Monday, May 10, 2021
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बेटियों को मिलेगा पैतृक संपत्ति में हक, जानिए इससे बेटों के अधिकारों पर पड़ेगा क्या असर, एक नजर...

  • Updated on 8/12/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। पैतृक संपत्ति में बेटियों के हक को लेकर सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया है। इस फैसले को लैंगिक समानता हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

इस नए कानून के अंतर्गत अब बेटियां भी पिता की संपत्ति में पूरी हकदार मानी जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे कहा कि बेटियों का भी अपने पिता की संपत्ति पर हक तभी से हो जाता है जब उसका जन्म होता है, जैसे बेटा दावेदार माना है वैसे ही बेटी भी अपने पिता की संपत्ति  की दावेदार मानी जाती है।

बेटियों के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पैतृक संपत्ति पर होगा बराबर का अधिकार

कोर्ट ने कानून में क्या कहा
अपना फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने पूर्व के कानून और अपने फैसले के बारे में क्लियर करते हुए कहा, हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में संशोधित धारा 6 के संशोधन करने से पहले या बाद में जन्मी बेटियों को पिता की संपत्ति में वारिस बनाती हैं और उन्हें भी बेटों की तरह ही अधिकार और दायित्व देती है। इस हिसाब से, बेटियां 9 सितंबर, 2005 के पहले से प्रभाव से अपने पिता की संपत्ति पर अपने अधिकार का दावा कर सकती हैं।'

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क्या है पिता की संपत्ति
कोर्ट ने बताया कि इसमें पिता के ऊपर की तीनों पीढ़ियों की संपत्ति की बात की जाती है। इसमें संतान के पिता के पिता की संपत्ति और उनके पिता की संपत्ति शामिल मानी जाती है, यानी पड़दादा तक इसमें जुड़े होते हैं। लेकिन इसमें पिता द्वारा कमाई गई संपत्ति शामिल नहीं होती, इसलिए इस पर पिता का हक है कि वो किसे और कैसे अपनी संपत्ति का बंटवारा करे।

पिता कम या ज्यादा, बेटा-बेटी किसी को भी दे सकता है और अगर बिना वसीयत लिखे पिता की मृत्यु हो जाए तो फिर बेटी की पिता की अर्जित संपत्ति में भी बराबरी की हिस्सेदारी हो जाती है।

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बेटों के अधिकारों पर क्या पड़ेगा असर
बेटियों को मिले इस हक से परेशान हो रहे बेटों को सुप्रीमकोर्ट ने परेशान न होने की सलाह दी है। एससी के तीन जजों की पीठ ने कहा कि इससे बेटों को परेशान होने की जरूरत नहीं है, ये सिर्फ बेटियों के अधिकारों को विस्तार देना है। जबकि धारा 6 के शामिल सभी हक बेटों को बराबर मिलेंगे।

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बेटियां हमेशा रहती हैं बेटियां...
सुप्रीमकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए अपना 1996 में दिए गए फैसले के वक्त की बात को ही एक बार फिर दोहराया। जजों की इस तीन सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, 'बेटा तब तक बेटा होता है जब तक उसे पत्नी नहीं मिलती है। बेटी जीवनपर्यंत बेटी रहती है।'  अरुण मिश्रा का ये दोहराना बेटियों के लिए इतिहास बना गया। बता दें, इस तीन जजों की इस सदस्यीय पीठ में जस्टिस एस। अब्दुल नजीर और जस्टिस एमआर शाह भी शामिल थे।

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