Saturday, Nov 16, 2019
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अमरीका-ईरान के बीच तनाव घटाने में मदद करे भारत

  • Updated on 6/24/2019

भारत को इस बात का पूरा प्रयास करना चाहिए कि हमारे दो दोस्तों के बीच युद्ध की नौबत न आए क्योंकि यह अर्थहीन और बेवक्त होगा तथा इससे भारत सहित सब को नुक्सान उठाना पड़ेगा। 
अमरीका (America) ने पिछले हफ्ते ईरान (Iran) के खिलाफ युद्ध की घोषणा की और फिर इस फैसले को वापस ले लिया। आधुनिक समय में यह संभव है जब मशीनों को हवा के बीच वापस लाया जा सकता है।  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने कहा कि उन्होंने आक्रमण का फैसला  उस समय रद्द कर दिया जब उन्हें बताया गया कि हमले में 150 ईरानी मारे जाएंगे। वह उन्हें इसलिए मारना चाहते थे कि ईरान ने एक अमरीकी  सैन्य ड्रोन को उसकी सीमा के पास मार गिराया था। 

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ट्रम्प और उनके प्रशासन के कुछ सदस्य (जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन)  ईरान के खिलाफ युद्ध के लिए लालायित थे। पिछले हफ्ते इस युद्ध जैसी स्थिति के कारण तेल के दाम 10 प्रतिशत तक बढ़ गए जिससे भारत और कुछ अन्य देशों को परेशानी का सामना करना पड़ा जो तेल आयात पर निर्भर है। 

प्रश्न यह है कि अमरीका ईरान से युद्ध क्यों चाहता है और इसका जवाब ढूंढना ज्यादा मुश्किल नहीं है। सभ्यता के संदर्भ में ईरान पश्चिम का पुराना दुश्मन है। 2400 वर्ष पहले, ईरानी सेना ने डेरियस और जिरैक्सिस, के नेतृत्व में ग्रीस पर आक्रमण कर एथेंस को नष्ट कर दिया था। स्वयं ग्रीस निवासी इस बात को मानते हैं। ईरानी सेना में काफी संख्या में भारतीय सैनिक भी शामिल थे।

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पुराने इतिहास में ग्रीक लोग ईरानी सम्राट को महान राजा कहते थे क्योंकि उसका उनके जीवन पर काफी प्रभाव रहा। मकदूनिया के विजेता जिसने मिस्र, ईरान, अफगानिस्तान और पंजाब पर विजय हासिल की उसे सिकंदर महान कहा जाता है। उसे उसकी सैन्य उपलब्धियों के कारण नहीं बल्कि इसलिए महान कहा जाता था क्योंकि उसे यह उपाधि डेरियस III से मिली थी। 

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33 वर्ष की उम्र में सिकंदर की मौत के बाद उसका साम्राज्य उसके जनरलों में  बांट दिया गया जिस पर उन्होंने शासन किया। पंजाब से लेकर तुर्की तक और ईरान सहित अधिकतर हिस्सा सैल्यूकस निक्टर के कब्जे में आ गया (निक्टर का अर्थ है विजेता और यह वही शब्द है जिसे जूतों का ब्रांड नाइकी इस्तेमाल करता है)। ईरानियों ने पॢशयन शासक आरसेसिस  की अध्यक्षता में अपने देश को वापस ले लिया। (ये सभी लोग पारसियों की तरह पारसी थे)।

पारसियों ने पश्चिम की दूसरी सबसे बड़ी ताकत रोम के साथ तीन सौ साल तक युद्ध लड़ा। ईरानी विजेताओं का अगला समूह था ससेनियन, जिन्होंने ईरान पर सातवीं शताब्दी तक शासन किया। जब तक अरबों ने उसे जीत नहीं लिया। 400 वर्ष पहले सूफियों के शासन में ईरान शिया बन गया हालांकि भारतीयों के लिए सबसे मशहूर शासक नादिर शाह सुन्नी था जिसने  मुगल शासन को नष्ट कर दिया। 

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ईरानी राजनीति में अमरीकी दखल

आधुनिक समय में, अमरीका का हस्तक्षेप ईरानी राजनीति में काफी बढ़ गया है। 1953 में, ईरान के निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसादिग को सी.आई.ए. के षड्यंत्र से सत्ता से हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था। ईरान-ईराक के युद्ध को भड़काने में भी अमरीका की काफी भूमिका थी जिसने ईराकी नेता सद्दाम हुसैन का समर्थन किया था। 1979 में जिमी कार्टर के शासनकाल में तेहरान में अमरीकी दूतावास पर ईरानी क्रांतिकारियों ने कब्जा कर लिया था और दूतावास के स्टाफ को कई हफ्तों तक बंधक बनाए रखा। इसके बाद अमरीका के ईरान से रिश्ते औपचारिक तौर पर समाप्त हो गए। अमरीका में ईरानी लोगों को पाकिस्तानी दूतावास के माध्यम से सेवाएं दी जाती हैं। अपने परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का ओबामा प्रशासन के साथ समझौता होने वाला था लेकिन बाद में ट्रम्प के शासनकाल में यह खटाई में पड़ गया। 

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पाठक जानते होंगे कि ईरान का राष्ट्रीय धर्म शिया इस्लाम है। पाठकों के लिए यह बात रुचिकर हो सकती है कि भारत और भारतीय सेना के खिलाफ लड़ रहा कोई भी समूह शिया नहीं है। जैश, लश्कर-ए-तोयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन, हरकत-उल-मुजाहिद्दीन, अल कायदा, इस्लामिक स्टेट इत्यादि सभी सुन्नी समूह हैं। शिया मत में जेहादी आतंकवाद का कोई जिक्र नहीं है। यद्यपि ईरान सुन्नी समूहों सहित फिलस्तीनी गुटों का समर्थक रहा है जो इसराईल का विरोध करते हैं। इसी कारण अमरीका ईरान से घृणा करता है। ईरानियों का अमरीका से कोई झगड़ा नहीं है और अमरीका द्वारा ईरान से घृणा करने का कोई कारण नहीं है सिवाय इसके कि इसराईल अमरीका पर इस बात के लिए जोर डालता है कि वह ईरान के साथ सख्ती से पेश आए क्योंकि वह फिलस्तीन की इसराईल के कब्जे से मुक्ति का समर्थक है।

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 ईरान से सांस्कृतिक संबंध

भारत का ईरान से सांस्कृतिक रिश्ता है। अरब लोग उर्दू नहीं समझते हैं लेकिन ईरानी समझ लेते हैं। ईरान हमेशा भारत का दोस्त रहा है। भारत को इस बात का पूरा प्रयास करना चाहिए कि हमारे दो दोस्तों के बीच युद्ध की नौबत न आए क्योंकि यह अर्थहीन और बेवक्त होगा तथा इससे भारत सहित सब को नुक्सान उठाना पड़ेगा। 

-आकार पटेल

 

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