Friday, Sep 30, 2022
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special report: nitish is the only nitish on the scales of bihar''''s politics

स्पेशल रिपोर्टः बिहार की राजनीति के तराजू पर नीतीश ही नीतीश

  • Updated on 8/10/2022

नई दिल्ली/ अकु श्रीवास्तव। नीतीश कुमार बुधवार को लगातार आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे। वह भी अलग दलों और सियासी गणित के साथ। यह भी अपने आप में एक रिकार्ड ही होगा। बिहार की राजनीति को अब इस बात के लिए जाना जाता है कि वहां नीतीश कुमार के लिए क्या सुविधाजनक है और वह क्या कदम उठाने जा रहे हैं। यह बात सच है कि नीतीश कुमार पिछले कई महीनों से भारतीय जनता पार्टी से नाराज थे। भाजपा एक बड़ा दल है और इस मित्र पार्टी पर आरोप है कि वह नीतीश की इच्छाओं का सम्मान बिल्कुल नहीं कर रही थी।

तनातनी की कहानी तभी शुरू हो गई थी, जब आरसीपी सिंह को केंद्र में मंत्री बनाया गया था। आरसीपी सिंह उन दिनों जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष थे और उन्होंने खुद अपना नाम पार्टी कोटे से केंद्र में मंत्री के लिए भेज दिया था। बताते हैं कि अनमने ढंग से नीतीश पर सहमत हुए थे। 

असल में 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जब भाजपा ने सहयोगी दलों के लिए मंत्रिपद सीमित कर दिए तो नीतीश इससे नाराज थे और उन्होंने तभी फैसला कर लिया था कि केंद्र में उनकी पार्टी का कोई मंत्री नहीं होगा। इसके अलावा नीतीश चाहते थे कि राज्य की राजनीति में आगे रहने का हक उनका है। वह 2005 से ही राज्य में मुख्यमंत्री बने हुए हैं। (बीच का एक छोटा कार्यकाल छोड़ दिया जाए तो) मगर भाजपा अब बागडोर न सही मगर लगाम पूरी तरह अपने हाथ में बनाए हुए थी।

नीतीश कुमार हर बार एक नई राह चुनते हैं। बिहार की सामाजिक समीकरण की राजनीति के तराजू पर उनके पास यह सुविधा है कि वह दोनों ओर सकते हैं। उन्हें जब मुफीद लगता है वह भाजपा के साथ आ जाते हैं और जब उन्हें लगता है कि राजद और कांग्रेस के साथ जाने से उनकी जमीन मजबूत होगी, वह उनसे गलबहियां डाल लेते हैं।

नीतीश लगातार इस बात पर जोर दे रहे थे कि जातिगत आधार पर जनगणना होनी चाहिए, मगर भाजपा इसे लगातार अनसुना कर रही थी। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग वह लंबे समय से करते आ रहे हैं मगर केंद्र ने कभी इस पर गौर नहीं किया। 

भाजपा के साथ बिहार में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह लगातार वर्षों की कोशिश के बाद भी इतनी मजबूत नहीं हो पाई है कि अकेले दम पर कोई करिश्मा कर दे। बिहार में भाजपा नेता कभी खुद को बहुत मजबूती से स्थापित नहीं कर सके, वे जब भी कुछ बड़े भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गए। इसलिए आम जनता में उनकी बहुत पैठ भी नहीं बन सकी। इसलिए भाजपा ने आरसीपी सिंह पर भरोसा जताया। इससे वह नीतीश को दोहरा झटका दे सकती थी। आरसीपी सिंह धानुक समुदाय से हैं। इस समुदाय का बिहार में चार फीसद वोट है। यह समुदाय नीतीश जो कुर्मी समुदाय से हैं को ही अपना नेता मानता है।

माना जा रहा है कि भाजपा जो खेल खेलना चाह रही थी, उसमें वह 4 फीसद धानुक वोट को नीतीश से खींचकर आरसीपी सिंह के साथ अपने पक्ष में करना चाहती थी। लेकिन यह खेला इतना आसान नहीं था अभी इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि धानुक समुदाय नीतीश कुमार का साथ छोड़ कर के आरसीपी के साथ आ जाए। इसलिए नीतीश को राजद खेमे के तेजस्वी से संधि प्रस्ताव को आगे बढ़ाना पड़ा।

भाजपा ने यह पूरा खेल एक ऐसे नेता के सहारे खेल रही थी, जिसने आज तक जनता के बीच जाकर कोई चुनाव नहीं लड़ा है। आरसीपी सिंह राज्यसभा के नेता रहे हैं। इसलिए आरसीपी सिंह से महाराष्ट्र के शिंदे होने की उम्मीद कोई नहीं कर सकता। फिर भी अब आरसीपी सिंह के पास भाजपा का दरवाजा ही बचा है और उम्मीद की जा रही है कि वह अगले एक-दो महीने में खुल जाएगा। भाजपा चुपचाप खेल रही थी और उसे यह उम्मीद नहीं थी कि नीतीश कुमार अचानक इतना बड़ा कदम उठा लेंगे। इसलिए वह अभी हतप्रभ है और चुप्पी साधे हैं।

नीतीश की भूमिका 2024 के चुनाव को लेकर बड़ी हो सकती है। यह संभावना पूरी है कि वह विपक्ष के केंद्र में हों और सोनिया गांधी की रणनीति के तहत वह अन्य विरोधी दलों को एक साथ जुटाएं। काम काफी मुश्किल है यह। क्योंकि चाहे वह ममता बनर्जी हों या केसीआर सब अपने-अपने हित देखेंगे और उससे बड़े उनके अहम टकराएंगे। अब तो भाजपा को यह चिंता यह सता रही है कि कहीं उसके कुछ बड़े नेता न नीतीश कुमार के साथ न चले जाएं।

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