Thursday, Jan 20, 2022
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स्टील सेक्टर ने सरकार से मांगी कच्चे माल पर कस्टम ड्यूटी से राहत, उद्योग की वृद्धि पर हो रहा असर

  • Updated on 1/4/2021

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। इस्पात क्षेत्र (Steel Sector) ने आगामी बजट में एंथ्रेसाइट कोयला, मेटालॢजकल कोक, कोकिंग कोयला और ग्रेफाइट इलैक्ट्रॉड जैसे कच्चे माल पर मूल सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी)में कटौती की मांग की है। 
उद्योग मंडल सी.आई.आई. ने इस्पात क्षेत्र को लेकर आगामी बजट के लिए दी गई सिफारिशों में कहा कि बेहतर गुणवत्ता और मात्रा में इन वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से इस्पात उद्योग की वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है।

 उद्योग जगत ने एंथ्रेसाइट कोयला पर मौजूदा मूल सीमा शुल्क 2.5 प्रतिशत को घटाकर शून्य करने का सुझाव दिया है। उसने कहा कि देश में अच्छी गुणवत्ता में इन उत्पादों की उपलब्धता घट रही है। ऐसे में इस्पात उद्योग को नियमित आधार पर इन वस्तुओं के आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है।

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घरेलू इस्पात उद्योग को लागत के हिसाब से प्रतिस्पर्धी होने में मदद
सी.आई.आई. ने मेटालॢजकल कोक के लिए आयात शुल्क मौजूदा 5 प्रतिशत से कम कर 2.5 प्रतिशत करने का सुझाव दिया। उद्योग मंडल ने कहा, ‘कम राख वाले मेटालॢजकल कोक (एच एस कोड 2704) स्टील बनाने के लिए प्रमुख कच्चा माल हैं। कच्चे माल की कुल लागत में इसकी हिस्सेदारी 46 प्रतिशत है। शुल्क में कटौती से घरेलू इस्पात उद्योग को लागत के हिसाब से प्रतिस्पर्धी होने में मदद मिलेगी।

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कोकिंग कोयले की घरेलू आपूॢत पर्याप्त नहीं 
अपनी सिफारिशों में सी.आई.आई. ने कोकिंग कोयले पर भी आयात शुल्क कम करने का सुझाव दिया है। फिलहाल कोकिंग कोल पर आयात शुल्क 2.5 प्रतिशत है। उद्योग मंडल ने कहा कि कोकिंग कोयले की घरेलू आपूॢत पर्याप्त नहीं है। इसीलिए घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका आयात करना होता है। इस पर शुल्क घटाकर शून्य किया जाना चाहिए। 

उच्च शुल्क से कम्पनियों की बढ़ती है लागत 
सी.आई.आई. के अनुसार ग्रेफाइट इलैक्ट्रोड का भी इस्पात बनाने में काफी उपयोग होता है। घरेलू इस्पात उत्पादक कम्पनियां ग्रेफाइट इलैक्ट्रोड का आयात करने के लिए बाध्य हैं क्योंकि देश में जो भी उत्पादन होता है, उसका करीब 60 प्रतिशत निर्यात हो जाता है। इससे घरेलू बाजार में इसकी कमी है। 
उद्योग मंडल ने कहा, ‘‘उच्च शुल्क से कम्पनियों की लागत बढ़ती है। ऐसे में इसे मौजूदा 7.5 प्रतिशत से घटाकर शून्य स्तर पर लाने की जरूरत है।

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1.75 करोड़ गांठ कपास की मंडियों में पहुंची
किसान आंदोलन बड़े स्तर पर चलने के बावजूद भी देश में कपास की दैनिक आमद बम्पर चल रही हैं। सूत्रों के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों की मंडियों में अब तक करीब 1.75 करोड़ गांठ कपास पहुंचने की सूचना है। इसमें से करीब 80 लाख गांठ कपास सरकारी खरीद एजैंसियों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद ली हैं। 

भारतीय कपास निगम (सी.सी.आई.) ने हाल ही में अपनी पुरानी रूई गांठ साल 2018-19 व 2019-20 की बड़ी मात्रा में बेची है। सूत्रों के अनुसार सी.सी.आई. व महाराष्ट्र फैडरेशन ने 15-20 लाख गांठ रूई सेल की है। भारतीय कताई मिलों ने पिछले 45-50 दिनों में यार्न की अच्छी खासी बिक्री की है। कताई मिलें लगातार बेहतर  माॢजन में चल रही हैं। मिलों को मुख्य कमाई विदेशों में यार्न निर्यात से ही होती हैं।

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साल 55-60 लाख गांठ रूई निर्यात होने के कयास
देश से विभिन्न देशों को अब तक करीब 32 लाख गांठ रूई निर्यात होने की सूचना है। इस साल 55-60 लाख गांठ रूई निर्यात होने के कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं देश में करीब 8 लाख गांठ रूई आयात होने की सूचना है।

भारतीय रूई बाजार में आगामी दिनों में तेजी आने के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि तेजडिय़ों ने दीपावली के बाद रूई बाजार में मोटी तेजी आने के कयास लगाए थे लेकिन तेजडिय़ों के सपने अधूरे रह गए हैं। अब तेजी आने का मुख्य कारण यार्न में मोटी तेजी आना माना जा रहा है। सूत्रों की मानें तो चालू कपास सीजन दौरान भारतीय रूई बाजार का गियर सी.सी.आई. के हाथ में रह सकता हैं।

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