Friday, Aug 19, 2022
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महिलाओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट एक और ऐतिहासिक फैसला, इस कानून में हुआ बदलाव

  • Updated on 10/16/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। सुप्रीम कोर्ट (Suprime Court) ने महिलाओं के पक्ष में एक और ऐतिहासिक फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि घरेलू हिंसा की शिकार महिला के लिए घर का मतलब पति के किसी भी रिश्तेदार का घर भी है। उसे उनके घर में रहने का अधिकार दिया जा सकता है। घरेलू हिंसा कानून, 2005 की धारा 2 (एस) का दायरा विस्तारित करते हुए अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने ये फैसला सुनाया है। 

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साझा घर में रिश्तेदारों का घर हुआ शामिल
बता दें कि घरेलू हिंसा कानून, 2005 की धारा 2 (एस) में पति के साझाघर की परिभाषा दिया गया है। जिसके मुताबिक हिंसा के बाद घर से निकाली महिला को साझाघर में रहने का अधिकार है। अब तक ये साझा घर पति का घर, चाहे ये किराए पर हो या संयुक्त परिवार का घर, जिसका पति सदस्य हो, माना जाता था। इसमें ससुरालियों के घर शामिल नहीं थे। वहीं साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि साझा घर में रिश्तेदारों के घर शामिल नहीं होंगे।

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने दो जजों की पीठ के इस फैसले को पलट दिया और गुरुवार को दिए फैसले में कहा कि धारा 2(एस) में साझा घर की परिभाषा को पति की रिहायश और उसके संयुक्त परिवार की संपत्ति तक ही सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसमें पति के किसी भी रिश्तेदार का घर भी शामिल किया जदा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस कानून का मकसद महिलाओं को उच्चतर अधिकार देना है।  

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2005 में बना कानून है मील का पत्थर
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए साल 2005 में बने कानून को ‘मील का पत्थर’ करार दिया है और कहा कि, देश में उनके खिलाफ इस तरह के अपराध तेजी से फैले हैं और वे किसी न किसी रूप में रोजाना हिंसा का सामना करती हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला ने पूरे जीवन एक बेटी, बहन, पत्नी, मां और साथी या अकेली औरत के तौर पर कभी भी खत्म नहीं होने वाली हिंसा और भेदभाव के चक्र का त्याग कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा, वर्ष 2005 में लागू हुआ कानून इस देश की महिलाओं की रक्षा के लिए मील का पत्थर है।

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