो जाएगा। और यहीं डर से शेख अब्दुला से नेहरु की दोस्ती भी प्रगाढ़ भी हुई। हरि सिंह से दूरियां भी बढ़ी। यहां पर वो कहावत चरितार्थ होते नजर आया कि भेड़िया आएगा... भेड़िया आएगा। हालांकि कभी जनमत संग्रह की नौबत तो नहीं आई लेकिन इसकी आड़ में शेख अब्दुला ने पंडित नेहरु से वो एतिहासिक गलतियां करा ली। जिसको सुधार करने में ही 72 साल बीत गए। जीं हां- धारा 370 और 35 A को जोड़ा जाना-जम्मू-कश्मीर को एक अंधे कुएं में धकेलने से कम नहीं रहा।

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लेकिन अब दिखने लगा कश्मीर में बदलाव 

लेकिन अब गत एक साल से ज्यादा समय से जम्मू-कश्मीर बदलता नजर आ रहा है। जम्मू-कश्मीर में पंचायत चुनाव,बीडीसी चुनाव और हाल ही में डीडीसी के सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न हुए। यहां दिलचस्प बात है कि जब पिछले साल बीडीसी के चुनाव हुए तो कांग्रेस, पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बहिष्कार किया। लेकिन अब डीडीसी के चुनाव में बड़े शोक से हिस्सा लिया। माना जा रहा है कि अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव भी होंगे। अब जम्मू-कश्मीर की पहचान बम,बारुद से आगे की हो गई है। जिसका एक बार फिर श्रेय वहां की जनता को देना चाहिये। जिन्होंने पाकिस्तान के कश्मीर राग अलापने पर भी बहकावें से दूर रहें।वहीं रोशनी जमीन घोटाला ने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों की पोल खोल कर रख दी है।

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