Thursday, Aug 16, 2018

जेपी ग्रुप के खिलाफ दिवालिएपन की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी

  • Updated on 8/9/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। सुप्रीम कोर्ट ने जेपी ग्रुप को करारा झटका देते हुए आज राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की इलाहाबाद पीठ को ग्रुप की कंपनी जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड (जेआईएल) के खिलाफ दिवालियापन कानून के तहत फैसला करने कहा है। साथ ही कंपनी की नई नीलामी प्रक्रिया में इस ग्रुप या इसके प्रमोटरों को भाग लेने से रोक दिया। 

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यह मामला सुनने वाली चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दिवालियापन संहिता के अंतर्गत मामले के निपटाने के लिए 180 दिन का वक्त सीमा आज से शुरू होगी। पीठ में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे। पीठ ने यह भी कहा है कि जेपी इंफ्राटेक लिमिटेड द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जमा कराए गए 750 करोड़ रुपये एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ को हस्तांतरित कर दिए जाएंगे।   

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शीर्ष अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक को जेआईएल की होल्डिंग कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट लिमिटेड (जेएएल) के खिलाफ दिवालियापन कानून में एक अलग से कार्रवाई शुरू करने की भी इजाजत दी। पीठ ने कहा कि कर्ज शोधन अक्षमता एवं दिवालियापन संहिता (आईबीसी) में किए गए संशोधनों के अनुसार घर खरीदने के लिए पैसा जमा कराने वाले ग्राहकों को भी वित्तीय ऋणदाताओं के समूह में शामिल किया जाए। 

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संविधान पीठ ने उसके सामने लंबित सभी याचिकाओं एवं आवेदनों का निपटान किया। न्यायालय ने इससे पहले इस मामले में जेआईएल, जेएएल के ग्राहकों , बैंकों और वित्तीय संस्थानों समेत विभिन्न हितधारकों और दिवालियापन समाधान पेशेवर (आईआरपी) द्वारा मांगी गई च्च्अंतरिम राहत’’ पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था।

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इस मामले में आईडीबीआई बैंक ने जेएएल के खिलाफ 526 करोड़ रुपये का कर्ज ना चुकाने के आरोप में एसीएटी में दिवालियापन कानून के तहत निपटान का मामला दायर किया था।  सहायक सालिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि जैसा कि अब मकान खरीदने वाले ग्रहाकों को भी दिवालियापन संहिता के तहत वित्तीय रिणदाता माना गया है, इसलिए इस मामले के वित्तीय रिणदाताओं (सामान्यत: वित्तीय संस्थान) की समित को समाधान योजना पर फैसला करते समय ग्रहाकों का पक्ष भी सुना जाना चाहिए।

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ग्राहकों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने जेएएल की इस दलील का विरोध किया था कि उसे आवास परियोजनाएं पूरा करने की छूट मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि कानून के तहत कंपनी पर इसकी रोक लगी है। पीठ ने स्थिति की गंभीरता पर गौर करते हुए कहा कि हालांकि कंपनी की देनदारी 2000 करोड़ रुपये की थी, जो अब बढ़ कर 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। 

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कंपनी ने कहा था कि उसने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में 750 करोड़ रुपये जमा करा रखें हैं और ग्रहकों का मूलधन चुकाने के लिए 600 करोड़ रुपये और चाहिए होंगे। उसकी ओर से यह भी कहा कि अगर उसे उसकी कुछ चिह्नित परिसम्पत्तियों की सेल की इजाजत हो तो वह 600 करोड़ रुपये जमा करा सकती है। इन सम्पत्तियों में रीवा (मध्या प्रदेश) का एक सीमेंट कारखाना भी है। ग्राहक कंपनी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चले गए थे। उनका कहना था कि करीब 32000 लोगों ने कंपनी की परियोजनाओं में फ्लैट बुक कराए थे और वे अब किस्तें जमा कर रहे हैं।

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