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नफरत भरे भाषण को लेकर चुनाव आयोग की कार्रवाई से सुप्रीम कोर्ट असंतुष्ट

  • Updated on 4/15/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। उच्चतम न्यायालय ने चुनाव प्रचार के दौरान बसपा प्रमुख मायावती और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कथित रूप से विद्वेष फैलाने वाले भाषणों के मामले में उनके खिलाफ निर्वाचन आयोग की अब तक की कार्रवाई पर सोमवार को अप्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि वह आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में आयोग के अधिकारों के दायरे पर विचार किया जायेगा। 

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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने चुनाव प्रचार के दौरान उप्र के इन दो प्रमुख नेताओं के कथित रूप से विद्वेष फैलाने वाले भाषणों का संज्ञान लेते हुये आयोग से जानना चाहा कि उसने अभी तक क्या कार्रवाई की। इससे पहले आयोग ने इस मामले में खुद को ‘दंतविहीन’ बताया था। पीठ ने कहा, ‘‘आप बतायें कि आप क्या कर रहे हैं। हमें बतायें कि आपने क्या कार्रवाईकी है।’’  

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इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने आयोग के एक प्रतिनिधि को मंगलवार की सुबह साढ़े दस बजे तलब किया। पीठ ने आयोग के इस कथन पर गौर करने का निश्चय किया कि उसके पास चुनाव प्रचार के दौरान जाति एवं धर्म को आधार बना कर विद्वेष फैलाने वाले वाले भाषणों से निबटने के लिये सीमित अधिकार है। मामले की सुनवाई के दौरान एक अवसर पर तो न्यायालय ने निर्वाचन आयोग के वकील से कहा कि वह मुख्य निर्वाचन आयुक्त को आधे घंटे के भीतर यहां हाजिर होने के लिये बाध्य करेगा। 

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पीठ ने चुनाव सभाओं में मायावती और आदित्यनाथ के बयानों के बारे में भी आयोग से जानकारी मांगी। आयोग के वकील ने कहा, ‘‘इस संबंध में आयोग के अधिकार बहुत ही सीमित हैं। हम नोटिस देकर जवाब मांग सकते हैं परंतु हम किसी राजनीतिक दल की मान्यता खत्म नहीं कर सकते और न ही किसी प्रत्याशी को अयोग्य करार दे सकते हैं। हम सिर्फ सलाह जारी कर सकते हैं और यह अपराध दुबारा होने पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं।’’

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न्यायालय के सख्त रूख के चंद घंटों के भीतर ही निर्वाचन आयोग हरकत में आया और उसने दोनों नेताओं की सांप्रदायिक टिप्पणियों के लिये कड़े शब्दों में निन्दा की और उन्हें चुनाव प्रचार से रोक दिया। आयोग ने आदित्यनाथ को 72 घंटे और बसपा सुप्रीमो मायावती को 48 घंटे के लिये चुनाव प्रचार से बाहर कर दिया। पीठ संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में शारजाह के रहने वाले प्रवासी भारतीय योग प्रशिक्षक हरप्रीत मनसुखानी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। शीर्ष अदालत ने आठ अप्रैल को इस याचिका पर केन्द्र और निर्वायन आयोग को नोटिस जारी किये थे। 

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इस याचिका में योग प्रशिक्षक ने आम चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं के मीडिया में धर्म एवं जाति के आधार पर की जाने वाली टिप्पणियों पर चुनाव आयोग को ‘‘कड़े कदम’’ उठाने का निर्देश देने का अनुरोध किया है। याचिका में शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का अनुरोध किया गया है जो पूरी चुनाव प्रक्रिया पर पैनी निगाह रखने के साथ ही निर्वाचन आयोग की ईमानदारी की भी परख करे। 

इससे पहले, मामले की सुनवाई शुरू होते ही पीठ ने निर्वाचन आयोग से जानना चाहा कि राजनीतिक नेताओं के खिलाफ अभी तक उसने क्या कार्रवाई की है। आयोग के वकील ने जब यह कहा कि वह जनहित याचिका के जवाब में हलफनामा दाखिल करेंगे तो पीठ ने इस पर नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने सवाल किया, ‘‘किस लिये, आप जवाबी हलफनामा दाखिल करना चाहते हैं। हमें बतायें कि आपने क्या कार्रवाई की है। हमें बतायें कि कितने व्यक्तियों को नोटिस दिया गया है।’’

एक चुनाव सभा में मायावती के कथित विद्वेष फैलाने वाले भाषण का जिक्र करते हुये पीठ ने पूछा, ‘‘क्या उन्होंने जवाब दिया। आपको कानून के तहत क्या कार्रवाई करने का अधिकार हैं। पीठ ने कहा कि बसपा को आयोग की नोटिस का जवाब देने का समय 12 अप्रैल को ही खत्म हो गया है और इसके बाद आपने क्या कार्रवाई की।

पीठ ने सालिसीटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े से कल इस मामले में न्यायालय की मदद करने का आग्रह किया है। हेगड़े ने कहा कि संविधान के तहत निर्वाचन आयोग को चुनाव प्रचार के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लघन से निबटने के लिये बहुत अधिक अधिकार प्राप्त है। 

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