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सार्वजनिक जीवन में गरिमा, साहस व निष्ठा की प्रतिमूर्ति थीं ‘सुषमा स्वराज’

  • Updated on 8/8/2019

सुषमा  स्वराज जी हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु उनके साथ बीते पल और सांझी की गई बातें मेरे लिए अनमोल हैं। वे जीवन भर स्मरण रहेंगी।  रात में मुझे अचानक पता चला कि सुषमा जी का स्वास्थ्य खराब हो गया है और उन्हें एम्स ले जाया गया है। जानकारी मिलते ही उनका हाल जानने मैं एम्स के लिए निकल गया लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था।  सुषमा जी से मेरा बहुत गहरा नाता था। वह राजनीति में मेरी पथ प्रदर्शक थीं, पारिवारिक रूप से बड़ी बहन थीं। भारतीय राजनीति की सौम्यता हमसे विदा हुई है। उनका जाना निश्चित तौर पर व्यक्तिगत क्षति है।  उनकी बेजोड़ भाषाशैली ने देश के आमजन  के मन में हिंदी भाषा के प्रति आकर्षण पैदा किया। सुषमा जी  अपनी शैली की श्रेष्ठ हिंदी वक्ता थीं। वह सार्वजनिक जीवन में गरिमा, साहस और निष्ठा की प्रतिमूर्ति थीं। लोगों की सहायता के लिए वह हमेशा तत्पर रहती थीं। उन्होंने एक प्रखर वक्ता, एक आदर्श कार्यकत्र्ता, लोकप्रिय जनप्रतिनिधि व एक कर्मठ मंत्री जैसे विभिन्न रूपों में भारतीय राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। राष्ट्रवादी राजनीति ने एक ओजस्वी स्वर खो दिया है। 

वचनबद्धता व गंभीरता
भाजपा के शुरूआती कार्यकाल से ही वह पार्टी में जिम्मेदार और समर्पित कार्यकत्र्ता की भूमिका में रहीं। उनमें विचारधारा के प्रति वचनबद्धता और गंभीरता थी। पार्टी में उन्हें जो भी भूमिका मिली, उसे न्यायपूर्ण तरीके से निभाया। जब वह विपक्ष की नेता थीं, तब उन्होंने पूरी ईमानदारी से जनता का पक्ष रखने का काम किया। केन्द्र में जब विदेश मंत्री थीं, उस समय भी उन्होंने पूरी कटिबद्धता के साथ काम को पूरा किया।  बतौर विदेश मंत्री उन्होंने दुनिया भर में बसे भारतीयों की जिस तरह से मदद की, उससे लोगों के मन में सरकार के प्रति नया विश्वास पैदा हुआ। वह हर काम बहुत कुशलता से करती थीं। मुसीबत में फंसे लोगों को जब तक सहायता नहीं मिल जाती वह चैन से नहीं बैठती थीं। विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने सांसदों के साथ संगठनात्मक और पारिवारिक जुड़ाव लाने का काम किया।  टैलेंट कार्यक्रम के जरिए भाजपा के हर सांसद की अभिरुचि को जाना और उसकी पसंद के हिसाब से उसे काम करने का अवसर उपलब्ध कराया।  जब उन्हें लगा कि जनता के लिए पूरी गंभीरता से काम नहीं कर पाएंगी, उस समय उन्होंने चुनाव नहीं लडऩे का फैसला ले लिया।  

सहयोग बड़ा आधार था
मुझे उनका सदैव सहयोग मिला। बहुत सारी ऐसी बातें हैं जिन्हें मैं सार्वजनिक नहीं कर सकता लेकिन जब मैं भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष था, उस समय उनका मुझे बहुत सहयोग मिला। उस दौर में कुछ राज्यों में असहमति की स्थिति थी, पाॢलयामैंट्री बोर्ड में भी कई बार मत नहीं बन पाते थे, ऐसे में वह मेरी मदद किया करती थीं। वह मुझे बताया करती थीं कि किस मसले का कैसे मार्ग निकलेगा। मेरे लिए सुषमा जी का सहयोग बहुत बड़ा आधार था। पार्टी के अंदर कई  बार ऐसी स्थिति आई, जिसमें निर्णय लेना बहुत कठिन  होता था। सुषमा जी ने हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया और हर काम को बड़ी सहजता से करने का रास्ता बताया। उनके नैतिक समर्थन के कारण मैं बहुत सारे काम कर पाया। 

उनका मेरे प्रति अथाह स्नेह था। उनमें मुझे अपनी बड़ी बहन का रूप दिखाई देता था। वह उसी तरह से मेरी ङ्क्षचता भी किया करती थीं। एक बार मैं बीमार हुआ, उन्हें पता चला तो तत्काल एम्स से चिकित्सक लेकर आ गईं। मुझसे बोलीं कि अब आपकी कोई बात नहीं सुननी। अधिकार के साथ पूरा चैकअप कराने को कहा। उनके कहने पर मैं एम्स गया, वहां पूरी जांच कराई। उन्होंने मेरी स्वास्थ्य रिपोर्ट के बारे में जाना। उसके बाद बड़ी बहन की तरह पूरे अधिकार के साथ स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की मुझे हिदायत दी। मैं भी उनकी बात को उसी गंभीरता से लेता था लेकिन अलग-अलग तरह का व्यंजन खाने का मेरा स्वभाव है, उसमें मैं फिर लापरवाही करने लगा। 

इस बात की जानकारी जब उन्हें लगी, तो मेरी पत्नी कंचना को नागपुर में फोन लगाकर बोलीं कि वह मेरा ध्यान रखें क्योंकि मैं स्वास्थ्य के प्रति बहुत लापरवाही करता हूं। ऐसी चिंता करने वाले विरले ही होते हैं। उन्होंने हर किसी के साथ पारिवारिक रिश्ता बनाकर उसे पूरी तरह से निभाया। हर कार्यकत्र्ता के साथ उनका माता और बहन का नाता था। 
मुझे जब भी समय मिलता उनसे मिलने चला जाया करता था।  सुषमा जी के साथ ऐसा पारिवारिक नाता बन गया था। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं हो रहा कि वह हमारे लिए दुख-सुख सांझा करने वाली बन गई थीं। उनकी बेटी बांसुरी बिल्कुल उन्हीं की तरह बुद्धिमान, सहज, सरल बिटिया है। वह अक्सर मेरे यहां आया करती है। उसे हमारे यहां का बना परांठा और दही बहुत पसंद है। मेरे यहां जब भी परांठा  बनता, मैंने विशेष तौर पर कह रखा था कि वह बांसुरी के लिए देकर आना है।  मैं जब सुषमा जी से मिलने जाता था तो वह मेरे लिए विशेष रूप से पोहा बनवाया करती थीं। वह घर पर बोल रखती थीं कि नितिन को आज आना है, इसलिए पोहा बनाने की तैयारी करके रखो।   

राजनीतिक व पारिवारिक जीवन के प्रति चिंता
सुषमा जी मेरे राजनीतिक और पारिवारिक जीवन की बहुत चिंता किया करती थीं।  नागपुर से मेरे चुनाव लडऩे की इच्छा के बारे में जब उन्हें पता चला तो उन्होंने मुझे समझाने का प्रयास किया। उन्होंने मुझसे कहा कि मेरा नागपुर से चुनाव लडऩे का फैसला बहुत जोखिम भरा है। उनका कहना था कि वह सीट भाजपा के अनुकूल नहीं है। उन्होंने मुझे समझाया कि मैं देश की किसी अन्य सीट से चुनाव लडऩे के बारे में सोच लूं लेकिन  मैंने जब उन्हें कहा कि नागपुर से चुनाव लडऩे का मैंने निश्चय कर लिया है और वहां से जीतकर आऊंगा तो वह मेरे इस फैसले से बहुत खुश हुईं। राजनीति में विपरीत परिस्थिति को चुनने के मेरे निर्णय से वह बहुत प्रभावित थीं। मैं जब 2014 का लोकसभा चुनाव जीतकर आया तो वह बहुत खुश थीं। उन्होंने कहा कि नितिन आपकी हठ जीत गई। 

इस बार लोकसभा चुनाव जीतकर जब मैं आया तो संयोग से पंडित दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा कार्यालय में मैं और सुषमा जी साथ-साथ पहुंचे। उन्हें देखते ही मैं पास गया और आदर से मेरा सिर झुक गया। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए अभिभावक का एहसास कराया। मैंने कहा कि आज आपके स्नेह ने मुझे फिर अपनी बड़ी बहन से मिलने का एहसास कराया तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। इसके बाद मैं जब  मंत्री बना तो उनसे मिलने घर गया। करीब एक-डेढ़ घंटा हम साथ रहे।  पूरे समय घर-परिवार की बातें होती रहीं। देश ने ओजस्वी स्वर खो दिया है। 

(लेखक केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री हैं)
नितिन गडकरी

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