Tuesday, Jun 18, 2019

NDA को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर रोचक होगा सत्ता का संग्राम, दक्षिण के नतीजे होंगे निर्णायक

  • Updated on 5/22/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। चुनावी समर में हरेक सीट का वजूद काफी ज्यादा होता है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक यूपी- बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों में अपना ध्यान ज्यादा गढ़ाए हुए हैं। हालांकि इन सब के बीच सत्ता में बढ़ी भागीदारी निभाने में दक्षिण भारत के राज्यों का भी बड़ा योगदान रहता है। दक्षिण भारत में 5 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों की 132 सीटों पर सभी पार्टियों की नजरें बनी हुई हैं। ये सीटें सरकार बनाने में अपना प्रमुख योगदान दे सकती हैं। 

जब किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाएगा तो इन सीटों की महत्वता काफी ज्यादा बढ़ जाएगी। जिससे तय होगा कि कौन सी पार्टी केंद्र की सत्ता पर शासन करेगी। साल 2004 और 2009 के चुनावों में जब यूपीए सत्ता में आई थी तो दक्षिण भारत से ही उसे मदद मिली थी। इसके साथ ही जब 1999 में पूर्ण कालिक शासन के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया तो सहयोगी द्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी ने 29 सीटें और उस समय एनडीए में शामिल द्रमुक ने 26 सीटें जीती थी।

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इस बार के चुनावों में हालात बदले से नजर आ रहे हैं। सियासी समीकरण भी कहानी कुछ और ही बयां कर रहे हैं। इस बार राज्य विभाजन के बाद आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ने क्षेत्रिया पार्टियों की दशा को और रफ्तार दे दी है। हालांकि इस चुनाव में दक्षिण भारत के दो दिग्गज जे. जयललिता और एम. करुणानिधि के बगैर चुनावी रण सजाया जा रहा है। तमिलनाडु में भाजपा अन्नाद्रमुक के नेतृत्व में हुए आठ दलों के गठबंधन में शामिल है।

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राज्य में सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद में लगी हुई है। एम करुणानिधी के निधन के बाद पार्टी के कई दिग्गज नेताओं में बिखराव की स्थिति बनी हुई। जिसके चलते उसकी सरकार पर संकट छाया हुआ है। दरअसल राज्य सरकार ने केंद्र की सत्ता धारी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है। जिसके चलते उसकी सरकार बची हुई है। 

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आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेदेपा, जगन मोहन रेड्डी की वाईआरएस कांग्रेस, टीआरएस और भाजपा के अलावा कुछ अन्य क्षेत्रीय दल चुनावी मैदान में हैं। हालांकि चंद्रबाबू नायडू भाजपा की पुरजोर खिलाफत कर रहे हैं। जिसके चलते वे मोदी विरोधी विचार धाराओं के साथ जुड़े हुए हैं। अगर इस चुनाव में बीजेपी सत्ता से दूर रहती है तो नायडू अन्य दलों के साथ अपने वर्चस्व को बढ़ा सकते हैं। हालांकि अगर बीजेपी सत्ता में लौटती है तो नायडू के लिए क्षेत्रिय राजनीति को बचाना भी मुश्किल साबित हो सकता है।  
 

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