Monday, Sep 27, 2021
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अंग्रेजों ने भी बनाई थी नगर प्राचीर, नाम दिया ‘माॅर्टेलो टाॅवर’

  • Updated on 9/14/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। इतिहास में कई ऐसी घटनाएं हैं जब किसी देश ने दूसरे देश से लडते हुए, अपने दुश्मन देश की परंपरा, संस्कृति या फिर वास्तुकला शैली को अपना लिया हो। तभी तो तैमूर लंग ने फिरोजशाह कोटला की जामा मस्जिद को देखकर उसके आकर्षण से अभिभूत होकर उसका नक्शा साथ बनवाकर ले गया और ठीक वैसी ही मस्जिद लौटकर समरकंद में बनवाई थी। ठीक इसी तरह अंग्रेजों को भी अपने दुश्मन से लडते हुए नगर प्राचीर बनाने का आइडिया आया और उन्होंने दरियागंज में राजघाट के सामने की ओर नगर प्राचीर बनवाई और उसमें एक मीनार का निर्माण करवाया, जिसे माॅर्टेलो टाॅवर कहते हैं। हालांकि वर्तमान में आप इसके कुछ हिस्से को ही देख सकते हैं बाकी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है।
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19वीं शताब्दी के शुरूआत में बनवाया था माॅर्टेलों टाॅवर
दिल्ली विरासत की लिस्ट में शुमार माॅर्टेलों टाॅवर का काफी हिस्सा अब अवशेषों में तब्दील हो गया है। लेकिन अभी भी इसे दरियागंज की ओर से देखा जा सकता है। देख-रेख के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा की जा रही है। यह मीनार अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी के शुरूआत में तब बनावाई थी जब नेपोलियन व ब्रिटिश सेना में युद्ध हुआ था। ब्रिटिश सेना ने उस दौरान कोर्सिका के तट पर माॅर्टेला प्वाइंट में एक छोटा वृत्ताकार किला देखा था। जोकि एक कारगर प्रतिरक्षा उस समय साबित हुआ था। उसके बाद ब्रिटिश ने अपने उपनिवेशों में कई जगह ऐसे ढांचों का निर्माण करवाया था और माॅर्टेला प्वाइंट की जगह उन सभी का नाम माॅर्टेलो टाॅवर रखा था। खासकर ब्रिटेन ने अपने तटीय रेखा व अपनी काॅलोनियों में इस तरह के कई निर्माण प्रेरित होकर करवाए थे। दिल्ली में भी इस तरह के कई माॅर्टेलो टाॅवर बनाए गए थे लेकिन अब सिर्फ दरियागंज में ही यह टाॅवर देखने को मिलता है।
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नगर प्राचीर से सटा है माॅर्टेलो टाॅवर
शाहजहांनाबाद की सिटी वाॅल से सटाकर उस दौरान दरियागंज इलाके में अंग्रेजों ने माॅर्टेलो टाॅवर का निर्माण करवाया था। जोकि सिटी वाॅल से सटी हुई और बाहर की ओर स्थित है। यहां सिर्फ एक छोटे से पुल के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। इस मीनार का व्यास आधार पर 17 मीटर का है। इसके निर्माण के दौरान बलुई लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। दिल्ली गेट से राजघाट की ओर बढने पर पहली रेडलाइट से उल्टे हाथ की ओर माॅर्टेलो टाॅवर स्थित है। लेकिन बडे-बडे पेडों के झुरमुट के चलते यह आपको बाहर से नहीं दिखेगी। इसके लिए आपको अंसारी रोड की ओर से जाना होगा।
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आखिर क्यों जरूरी था  माॅर्टेलो टाॅवर अंग्रेजों के लिए
हालांकि वर्तमान में माॅर्टेलो टाॅवर का काफी हिस्सा टूट गया है। बावजूद इसके वो अपनी विशेषता के लिए सदा जाना जाएगा। जिस समय अंग्रेज दिल्ली में धूसे तो उन्होंने सिटी वाॅल को पूरी तरह से तोड दिया था लेकिन उन्हें विद्रोहियों से अपनी सुरक्षा करनी थी और दिल्ली के भीतर रह रहे अन्य ब्रिटिश नागरिकों व उनके परिवारों का ख्याल रखना था, माॅर्टेलों टाॅवर से अंग्रेजों के सैनिक अन्य गतिविधियों पर नजर रखा करते थे।
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पेडों की आगोश में है माॅर्टेलो टाॅवर
देख-रेख के अभाव के चलते माॅर्टेलो टाॅवर पेडों की आगोश में समा गया है उसके ऊपर की छत पर बरगद व पीपल के पेड दरारों से झांकते दिखाई देते हैं। यही नहीं माॅर्टेलो टाॅवर पर चढने के लिए बनाया गया ढलानरूपी रास्ते पर भी आपको कांईं देखने को मिलेगी। इसकी अनदेखी की वजह एएसआई भी है। जिसके चलते पर्यटकों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। कभी-कभार एक-दो लोग इस ओर चले आते हैं वरना माॅर्टेलो टाॅवर गुमनाम बना हुआ है।
 

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