Sunday, Oct 17, 2021
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जानें, दिल्ली के किस क्षेत्र में श्रीकृष्ण ने बनवाया था बड़ी बहन का मंदिर

  • Updated on 8/30/2021

नई दिल्ली/अनामिका सिंह। कहा जाता है कि बहनें अपने भाइयों को बचाने के लिए अपना सर्वस्व लुटा सकती हैं। उसमें भी यदि भाई छोटा हो तो बड़ी बहन का वो दुलारा होता है। हम आज आपको भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बनवाए गए अपनी बड़ी बहन का मंदिर और उससे जुड़ी कहानी बताने जा रहे हैं।

जिन्होंने अपने दरवाजे से श्रीकृष्ण को खाली हाथ नहीं लौटाया, जब कृष्ण व अर्जुन को महाभारत युद्ध में माया की जरूरत पड़ी तो वो कृष्ण की मदद के लिए भी तैयार हो गईं थीं। तो हम आपको आज ले चलते हैं अनंगपाल तोमर के लालकोट किले के नजदीक बने सिद्धपीठ योगमाया मंदिर में, जोकि महरौली में पड़ता है। ये बेहद प्राचीन मंदिर है जो कुतुबमीनार के पृष्ठभाग में स्थित है। इतिहासकारों का कहना है कि यह मंदिर करीब 5 हजार वर्ष से अधिक पुराना है।

महरौली में खुद श्रीकृष्ण ने बनाया था अपनी बड़ी बहन का मंदिर

मालूम हो कि एक समय में दिल्ली में तोमर वंश का शासन था उस समय यह हिंदू व जैन क्षेत्र था। जहां बेहद सुंदर मंदिर थे। यही वजह थी कि इस पूरे क्षेत्र को योगमाया के नाम पर योगिनीपुर भी कहा जाता था लेकिन जब गुलाम वंश व खिलजी वंश का शासन दिल्ली में आया तब उन्होंने भारी संख्या में मंदिरों को नुकसान पहुंचाया और उसकी जगह मस्जिदों का निर्माण करवाया लेकिन अभी भी अधिकतर मस्जिदों में इस्तेमाल किए गए पत्थरों में हिंदू शैली की झलक साफ दिखाई दे जाती है।

हालांकि योगमाया मंदिर विध्वंस से बच गया। इतिहासकारों का कहना है कि यह मंदिर करीब 5 हजार वर्ष से अधिक पुराना है। यानि इसका निर्माण महाभारत काल के दौरान द्वापर युग में हुआ है। यही नहीं योगमाया मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। 

किवदंतियों के अनुसार यहां देवी सती का सिर गिरा था जिसके चलते यहां मां पिंड़ी रूप में विराजमान हैं। हालांकि सबसे अधिक इस मंदिर की कहानी को भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बहन योगमाया से जोडक़र देखा जाता है, जोकि भगवान कृष्ण को पालने वाले मां- पिता यशोदा व नंद की पुत्री थीं।

कहते हैं कि मां योगमाया का सिर इसी मंदिर में है, जबकि पैर विंध्याचल पर्वत पर हैं जहां उन्हें विंध्यवासिनी के रूप में पूजा जाता है। कहा जाता है कि कृष्ण व अर्जुन ने महाभारत युद्ध के समय इस मंदिर में आराधना की थी कि वो संध्याकाल से पहले जयद्रथ का वध कर सकें, जोकि असंभव लग रहा था। देवी ने अपनी माया से कुछ समय के लिए सूर्यग्रहण की स्थिति उत्पन्न की और जयद्रथ अपना रथ लेकर अर्जुन के सामने आ गया और अर्जुन ने उसका वध कर दिया। युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण के कहने पर इस मंदिर का निर्माण करवाया था। 

चौहानों की कुलदेवी हैं योगमाया:

मां योगमाया को चौहानों की कुलदेवी भी कहा जाता था। कहा जाता है कि रायपिथौरा की सुरक्षा आक्रमणकारियों से योगमाया करती थीं तभी वो लंबे समय तक सुरक्षित रहा। इतिहासकार बताते हैं कि 16वीं शताब्दी के मध्य में हिंदू राजा विक्रमादित्य हेमू ने इसका नवीनीकरण करवाया था।

जब औरंगजेब ने भी माना था योगमाया का चमत्कारः

कहते हैं कि औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने का आदेश दिया था। दिन में सेना द्वारा जितना मंदिर का भाग नष्ट किया जाता वो रात में फिर पूरा हो जाता। वहीं सैनिक थकने लगे, तब जाकर औरंगजेब ने मंदिर को न तोडऩे का फैसला लिया। 

नहीं किया गया मंदिर के गर्भगृह में परिवर्तन:

इस मंदिर की देखभाल वत्स कुल के ब्राह्मणों द्वारा की जा रही है। मंदिर के भीतर एक छोटा सा गर्भगृह है जिसे मुख्य मंदिर कहा जाता है। इस गर्भगृह को छोडक़र पूरे मंदिर का पुर्ननिर्माण समय-समय पर करवाया जाता रहा है। अभी जो मंदिर है वो करीब 60-65 साल पुराना है। मंदिर में देवी का श्रृंगार पुरूष पुजारियों द्वारा किया जाता है।

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