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डंडा घुमाता तंत्र, थरथराती हुई प्रजा

  • Updated on 4/8/2020

एक तस्वीर में एक लड़के को पुलिस वाला मार रहा है। लड़के के हाथ में टिफ़िन है और वह कह रहा है कि वह अपने मां-बाप के लिए खाना लेकर जा रहा है, जो खेत में काम कर रहे हैं। कोरोना लॉक डाउन के बीच इस तरह के कई सारे वीडियो और चित्र आते रहे हैं। कहीं पुलिस के लोग दिल्ली के आनंद विहार के पास अपने अपने गावों जाने वाली भीड़ पर डंडा चला रहे हैं। कहीं वे उनसे कान पकड़कर उठ्ठक - बैठक करवाते हुए माफ़ी मँगवा रहे हैं। एक जगह स्कूटर से अस्पताल जा रहे डॉक्टर पर पुलिस वाला डंडा चला देता है, और ये बताने पर कि वह डॉक्टर ड्यूटी करने अस्पताल जा रहा है, उसे डाँट कर कहता है कि पहले क्यों नहीं बताया। कोई डिलीवरी बॉय है जिस पर पुलिस का हाथ छूट रहा है। 

कोरोना के समय ये काफ़ी बढ़ा हुआ लगता है, पर पहले भी था। ऐसा कौन सा आम आदमी है, जो बहुत खुश होकर, बहुत उम्मीद और बहुत यक़ीन के साथ भारत के पुलिस थाने, सरकारी अस्पताल और अदालतों में जाते हैं। जिन्हें डंडे पड़ रहे हैं, वे अपराधी नहीं है। इन तस्वीरों में देखा जा सकता है कि वे लोग गरीब, असहाय, थके हुए, हारे हुए, परेशान और शायद भूखे भी हैं। कई तो अपने परिवार के साथ हैं, छोटे बच्चे, बूढ़ी माँ और पत्नी- ये उन लोगों में से हैं, जिन्हें गांधी ‘क़तार का आख़िरी’ कहते थे। वे किसी शौक़ से और शायद जानबूझकर क़ानून नहीं तोड़ रहे हैं। उन्हें न तो शायद क़ानून पता होता है, न उन्हें कोई बताता है, न उसके बीच जीने, रहने, बचने का रास्ता दिखाता है। 

जिनके हाथ में डंडे हैं और जो उन्हें चला रहे हैं, वे भी हम में यानी जनता में से ही निकलकर वहाँ पहुँचे हैं, हमारे मुहल्लों, बिरादरी, इलाक़ों से ही आए हैं। हमारे साथ ही पढ़ते थे, और हर मौक़े पर उनका बर्ताव ऐसा हो, ये भी ज़रूरी नहीं है. कई जगह पुलिस के लोग ही घर-घर राशन भी पहुँचा रहे हैं. कई जगह लोगों की मदद भी कर रहे हैं. कई जगह वे अकेले रह रहे बुजुर्गों का हाल-चाल भी पूछ रहे हैं। 

अपने- पराये का भेद
कई जगह पुलिस नागरिक और जनता को अपना मान रही है,बहुत जगह नहीं मान रही। किसी पर डंडा घुमाने से पहले शायद यही सोच होती होगी कि सामने वाले के साथ दुश्मनों की तरह पेश आओ. क्या कोई अपने घर परिवार वालों, दोस्तों के घर वालों पर भी ऐसी ही हालात में डंडे चलाने लगेगा। डंडा कोई अपने-पन और प्यार में नहीं घुमाता। वह सामने वाले को पराया और दूसरा मानता है और एक तरह की नफ़रत और दुश्मन भी रखता है। वह उनको औक़ात और हद में रखने के लिए ताक़त का इस्तेमाल सही मानता है। 

हम कैसे किसी को दूसरा, पराया या अन्य मानना शुरू कर देते हैं। शायद तब जब हम अपने सामने मौजूद इंसान को वह दर्जा न दें, जो हमने ख़ुद को दिया है। जब हम उससे बातचीत न कर सकें और उसे समझने की कोशिश न करें. हिंसा बातचीत के ब्रेक डाउन से शुरू होती है। 

ये कैसे तय होता है कि मैं धरती और देश के लिए बिलकुल वाजिब और सही हूँ, जबकि सामना खड़ा इंसान, उसके बच्चे, उसके बूढ़े मां-बाप बोझ. उन बच्चों के बारे में नहीं सोचा गया जिन्होंने अपने माँ - पिता पर पुलिस को अपना ग़ुस्सा निकालते, गालियाँ देते, और डंडे चलाते देखा। भारत में पुलिस क्योंकि अंग्रेजों की विरासत है इसलिए जनता उनके सामने हमेशा शक के घेरे में हैं, एक कठघरे में खड़ी हुई है, जिस पर भय और डंडे का राज क़ायम रहना सरकार के चलाने के लिए ज़रूरी है. ये टैम्पलेट (प्रारूप) बदला नहीं गया है। 

पुलिस ख़ुद तनाव और दबाव की शिकार
निचले तबके की पुलिस ख़ासी खीझ, ग़ुस्से और थकान का भी शिकार होती है. जितनी हिंसा हम उन्हें लोगों पर निकालते देखते हैं, शायद वे ख़ुद भी उसका शिकार होते हैं. उनपर काम का बोझ ज़्यादा है. भारत में पुलिस की स्थिति पर एक रिपोर्ट कॉमन कॉज और सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) ने 2019 में जारी की थी। इसके मुताबिक़ -
-भारत का पुलिस बल दुनिया में सबसे कमजोर है, जितनी संख्या पुलिस बल की होनी चाहिए, वह उससे 77 फ़ीसदी ही है. यानी ज़रूरत का सिर्फ़ तीन चौथाई। 

-हर दो में से एक पुलिस कर्मी ओवरटाइम कर रहा होता है, और दस में से आठ को ओवरटाइम का भुगतान नहीं मिलता।
नागालैंड को छोड़कर बाक़ी राज्यों में उनके ड्यूटी आवर्स बहुत ज़्यादा हैं। 
-हर पाँच में से तीन कर्मी सरकारी आवास सुविधा से नाखुश हैं। 
-हर चार में से तीन कर्मियों को लगता है कि काम के बोझ से उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है। 
-हर चार में से एक कर्मी की शिकायत है कि उनसे उनके अफ़सर घर के काम करवाते हैं, ये शिकायत अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के कर्मियों की तरफ़ से ज़्यादा है। 
-हर दो में से एक कर्मी कहता है कि उसे वीकली ऑफ नहीं मिलता। 
-हर पाँच में से दो कर्मियों का कहना है कि उनके अफ़सर उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते है।
आरक्षित वर्ग के पदों की भर्तियाँ कई हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ख़ासी बकाया हैं।

जबकि उनकी ख़ुद की गरिमा, सहूलियतें और आश्वस्तिबोध मुश्किल में हो, उनसे ये उम्मीद करना कि वे क़ानून की ज़द में रहकर व्यवस्था को तसल्लीबख्श तरीक़े से लागू कर पाएंगे, उनके साथ ज़्यादती है। हालांकि ये भी सही है कि बीट कॉंस्टेबल जनता से कैसे पेश आयेगा, ये उसके अफ़सर से तय होता है। वह अच्छा होगा तो नीचे का स्टाफ़ भी अच्छा होगा। उसके डंडा चलाने के पीछे उसके अफ़सरों की सूझ भी है। 

डंडा चलाने से पहले अगर वे सामने खड़े शख़्स को अपने ही संविधान द्वारा संरक्षित नागरिक और इसी देश के प्यारे देशवासी की तरह देख ले तो शायद ऐसी ज़रूरत न पड़े। पहले पता नहीं चलता था पर अब कहीं न कहीं से कोई मोबाइल पर रिकॉर्ड कर ही लेता है। मनुष्य होने की ज़रूरत पुलिस वालों को बहुत ज़्यादा है, थोड़ा ख़ुद के साथ और जनता के साथ तो  बहुत ही ज्यादा। 

लेखक- निधीश त्यागी वरिष्ठ पत्रकार है

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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