the ''''crisis of leadership'''' in congress is settled as soon as possible

कांग्रेस में ‘नेतृत्व का संकट’ जितनी जल्दी सुलझा लिया जाए, उतना ही अच्छा

  • Updated on 7/3/2019

हालिया लोकसभा चुनावों (Lok Sabha Election) में शर्मनाक हार के बाद अप्रत्याशित नेतृत्व संकट से जूझने के बावजूद कांग्रेस के पुराने तथा नए युवा नेताओं के बीच तीव्र सत्ता संघर्ष जारी है। कांग्रेस (Congress) अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने इस्तीफा देकर और अपने निर्णय पर अभी तक अड़े रह कर पार्टी को और अधिक संकट में धकेल दिया है। युवा नेता (Youth Leader) महसूस करते हैं कि पार्टी का पुनर्गठन करने के लिए पुराने कांग्रेसियों को हटाने हेतु राहुल गांधी के हाथों को मजबूत करने की जरूरत है। यद्यपि पुराने कांग्रेसियों का तर्क है कि राहुल ने आगे रह कर पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया और अधिकतर निर्णय उनके ही थे। वे राहुल की ओर से मीडिया टिप्पणियों कि ‘मैं अन्यों को भी इस्तीफा देने के लिए नहीं कह सकता। यह उन पर निर्भर करता है यदि वे जिम्मेदारी लेना चाहते हैं’ के बावजूद वे हार की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। दिलचस्प बात यह है कि हार के बाद जहां राहुल गांधी ने उनके प्रचार अभियान में सहयोग न देने का आरोप वरिष्ठ नेताओं पर लगाया, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने हार के लिए कार्यकत्र्ताओं को दोष दिया। इस तरह से दोषारोपण का खेल जारी है।

पुराने नेताओं को हटाने की मांग
युवा नेताओं ने अब अक्षम पुराने नेताओं को हटाने की मांग का अवसर लपक लिया है। अपना दबाव बनाने के लिए उनमें से 140 से अधिक ने  गत सप्ताह सामूहिक इस्तीफे दे दिए, जबकि कुछ अन्य इस्तीफे देने को तैयार हैं। उनमें एक महासचिव, 6 राष्ट्रीय सचिव तथा दो राज्यों के कार्यकारी अध्यक्ष शामिल हैं। जाहिरा तौर पर इस्तीफों का उद्देश्य पार्टी के पुनर्गठन के लिए राहुल गांधी को खुला हाथ देना है। इस्तीफा अभियान गत सप्ताह युवा कांग्रेस नेतृत्व द्वारा शुरू किया गया था जिनमें कांग्रेस कमेटी के विदेशी मामलों के विभाग के उपाध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा, पार्टी के विधि विभाग के प्रभारी विवेक टांखा, राजस्थान के प्रभारी सचिव तरुण कुमार तथा उत्तर प्रदेश विधान परिषद में कांग्रेस विधायक दल के नेता दीपक सिंह शामिल थे।
उनकी मुख्य मांग यह है कि वर्तमान कांग्रेस कार्य समिति को भंग कर दिया जाए और उन 17 राज्यों, जहां पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, में प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों को हटा दिया जाना चाहिए। उन्हें यह भी आशा है कि बड़े 
पैमाने पर इस्तीफे राहुल गांधी को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मना लेंगे। यह सब एक ऐसे समय पर हुआ है जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता यह दावा कर रहे हैं कि ‘राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थे, हैं और बने रहेंगे।’

बदले की कार्रवाई में पुराने नेता, जो पार्टी पर अपनी पकड़ नहीं छोडऩा चाहते, ने तीन वरिष्ठ पार्टी वफादारों के नाम को आगे बढ़ाया है यदि राहुल पद छोडऩे पर अडिग रहते हैं। वे हैं पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे, लोकसभा में पूर्व कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। जब कभी भी पार्टी कुर्सी वापस लेना चाहेगी, तीनों उसे खाली कर देंगे। ऐसा दिखाई देता है कि शिंदे को अन्य के मुकाबले कुछ लाभ हासिल है। यह स्पष्ट है कि तीन गांधियों के शीर्ष स्तर पर होने के साथ परिवार पार्टी पर आसानी से अपनी पकड़ नहीं छोड़ेगा।

समस्या का शीघ्र समाधान हो
कांग्रेस निश्चित तौर पर कठिन समय से गुजर रही है लेकिन नेतृत्व की समस्या एक ऐसी चीज है जिसे जल्दी सुलझा लिया जाना चाहिए। कार्यकत्र्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है क्योंकि कांग्रेस ने लगातार दो विनाशकारी चुनावी पराजय झेली हैं। तकनीकी रूप से राहुल ही पार्टी प्रभारी हैं क्योंकि कांग्रेस कार्य समिति ने उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया है। राहुल ने बिना सोचे-विचारे पार्टी को इस संकट में धकेल दिया है जबकि उसके पास कोई वैकल्पिक नेतृत्व भी नहीं है। यहां तक कि बहुत से वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं पता कि राहुल गांधी बने रहेंगे या जाएंगे। पार्टी दिशाहीन, अनभिज्ञ तथा नेतृत्वविहीन है। परिणामस्वरूप कर्नाटक, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा हरियाणा सहित कई राज्यों में धड़ों के बीच लड़ाइयां फूट पड़ी हैं। राष्ट्रीय मुख्यालय में पुराने तथा नए नेताओं के बीच संघर्ष छिड़ गया है। तेलंगाना तथा महाराष्ट्र में कांग्रेस क्षरण का सामना कर रही है। कांग्रेस शासित कर्नाटक, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश की सरकारें  सावधानी बरत रही हैं।
अत: पहली प्राथमिकता नेतृत्व के मुद्दे बारे निर्णय है क्योंकि राहुल द्वारा पद छोडऩे का प्रस्ताव किए जाने को लगभग एक महीना हो गया है। यदि वह पद छोडऩे पर जोर देते हैं तो पार्टी को उनकी जगह शीघ्र किसी अन्य पर ध्यान देना चाहिए। जब राहुल गांधी देशव्यापी पदयात्रा पर जाते हैं तो पार्टी चलाने के लिए एक कालेजियम की भी बात की गई। इस पर तात्कालिक निर्णय लेने की जरूरत है क्योंकि हरियाणा, महाराष्ट्र तथा झारखंड जैसे कुछ राज्यों में शीघ्र चुनाव होने वाले हैं।

संगठन का पूर्ण कायापलट
दूसरे, सभी स्तरों पर संगठन का कायापलट करने की जरूरत है और कांग्रेस कार्य समिति ने पहले ही इसका समाधान करने के लिए राहुल गांधी को अधिकृत कर दिया है। व्यापक जनाधार वाले लोगों को चुनावी राज्यों में प्रभारी बनाया जाना चाहिए।
तीसरे, पार्टी की संचार रणनीति में व्यापक सुधार की जरूरत है। चौथे, पार्टी को अपनी सोशल इंजीनियरिंग तथा गठबंधन की नीति में भी सुधार करना चाहिए। जहां कांग्रेस भाजपा को सीधी टक्कर देने की स्थिति में है, वहां स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर कांग्रेस को आत्ममंथन करके जितनी जल्दी हो सके, सुधारात्मक कदम उठाने चाहिएं।
लोकतंत्र में एक प्रभावी विपक्ष की जरूरत होती है और मुख्य राष्ट्रीय दल होने के नाते कांग्रेस को संसद के भीतर तथा बाहर विपक्ष का नेतृत्व करना चाहिए। पुरानी भव्य पार्टी के अस्तित्व के लिए इसके स्वास्थ्य को बहाल करना बहुत महत्वपूर्ण है।
लोकसभा चुनावों में शर्मनाक हार के बाद अप्रत्याशित नेतृत्व संकट से जूझने के बावजूद कांग्रेस के पुराने तथा नए युवा नेताओं के बीच तीव्र सत्ता संघर्ष जारी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा देकर और अपने निर्णय पर अभी तक अड़े रह कर पार्टी को और अधिक संकट में धकेल दिया है।

युवा नेता महसूस करते हैं कि पार्टी का पुनर्गठन करने के लिए पुराने कांग्रेसियों को हटाने हेतु राहुल गांधी के हाथों को मजबूत करने की जरूरत है। यद्यपि पुराने कांग्रेसियों का तर्क है कि राहुल ने आगे रह कर पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया और अधिकतर निर्णय उनके ही थे। वे राहुल की ओर से मीडिया टिप्पणियों कि ‘मैं अन्यों को भी इस्तीफा देने के लिए नहीं कह सकता। यह उन पर निर्भर करता है यदि वे जिम्मेदारी लेना चाहते हैं’ के बावजूद वे हार की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। दिलचस्प बात यह है कि हार के बाद जहां राहुल गांधी ने उनके प्रचार अभियान में सहयोग न देने का आरोप वरिष्ठ नेताओं पर लगाया, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने हार के लिए कार्यकत्र्ताओं को दोष दिया। इस तरह से दोषारोपण का खेल जारी है।

पुराने नेताओं को हटाने की मांग
युवा नेताओं ने अब अक्षम पुराने नेताओं को हटाने की मांग का अवसर लपक लिया है। अपना दबाव बनाने के लिए उनमें से 140 से अधिक ने  गत सप्ताह सामूहिक इस्तीफे दे दिए, जबकि कुछ अन्य इस्तीफे देने को तैयार हैं। उनमें एक महासचिव, 6 राष्ट्रीय सचिव तथा दो राज्यों के कार्यकारी अध्यक्ष शामिल हैं। जाहिरा तौर पर इस्तीफों का उद्देश्य पार्टी के पुनर्गठन के लिए राहुल गांधी को खुला हाथ देना है। इस्तीफा अभियान गत सप्ताह युवा कांग्रेस नेतृत्व द्वारा शुरू किया गया था जिनमें कांग्रेस कमेटी के विदेशी मामलों के विभाग के उपाध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा, पार्टी के विधि विभाग के प्रभारी विवेक टांखा, राजस्थान के प्रभारी सचिव तरुण कुमार तथा उत्तर प्रदेश विधान परिषद में कांग्रेस विधायक दल के नेता दीपक सिंह शामिल थे।
उनकी मुख्य मांग यह है कि वर्तमान कांग्रेस कार्य समिति को भंग कर दिया जाए और उन 17 राज्यों, जहां पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, में प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों को हटा दिया जाना चाहिए। उन्हें यह भी आशा है कि बड़े 
पैमाने पर इस्तीफे राहुल गांधी को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मना लेंगे। यह सब एक ऐसे समय पर हुआ है जब पार्टी के मुख्य प्रवक्ता यह दावा कर रहे हैं कि ‘राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थे, हैं और बने रहेंगे।’

बदले की कार्रवाई में पुराने नेता, जो पार्टी पर अपनी पकड़ नहीं छोडऩा चाहते, ने तीन वरिष्ठ पार्टी वफादारों के नाम को आगे बढ़ाया है यदि राहुल पद छोडऩे पर अडिग रहते हैं। वे हैं पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे, लोकसभा में पूर्व कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े तथा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। जब कभी भी पार्टी कुर्सी वापस लेना चाहेगी, तीनों उसे खाली कर देंगे। ऐसा दिखाई देता है कि शिंदे को अन्य के मुकाबले कुछ लाभ हासिल है। यह स्पष्ट है कि तीन गांधियों के शीर्ष स्तर पर होने के साथ परिवार पार्टी पर आसानी से अपनी पकड़ नहीं छोड़ेगा।

समस्या का शीघ्र समाधान हो
कांग्रेस निश्चित तौर पर कठिन समय से गुजर रही है लेकिन नेतृत्व की समस्या एक ऐसी चीज है जिसे जल्दी सुलझा लिया जाना चाहिए। कार्यकत्र्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है क्योंकि कांग्रेस ने लगातार दो विनाशकारी चुनावी पराजय झेली हैं। तकनीकी रूप से राहुल ही पार्टी प्रभारी हैं क्योंकि कांग्रेस कार्य समिति ने उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया है। राहुल ने बिना सोचे-विचारे पार्टी को इस संकट में धकेल दिया है जबकि उसके पास कोई वैकल्पिक नेतृत्व भी नहीं है। यहां तक कि बहुत से वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं पता कि राहुल गांधी बने रहेंगे या जाएंगे। पार्टी दिशाहीन, अनभिज्ञ तथा नेतृत्वविहीन है। परिणामस्वरूप कर्नाटक, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा हरियाणा सहित कई राज्यों में धड़ों के बीच लड़ाइयां फूट पड़ी हैं। राष्ट्रीय मुख्यालय में पुराने तथा नए नेताओं के बीच संघर्ष छिड़ गया है। तेलंगाना तथा महाराष्ट्र में कांग्रेस क्षरण का सामना कर रही है। कांग्रेस शासित कर्नाटक, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश की सरकारें  सावधानी बरत रही हैं।
अत: पहली प्राथमिकता नेतृत्व के मुद्दे बारे निर्णय है क्योंकि राहुल द्वारा पद छोडऩे का प्रस्ताव किए जाने को लगभग एक महीना हो गया है। यदि वह पद छोडऩे पर जोर देते हैं तो पार्टी को उनकी जगह शीघ्र किसी अन्य पर ध्यान देना चाहिए। जब राहुल गांधी देशव्यापी पदयात्रा पर जाते हैं तो पार्टी चलाने के लिए एक कालेजियम की भी बात की गई। इस पर तात्कालिक निर्णय लेने की जरूरत है क्योंकि हरियाणा, महाराष्ट्र तथा झारखंड जैसे कुछ राज्यों में शीघ्र चुनाव होने वाले हैं।

संगठन का पूर्ण कायापलट
दूसरे, सभी स्तरों पर संगठन का कायापलट करने की जरूरत है और कांग्रेस कार्य समिति ने पहले ही इसका समाधान करने के लिए राहुल गांधी को अधिकृत कर दिया है। व्यापक जनाधार वाले लोगों को चुनावी राज्यों में प्रभारी बनाया जाना चाहिए।
तीसरे, पार्टी की संचार रणनीति में व्यापक सुधार की जरूरत है। चौथे, पार्टी को अपनी सोशल इंजीनियरिंग तथा गठबंधन की नीति में भी सुधार करना चाहिए। जहां कांग्रेस भाजपा को सीधी टक्कर देने की स्थिति में है, वहां स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। सबसे बढ़कर कांग्रेस को आत्ममंथन करके जितनी जल्दी हो सके, सुधारात्मक कदम उठाने चाहिएं। लोकतंत्र में एक प्रभावी विपक्ष की जरूरत होती है और मुख्य राष्ट्रीय दल होने के नाते कांग्रेस को संसद के भीतर तथा बाहर विपक्ष का नेतृत्व करना चाहिए। पुरानी भव्य पार्टी के अस्तित्व के लिए इसके स्वास्थ्य को बहाल करना बहुत महत्वपूर्ण है।                                                                                                          -kalyani60@gmail.com


 

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