ब्रिटिश संसद से बहुत कुछ सीख सकते हैं हमारे नेता

  • Updated on 1/21/2019

‘सभी लोकतंत्रों की जननी’ (जैसा कि 1865 में जॉन ब्राइट ने कहा था) ब्रिटेन ने एक बार फिर बहुदलीय संसदीय प्रणाली वाली सरकार चलाने का सबक पूरी दुनिया को दिया है।

प्रधानमंत्री थैरेसा मे को सदी की सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा जब उनकी ब्रैग्जिट डील (यूरोपीय यूनियन से अलग होने के सौदे) को भारी बहुमत से ‘हाऊस ऑफ कॉमन्स’ (संसद के निचले सदन) ने ठुकरा दिया। दोगुने से अधिक सदस्यों ने इसके विरुद्ध वोट दिया। इनमें थैरेसा की अपनी पार्टी के 100 से अधिक सदस्य भी शामिल थे। 

अतीत में इस तरह की शर्मनाक हार का सामना करने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा है। हालांकि, थैरेसा के साथ ऐसा नहीं हुआ। ब्रैग्जिट डील पर करारी हार का सामना करने के 24 घंटों में उन्होंने लेबर पार्टी सदस्य तथा सदन में विपक्ष के नेता जेरेमी कोॢबन द्वारा पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव को 19 वोटों से जीत लिया क्योंकि विभिन्न दलों के सदस्यों ने उनके पक्ष में वोट दिया। 

जहां अमरीकी सदन गतिरोध का सामना कर रहा है-एक ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तथा दूसरी ओर डैमोक्रेट्स अड़े हुए हैं जिसके चलते सैनिकों सहित विभिन्न कर्मचारियों के वेतन तक जारी नहीं किए जा रहे हैं वहीं चुनावों में थैरेसा के बहुमत को सीमित करने वाला ब्रिटेन चाहता है कि वह अपने पद पर रहते हुए ब्रैग्जिट समस्या का नया हल तलाश करें। 

परंतु केवल संसद के नतीजे ही लोकतंत्र के लिए सबक नहीं हैं, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है कि किस तरह स्पीकर जान बरकाउ ने संसद की कार्रवाई निष्पक्ष तरीके से चलाई और सदस्यों ने भी उसका अनुसरण किया।

किसी सदस्य ने न तो अपनी बारी से इतर बोलने की कोशिश की और  न ही अपने या अपनी पार्टी के विचारों को रखते समय स्पीकर को टोकने या बाधा डालने की कोशिश की।

किसी सदस्य ने सदन की वैल की ओर दौड़ते हुए कागज नहीं फैंके। ज्यादा से ज्यादा पक्ष में ‘यीह’ तथा असहमति जताने के लिए ‘नो’ की आवाजें सुनाई दीं। वास्तव में थैरेसा जब एक प्रश्न का उत्तर दे रही थीं और एक सांसद ने ‘नो’ कहना शुरू किया तो स्पीकर ने तुरंत उन्हें रोकते हुए कहा कि ‘हमें प्रधानमंत्री की बात सुननी चाहिए और हम सुनेंगे’। 

उंगलियों पर गिना जा सकता है कि भारतीय संसद में सदस्यों ने कितनी बार गम्भीरता से बैठ कर बहस सुनी होगी। सदन की गरिमा बनाए रखना एक सबक है तो प्रधानमंत्री थैरेसा मे की वर्तमान नीति से असहमति के बावजूद उन्हें पद पर बनाए रखना दूसरा महत्वपूर्ण सबक है। भारतीय नेता राष्ट्रहित में वोट देने का अहम सबक इससे सीख सकते हैं।

शायद यह समझने की भी जरूरत है कि किस ढंग से ब्रिटिश संसद अपने लोगों से संवाद करती है। विपरीत परिस्थितियों के दौरान भी थैरेसा की दृढ़ता दो तथ्यों का संकेत है-उनके प्रसिद्ध मजबूती भरे रवैये तथा देश को विभाजित नहीं होने देने का पक्का संकल्प। 

ब्रैग्जिट डील को पास करवाने के लिए लेबर पार्टी के वोटों पर निर्भर न रहने की जैकब रीस द्वारा थैरेसा को दी गई चेतावनी के बावजूद उन्हें पद पर बनाए रखने के लिए उनकी ही पार्टी ने वोट दिया।

देशवासियों की इच्छा के अनुरूप परिणाम देने का थैरेसा का दृढ़निश्चय एक कारण है कि सांसदों ने उन्हें पद पर बनाए रखा है। 

थैरेसा का नजरिया है कि ‘राजनीति कोई खेल नहीं है।’ उनके अनुसार, ‘‘मैं टी.वी. स्टूडियोज नहीं जाती। मैं लंच पर लोगों के बारे में गप्पें नहीं लड़ाती। मैं संसद के बार में दारू नहीं पीती। मैं बात-बात पर भावुक नहीं होती। मैं केवल अपने काम से मतलब रखती हूं।’’

अधिकतर कंजर्वेटिव पार्टी सदस्य ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने के पक्ष में थे परंतु थैरेसा इसके विरुद्ध थीं। फिर भी सत्ता में आने के बाद उन्होंने ‘जनता की इच्छा’ को पूरा करने का बीड़ा सम्भाला। 

अविश्वास प्रस्ताव जीतने के बाद उन्होंने ‘चलो काम में जुट जाएं’ कहते हुए सभी दलों से एकजुट होने का आह्वान किया है।
बेशक, यूरोपियन यूनियन में रहने या अलग होने को लेकर ब्रिटेन में अभी भी असहमति हो परंतु 1215 में ‘मैग्ना कार्टा’ लागू होने से लेकर आज तक यह तथ्य बरकरार है कि ब्रिटिश संसद ने सबको लोकतंत्र में बोलने की आजादी तथा स्वतंत्र इच्छा का मार्ग प्रशस्त करने की राह दिखाई है।                                                                                   ---विजय कुमार

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