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सोलर और पिरुल दिलाएंगे पहाड़ पर रोजगार

  • Updated on 5/20/2019

देहरादून/ब्यूरो। इनवेस्टर्स समिट की सफलता पर खुश होने वाली सरकार को यकीन हो चला है कि इससे पर्वतीय क्षेत्र की जनता को अपेक्षित लाभ शायद ही मिले। विकल्प के तौर पर पिरूल से बिजली बनाने और सोलर पावर प्रोजेक्ट पर दाव खेलने की तैयारी चल रही है।

अक्टूबर 2018 में सम्पन्न हुए इनवेस्टर्स समिट के दौरान 1.25 लाख करोड़ का निवेश पर हस्ताक्षर हुए थे। लगातार मॉनिटरिंग और निवेशकों के साथ बातचीत के बाद अब तक प्रदेश में 16 हजार करोड़ के एमओयू पर काम शुरू हो गए हैं। इन परियोजनाओं को जमीं पर उतरने से पांच हजार लोगों से अधिक को रोजगार मिल सकता है। परंतु सरकार इससे बहुत उत्साहित नहीं है।

क्योंकि जमीन संबंधी कानूनों में छूट देने के बावजूद इनवेस्टर्स पहाड़ चढ़ने को राजी नहीं है। विकल्प के तौर पर पिरुल और सोलर नीति को बढ़ावा देने की योजना बनायी जा रही है। ऊधमसिंह नगर में दो सौ मेगावॉट के सोलर प्लांट लगाने पर बनी सहमति के बाद अब गढ़वाल में 177 मेगावॉट के सोलर पावर प्लांट का टेंडर किया गया है। एक मेगावॉट सोलर पॉवर जनरेट करने में दस लाख रुपये का खर्च आता है।

इससे साल भर में 65 लाख की आय प्राप्त की जा सकती है और आठ लोगों को रोजगार दिया जा सकता है। इसी तरह पिरुल से बिजली बनाने की नीति पर भी सरकार आगे बढ़ रही है। प्रदेश सरकार का मानना है कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाके में लगभग 23 मिट्रिक टन पिरुल की पत्तियां हर वर्ष होती है। इसमें से लगभग 15 मिट्रिक पत्तियों का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है।  

“इनवेस्टर्स समिट के तहत हुए एमओयू में से 16 हजार करोड़ से अधिक के निवेश पर काम शुरू हो चुका है। परंतु पर्वतीय क्षेत्र में पिरुल और सोलर पावर प्लांट की उपयोगिता अधिक है।”

त्रिवेन्द्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री

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